क्या भारत की राजनीति में मूर्खता के पाँच नियम लागू हो रहे हैं?
आज के भारत के राजकीय परिदृश्य में नागरिकों की मूर्खता का बहुत बड़ा महत्त्व बन गया है।
आज के भारत के राजकीय परिदृश्य में नागरिकों की मूर्खता का बहुत बड़ा महत्त्व बन गया है। यह मूर्खता का मायना क्या है आइए इसे थोडा-सा समझें:-
अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक रहे इटालियन इतिहासकार कार्लो एम. सिपोला (1922-2000)ने एक छोटी-सी किताब लिखी है। इसका नाम है:- The Basic Laws of Human Stupidity.
वे कहते हैं कि मनुष्य चार प्रकार के होते हैं:-
लाचार, बुद्धिमान, डाकू और मूर्ख।
इस किताब में उन्होंने मनुष्य की मूर्खता के पांच मूलभूत नियम बताये हैं। ये नियम इस प्रकार हैं :-
पहला नियम
समाज में कुल मूर्ख व्यक्तियों की संख्या का अनुमान हमेशा और अनिवार्य रूप से हर व्यक्ति कम ही लगाता है। मतलब, यह कहा ही नहीं जा सकता कि समूचे समाज में कितने लोग मूर्ख हैं। जो भी अंदाजा लगाया जाएगा वह गलत ही साबित होगा और वह आंकड़ा शायद कम ही होगा ऐसा सिपोला कहते हैं।
जिन लोगों ने कोरोना के दौरान ताली-थाली बजाई थी या जिन लोगों ने 17 सितंबर नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर दिए जलाये इन की संख्या का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। मतलब यह कि मूर्ख लोग कम नहीं होते, लाखों-करोड़ों की तादाद में हो सकते हैं।

दूसरा नियम
किसी विशिष्ट व्यक्ति के मूर्ख होने की संभावना उस व्यक्ति के किसी भी अन्य लक्षण से स्वतंत्र है। इसका मतलब यह है कि कोई मनुष्य कितना भी बड़ा या कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो, लेकिन वह मूर्ख हो नहीं सकता या बन नहीं सकता ऐसा नहीं होता। मतलब अमिताभ बच्चन भी ताली-थाली बजा सकता है। सिपोला कहते हैं कि सभी मनुष्य एकसमान नहीं होते, कुछ लोग मूर्ख होते हैं, कई लोग मूर्ख नहीं होते। मनुष्यों के सभी ग्रुप्स में मूर्ख आदमी पाए जाते हैं, यह किसी ग्रुप का विशेषाधिकार नहीं है।
मतलब पढ़े-लिखे लोग भी मूर्ख हो सकते हैं या मूर्ख बन सकते हैं। शिक्षा का मूर्खता से कोई सम्बन्ध नहीं है ऐसा भी सिपोला कहते हैं और यह भी कहते हैं कि ग्रुप छोटा हो या बड़ा, इस में मूर्ख लोग होते ही हैं। इसका मतलब यह है कि बुद्धिमान लोग भी मूर्ख बन जाते हैं, जब वे उनको मूर्ख बनाने वाले को अपना नेता या भगवान समझते हैं।

तीसरा नियम
मूर्ख व्यक्ति एक ऐसे व्यक्ति हैं कि जो स्वयं कोई लाभ प्राप्त किए बिना और शायद खुद को भी नुकसान पहुँचाकर अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को नुकसान पहुँचाता है।
उदहारण के तौर पर, स्वतन्त्र भारद्वाज को ही लीजिए। किसी को मारना और फिर पुलिस और अदालत के चक्कर में खुद के किसी भी लाभ के बिना फंसा देना। भारत में जो मॉब लिंचिंग करने वाले लोग इसी गिनती में आ सकते हैं। उनको लगता है कि उनके मूर्ख आका उनको बचा लेंगे। लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि वे आका समय पर उन को बचाने न आयें।

चौथा नियम
जो लोग मूर्ख नहीं हैं, वे हमेशा मूर्ख व्यक्तियों की नुकसान पहुँचाने की क्षमता का अनुमान कम लगाते हैं। विशेष रूप से जो लोग मूर्ख नहीं हैं, वे लगातार यह भूल जाते हैं कि हर समय, हर स्थान पर और किसी भी परिस्थिति में मूर्ख लोगों के साथ व्यवहार करना और उनके साथ संबंध रखना निश्चित रूप से बहुत महँगी भूल साबित होती है। जो लोग मूर्ख नहीं हैं वे अंदाजा लगा ही नहीं सकते कि मूर्ख लोग अगर सत्ता में आए तो वे कितना नुकसान समाज को या देश को पहुंचा सकते हैं।
जब नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने तो कई सेक्युलर लोग ऐसा मानते थे कि वे अब लोगों के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनेंगे। लेकिन उनको जवाबदेह बनाने वाली जितनी संवैधानिक संस्थाएं थीं उनको ही उन्होंने खतम कर दी। मतलब यह कि जो लोग मूर्ख नहीं हैं वे सच में काफी भोले-भाले होते हैं और भविष्य में कितना नुकसान उनको खुद को या देश को हो सकता है, इसका अंदाजा वे नहीं लगा सकते।
पांचवा नियम
मूर्ख व्यक्ति सबसे खतरनाक व्यक्ति होता है। मूर्ख व्यक्ति डाकू से भी अधिक खतरनाक होता है। इसका मतलब यह है कि डाकू लूटता है, मारता है, लेकिन वह मोटे तौर पर पूरे समाज या देश को हानि नहीं पहुंचाता। लेकिन जो मूर्ख है, अगर वह सत्ता प्राप्त करता है तो वह पूरे देश को खतरनाक मोड़ पर ले जाता है।
हिटलर या ट्रंप जैसे उदहारण इसके लिए काफी हैं। सवाल यह भी है कि इस मूर्खता का अंत कैसे होता है। इसके बारे में लेखक ने कुछ कहा नहीं है।
अपने देश का राजकीय परिदृश्य जो आज है इस के बारे में भी मूर्खता के इन नियमों को लेकर सोचने का समय आ गया है। क्या भारत के नागरिक मूर्ख हैं, या मूर्ख बनाये जा रहे हैं, कौन मूर्ख लोग हैं जो उनको मूर्ख बनाते हैं?
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।