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संसद में कानून बनाने के बजाय राज्यों में क्यों UCC लागू कर रही है भाजपा?

TCN Desk TCN Desk | 32m ago · 9 min read
संसद में कानून बनाने के बजाय राज्यों में क्यों UCC लागू कर रही है भाजपा?

UCC की अवधारणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जुड़ी है।

केंद्र में सत्तारूढ भाजपा सरकार ने पिछले 11 सालों में एक परंपरा बना ली है। बिना कोई रायशुमारी, बहस या सर्वसम्मत फैसले के ही देश के नागरिकों पर मनमाफिक कानून या बिल थोप देती है। बिल्कुल एकतरफा फैसला और कार्रवाई। कभी-कभी तो बैक डोर से भी नागरिकों पर संघ का एजेंडा लाद दिया जाता है। इसी परंपरा को निभाते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर दी जाएगी।


मुंबई में अमित शाह ने कहा,

हमने कई राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की है और मुझे विश्वास है कि 2029 से पहले भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में इसे लागू कर दिया जाएगा।” उन्होंने तीन तलाक की प्रथा समाप्त किए जाने को मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में सरकार के प्रयासों का हिस्सा बताया।

बता दें कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद UCC भाजपा के पुराने वैचारिक एजेंडे का प्रमुख अधूरा लक्ष्य है। गुजरात विधानसभा में UCC विधेयक पारित होने के बाद शाह ने कहा था कि प्रत्येक नागरिक के लिए समान कानून लागू करना पार्टी की स्थापना के समय से ही उसकी प्रतिबद्धता रही है।

गौरतलब है कि UCC की अवधारणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)की विचारधारा से जुड़ी है। हालांकि, इसे लागू करने के तरीके और समय को लेकर संघ का रुख अपेक्षाकृत सतर्क रहा है। वर्ष 2023 में जब मोदी सरकार ने UCC को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया था, तब संघ से जुड़े सूत्रों ने कहा था कि इस विषय पर गहन अध्ययन और व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है, क्योंकि यह समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रभावित करता है।
संघ चाहता था कि पहले भाजपा शासित राज्य अपने-अपने स्तर पर समान नागरिक संहिता लागू करें और इसके बाद केंद्र सरकार देशव्यापी कानून बनाने पर विचार करे। मार्च 2024 में RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने उत्तराखंड मॉडल का स्वागत करते हुए इसे पूरे देश में लागू करने के लिए अध्ययन और व्यापक परामर्श की जरूरत बताई थी

अमित शाह की 2029 की समय सीमा ने अब राज्यों से शुरुआत करने की इस रणनीति को एक निश्चित अवधि वाले राजनीतिक कार्यक्रम में बदल दिया है। अब बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रीय कानून बनाने के बजाय राज्यों में UCC क्यों लागू कर रही भाजपा? इसके पीछे संवैधानिक और राजनीतिक—दोनों कारण हैं। विवाह, तलाक, गोद लेना, वसीयत, बिना वसीयत के संपत्ति का बंटवारा, उत्तराधिकार और संयुक्त परिवार से जुड़े विषय संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या पांच में आते हैं। इसलिए संसद और राज्य विधानसभाओं, दोनों को इन मामलों में कानून बनाने का अधिकार है।

हालांकि, इसका राजनीतिक कारण अधिक महत्वपूर्ण है। देशव्यापी समान कानून बनाते समय भारत में मौजूद विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों और पारंपरिक प्रथाओं का ध्यान रखना होगा। आदिवासी समुदायों और पूर्वोत्तर राज्यों के मामले में यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है।

वर्ष 2023 में भाजपा और RSS से जुड़े सूत्रों ने भी यही चिंता व्यक्त की थी। भाजपा के एक पदाधिकारी ने कहा था कि,

UCC को आपराधिक कानून की तरह सामान्य रूप से संहिताबद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि उत्तराखंड या हिमाचल प्रदेश के आदिवासी समुदायों की परंपराएं छत्तीसगढ़ अथवा पूर्वोत्तर के आदिवासी समुदायों से काफी अलग है।

