अपने घर का चूल्हा बुझाइए और मोदी जी के लिए दिया जलाइए
अगर आज दिए नहीं जलाए तो नाराज़ फूफा से लेकर दिमाग़ी नक्सल तक कुछ भी कहा जा सकता है
पिछले 11 वर्षों से और कुछ हो न हो, इवेंट ज़बर्दस्त हो रहे हैं देश में, और भाजपा के नए अध्यक्ष बने हैं नितिन नबीन तो एक नया इवेंट शुरू करना बनता ही था। प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर दिया जलाने की परम्परा शुरू कर आज इस नए इवेंट की शुरुआत कर दी गई है।
वैसे दिया जलाने के लिए चाहिए होता है तेल और भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार तेल की क़ीमत लगातार बढ़ते हुए 200 रुपया पार कर चुकी है। साल भर में कोई 7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।
अब अगर आपने यह सवाल उठाया तो कोई मंत्री आकर कह जाएँगे एक परिवार औसतन महीने भर में दो लीटर तेल यूज करता है और 13 रुपये लीटर बढ़ा है तो केवल 26 रुपये का अंतर आया। बात सही होती अगर सिर्फ़ और सिर्फ़ तेल का दाम बढ़ा होता लेकिन दाम तो चीनी का भी पढ़ा है, आलू-प्याज-अनाज सब मंहगा हुआ है। साल भर पहले UPI पर टैक्स लगाने की बात को अफ़वाह कहा गया था, अब वह भी लग चुका है।
तो सौ रुपये में 1 रुपये निकल जाए तो वाकई बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता लेकिन एक-एक करके पचास बार निकल जाए तो आधा रह जाता है सौ का नोट। आम आदमी की इनकम से तेल, अनाज, सब्जी वगैरह की मंहगाई एक हिस्सा कुतर जाती है और नए-नए तरीक़े से टैक्स लगाकर लूटने की स्कीमें बचे-खुचे में सेंध लगा देती हैं तो दर्द तो होता है हुज़ूर- ये दिया उसी दर्द के एहसास को बुझाने के लिए है।
इवेंट का यही फ़ायदा है। सस्ता नशा है। क़र्ज़े में डूब जाए भारतीय परिवार लेकिन शादी में छोटा-मोटा जागीरदार बन जाता है, दीवाला निकल रहा हो लेकिन दीवाली में पटाखों के बिना कहाँ मज़ा आता है? क़र्ज़ लेकर मनानी पड़े लेकिन ईद मन तो जाती ही है। वैसे तो हिन्दू-मुसलमान वाला सरकारी/ग़ैरसरकारी इवेंट पूरे साल चलता ही रहता है लेकिन मोनोटोनी का खतरा है तो बीच-बीच में थाली, दिया वगैरह का भी चलाना पड़ता है।
वैसे तो अभी हाल में ही ब्रिक्स का इवेंट भी हुआ ही था, लेकिन उसमें G-20 वाली बात नहीं आ पाई। एक तो राहुल गांधी ने गले मिलने को लेकर जो ऑन स्टेज ताना मार दिया उसके चलते मोदी जी भी थोड़ा बचते नज़र आए और दूसरा ट्रम्प-मेलोनी की जगह पुतिन-जिनपिंग जैसे खाँटी विश्वनेता थे जो लपक-झपक में ज़्यादा भरोसा नहीं रखते। दिल्ली में पोस्टरों, बैनरों, बिलबोर्डों का रेला लगाया तो गया था लेकिन माहौल बना नहीं।