राज्यों के माध्यम से आगे बढ़ने पर भाजपा को अलग-अलग मॉडल आजमाने, स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार प्रावधान बनाने और देशव्यापी कानून की पूरी राजनीतिक एवं संवैधानिक जटिलताओं का सामना किए बिना इसे लागू करके दिखाने का अवसर मिलता है। इससे UCC का मुद्दा राजनीतिक रूप से सक्रिय भी बना रहता है और पार्टी इसे समान अधिकार एवं सामाजिक सुधार के उपाय के रूप में पेश कर सकती है।

चार भाजपा शासित राज्यों—उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश—में UCC कानून पारित हो चुका है। हालांकि, अभी केवल उत्तराखंड में ही यह संहिता प्रभावी है।

उत्तराखंड ने जनवरी 2025 में UCC लागू किया था। इसमें विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार के लिए समान नियम बनाए गए हैं। बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है और विवाह का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। उत्तराखंड UCC की सबसे खास बात लिव-इन संबंधों का नियमन है। जोड़ों के लिए अपने लिव-इन संबंध और उसके समाप्त होने का पंजीकरण कराना जरूरी है। ऐसे संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा दिया गया है।

गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया था। यह काफी हद तक उत्तराखंड मॉडल पर आधारित है और विवाह, तलाक, उत्तराधिकार तथा लिव-इन संबंधों को इसके दायरे में लाता है। इसमें दो विवाह करने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।
असम ने मई में अपना UCC विधेयक पारित किया। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों से जुड़े प्रावधान हैं। यह बहुविवाह पर रोक लगाता है और लिव-इन संबंधों का पंजीकरण अनिवार्य बनाता है।
मध्य प्रदेश में जुलाई में पारित विधेयक में गोद लेने की प्रक्रिया के साथ ही तीन तलाक और निकाह हलाला से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। यहां भी लिव-इन संबंधों का पंजीकरण आवश्यक है और बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है।

इन चारों कानूनों की एक महत्वपूर्ण समानता यह है कि अनुसूचित जनजातियों को इनके दायरे से बाहर रखा गया है। उत्तराखंड ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत पारंपरिक कानूनों का संरक्षण प्राप्त कुछ समुदायों को भी छूट दी है। इस प्रकार चारों राज्यों के कानून काफी हद तक समान हैं, लेकिन एक जैसे नहीं हैं। इनमें से कोई भी कानून शाब्दिक अर्थ में पूरी तरह ‘समान’ या ‘सार्वभौमिक’ नहीं है।

विपक्षी दल सवाल उठाते रहे हैं कि भाजपा का UCC वास्तव में लैंगिक समानता से जुड़ा सुधार है या बहुसंख्यकवादी व्यवस्था के माध्यम से अल्पसंख्यकों के व्यक्तिगत कानूनों को बदलने का प्रयास।

कांग्रेस ने गुजरात के UCC विधेयक को “मुस्लिम विरोधी” बताया था, जबकि मध्य प्रदेश में उसने इसे आरएसएस का एजेंडा करार दिया। असम में भी विपक्षी दलों ने व्यापक परामर्श की मांग करते हुए आदिवासियों को दी गई छूट और लिव-इन संबंधों के नियमन पर चिंता जताई।

भाजपा के एनडीए सहयोगियों के लिए यह मुद्दा अधिक जटिल है।

जेडीयू लगातार कहती रही है कि वह UCC का विरोध नहीं करती, लेकिन इसे थोपे जाने के बजाय आम सहमति से लागू किया जाना चाहिए। नीतीश कुमार ने विधि आयोग से कहा था कि,

UCC में भारत के विभिन्न धार्मिक और जातीय समुदायों के बीच मौजूद “नाजुक संतुलन” का सम्मान किया जाना चाहिए।

अमित शाह के बयान पर एक बार फिर विपक्ष और एनडीए के सहयोगी दलों ने UCC का विरोध करना शुरू कर दिया है।


कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और यूपीए की सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके सलमान खुर्शीद ने कहा कि,

भाजपा की एक निश्चित विचारधारा है, जिससे हम सहमत नहीं हो सकते। उत्तराखंड या अन्य राज्यों में उन्होंने जो भी कदम उठाए हैं अथवा जहां वे इन्हें लागू करने की योजना बना रहे हैं, उनकी सबसे पहले कानूनी कसौटी पर जांच होनी चाहिए। मामला चाहे हाई कोर्ट में जाए या सुप्रीम कोर्ट में, इसका फैसला मौलिक अधिकारों के आधार पर होगा—विशेष रूप से प्रत्येक भारतीय नागरिक के अपने धर्म और आस्था का पालन करने के अधिकार पर। इन अधिकारों की अदालतें किस तरह व्याख्या करती हैं, इस पर फैसला आने के बाद ही निश्चित रूप से कुछ कहा जा सकता है। तब तक वे जो चाहें बोलते रहें और करते रहें। यदि उन्हें लगता है कि बिना कोई ठोस काम किए केवल ऐसी बयानबाजी से चुनाव जीता जा सकता है, तो यह उनकी मर्जी है।

सलमान खुर्शीद ने कहा आगे कहा कि,

मुझे जानकारी है कि उत्तराखंड में इसे चुनौती दी गई है। वहां दायर मामला अभी लंबित है और सुनवाई का इंतजार है। मुझे उम्मीद है कि अन्य राज्यों में भी इसी तरह की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी।


जेडीयू नेता श्याम रजक ने सोमवार को एएनआई से बात करते कहा कि,


जब यह बिल संसद में आया था तब हमारे नेता(नीतीश कुमार) ने साफ कहा था कि मैं बिल का समर्थन करता हूँ, लेकिन अपने राज्य में इसे लागू नहीं होने दूँगा। हम उस बात पर कायम हैं।"

तेलुगु देशम पार्टी ने भी इस पर चर्चा और आम सहमति बनाने की वकालत की है। वर्ष 2024 में पार्टी ने कहा था कि वह मुस्लिम समुदाय के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।

संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि,

राज्य भारत के समस्त क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। लेकिन यह प्रावधान मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं, बल्कि राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में शामिल है। अनुच्छेद 37 के तहत नीति-निदेशक तत्व शासन चलाने के लिए मूलभूत माने जाते हैं, लेकिन इन्हें किसी अदालत के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता।

वहीं AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने UCC का विरोध करते कहा,

भाजपा समानता के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) नहीं ला रही है। वह केवल उन राज्यों में UCC लागू कर रही है, जहां उसकी सरकार है, ताकि भारत के 18 करोड़ मुसलमानों को निशाना बनाया जा सके।


ओवैसी ने कहा कि,

भाजपा और अमित शाह का यह कदम संविधान के अनुच्छेद 25 में मिली धार्मिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार तथा अनुच्छेद 26 और 29 के खिलाफ है। इसलिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि भाजपा यह सब समानता के लिए नहीं, बल्कि केवल मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए कर रही है।

बहस का मुख्य सवाल यह है कि किन मामलों में समानता लाई जाए और उसे धार्मिक स्वतंत्रता, पारंपरिक प्रथाओं तथा आदिवासी समुदायों को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण के साथ कैसे संतुलित किया जाए। संविधान सभा में भी इस बात पर सहमति नहीं बन पाई थी कि UCC का स्वरूप क्या होना चाहिए। इसी कारण इसे नीति-निदेशक तत्वों में रखा गया था।

21वें विधि आयोग ने पारिवारिक कानूनों में सुधार से संबंधित अपने 2018 के परामर्श-पत्र में कहा था कि उस समय UCC “न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय।

आयोग ने भारत की विविधता बनाए रखते हुए विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों को बदलने की वकालत की थी। उसका जोर समुदायों के बीच समानता स्थापित करने के बजाय प्रत्येक समुदाय के भीतर महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता लाने पर था। आयोग ने पूर्ण समानता थोपने के बजाय चरणबद्ध सुधार की सिफारिश की थी। उसने आदिवासी और पूर्वोत्तर समुदायों को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण को भी UCC लागू करने की राह में एक जटिल मुद्दा बताया था।

22वें विधि आयोग ने 2023 में इस मुद्दे पर दोबारा विचार शुरू किया और आम जनता तथा मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों से नए सुझाव मांगे। आयोग ने कहा था कि 2018 के परामर्श के बाद तीन वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और इस दौरान आए अदालती आदेशों समेत विभिन्न घटनाक्रमों को देखते हुए इस विषय की नए सिरे से समीक्षा जरूरी है।