उधर राहुल गांधी का छात्रों की गूंज का इवेंट रोके नहीं रुक रहा। कहीं हॉल कैंसल किया जाता है, कहीं स्टेडियम की पर्मिशन नहीं मिलती। कहीं बगल में नाच-गाने का आयोजन करवा दिया जाता है, कहीं दो दिन पहले युवा संवाद करवाया जाता है। खुद मोदी जी ओवरटाइम करके इंस्टा वीडियो बना रहे हैं, वी शेप मंच बनवा रहे हैं, मामा-फूफा और जाने किस-किस को याद कर रहे हैं, लेकिन आयोजन हुए जा रहे हैं, छात्र बड़ी संख्या में आ रहे हैं।
बंदे मातरम वाला मामला भी जमा नहीं। कोशिश बहुत हुई। नितिन नबीन 'मियाँ राहुल' पर उतर आए तो कांग्रेसी पिल पड़े, शुक्र है कि किसी ने ये नहीं पूछा कि राहुल मियाँ हैं आपके तो आप उनके बीबी हुए? दूसरे, मुश्किल गान है। आधा याद करना ही आसान नहीं था तो जिन्होंने बचपन से 'नमस्ते सदा वत्सले' गाया है उन्हें पूरा बंदे मातरम कैसे याद हो जाता? डिबेट में पूछा गया तो उलझ गए, उल्टा-सीधा गाने की कोशिश की तो मज़ाक उड़ा। अब 95% जनता को भी याद नहीं तो कौन हँसता, कौन रोता, कौन गाता? क़ानून बन गया, शोर नहीं मचा।
राजस्थान के लोकल बॉडी इलेक्शन में भी मोदी जी ने बम्पर जीत का ऐलान तो कर दिया लेकिन आँकड़े उसकी गवाही नहीं दे रहे। अपनी सरकार, मनचाहा डिलिमिटेशन और उसके बाद भी ऐसे रिजल्ट!
उधर दस साल में पेटीएम और गूगल पे की आदत ऐसी पड़ी है कि जब उस पर टैक्स की बात हुई तो मामला घर-घर पहुँच गया। राहुल गांधी कह रहे हैं कि अमरीकी दबाव में हुआ यह और वापस लेने की मांग कर रहे हैं तो जनता को बात सही ही लग रही है।
जितने तर्क सरकार लेकर आई थी, अशनीर ग्रोवर ने उन सबका भांडा फोड़ दिया। अब ग्रोवर कोई आम आदमी तो हैं नहीं, भारतपे के एक्स एम डी हैं। भांडा फोड़ा तो फोड़ा, साथ में कह दिया कि सुभाष चंद्रा के 22 हजार करोड़ माफ न किया होता तो यूपीआई बीस साल तक फ्री रहता। अब इसमें अदानी-अंबानी एंड ऑल का जोड़ दीजिए तो शायद दो-चार सौ साल तक फ्री रह सकता था।
उधर ट्रम्प जैसी दोस्ती निभा रहे हैं बिल्कुल शोले के अमिताभ बच्चन की याद आ रही है। आज वाले बच्चन साहब तो ट्वीट नंबर गिनने में इतना मसरूफ़ हैं कि उन्हें खुद कुछ याद नहीं आता। 100 परसेंट टैरिफ पर विदेश मंत्रालय ने जवाब दे दो दिया लेकिन मुश्किल बढ़ तो जाएगी ही। आज ही भारत को पाकिस्तान के साथ ड्रग तस्करी वाले देशों में भी रख दिया! ऐसा बर्थडे गिफ्ट तो दुश्मन भी नहीं देता जैसा दोस्त ने दिया।
उधर बिहार में बाढ़ आई है। तीन-चार इंजन की सरकार है लेकिन गाड़ी आगे बढ़ ही नहीं रही। गाँव-शहर डूब रहे हैं, लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। विपक्ष सवाल पूछ रहा है, पानी में दिया कैसे जलाएं साहब? अब जन मणिपुर में चार साल से जारी बवाल में दिया जल सकता है तो बिहार में क्यों नहीं!
अब जब इतना तमाशा चल रहा है तो फिर कोई बड़ा तमाशा तो चाहिए- दिया जलाइए। वैसे तो हिन्दू परम्परा में जीवित लोगों के लिए दिए नहीं जलाते लेकिन आपने अगर आज दिए नहीं जलाए तो नाराज़ फूफा से लेकर दिमाग़ी नक्सल तक कुछ भी कहा जा सकता है।