सहारनपुर मस्जिद विध्वंस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त, योगी सरकार से मांगा जवाब
अदालत ने मस्जिद प्रबंधन पर लगाए गए 6.41 करोड़ रुपये के जुर्माने की वसूली पर भी फिलहाल रोक लगा दी है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 11 सितंबर को सहारनपुर में करीब 115 साल पुरानी मस्जिद को गिराए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने मस्जिद प्रबंधन पर लगाए गए 6.41 करोड़ रुपये के जुर्माने की वसूली पर भी फिलहाल रोक लगा दी है।
The Wire के मुताबिक,
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने अधिवक्ता मोहम्मद तनवीर अहमद की ओर से दायर याचिका पर यह आदेश दिया। याचिका में सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश और जिला न्यायाधीश के 2 सितंबर के फैसले को चुनौती दी गई है। प्रशासन ने 5 सितंबर को मस्जिद ध्वस्त कर दी थी।
The Wire की एक रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष कुमार सिंह ने दलील दी कि जमीन के मालिकाना हक का ठीक तरह से निर्धारण किए बिना ही बेदखली का आदेश पारित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि राजस्व अभिलेखों में इस संपत्ति के संबंध में वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज हैं। मस्जिद का नाम वक्फ रजिस्टर में भी दर्ज था। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने अदालत में कहा कि सरकारी रिकॉर्ड में यह संपत्ति कलेक्ट्रेट की जमीन के रूप में दर्ज है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
सहारनपुर जिला प्रशासन ने 5 सितंबर की सुबह कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित आजादी से पहले की इस मस्जिद को बुलडोजर से गिरा दिया था। अधिकारियों का कहना था कि यह धार्मिक ढांचा सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण करके बनाया गया था। कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सशस्त्र पुलिस बल की पांच कंपनियों और दंगा नियंत्रण बल सहित बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था।
प्रशासन के अनुसार, मस्जिद गिराने की कार्रवाई सुबह सात बजे शुरू हुई थी। हालांकि, विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने अंधेरे की आड़ में सुबह करीब पांच बजे ही कार्रवाई शुरू कर दी थी। इसी परिसर में किराए पर चल रहे एक डाकघर को भी हटाकर उसका सामान दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया गया था।
सहारनपुर के जिला न्यायाधीश सत्येंद्र कुमार ने 2 सितंबर को मस्जिद प्रबंधन समिति की अपील खारिज कर दी थी। यह अपील सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के उस आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थी, जिसमें उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत मस्जिद को हटाने का निर्देश दिया गया था। सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने 315 वर्ग मीटर सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे के लिए मस्जिद प्रबंधन पर 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था। इसके साथ ही परिसर खाली करने के लिए 30 दिनों का नोटिस दिया गया था।
जिला अदालत ने अपने 26 पन्नों के फैसले में कहा था कि मस्जिद प्रबंधन संपत्ति पर अपना मालिकाना हक और वैध कब्जा साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण पेश नहीं कर सका।
The Wire की रिपोर्ट के मुताबिक,
मस्जिद पहली बार 2025 में प्रशासन की नजर में तब आई, जब बजरंग दल कार्यकर्ता विकास त्यागी ने इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद राजस्व विभाग ने जांच की और सहारनपुर के जिलाधिकारी के माध्यम से राज्य सरकार ने मुकदमा दाखिल किया।
मस्जिद के देखरेख करने वालों का दावा है कि यह करीब 115 वर्ष पुरानी थी। जिला अदालत का फैसला आने के महज तीन दिन बाद जल्दबाजी में मस्जिद गिराए जाने और विपक्षी दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को घटनास्थल पर जाने से रोके जाने के आरोपों ने राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया।
कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया था कि मस्जिद गिराए जाने के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें नजरबंद कर दिया और सहारनपुर नहीं जाने दिया। कैराना लोकसभा क्षेत्र में सहारनपुर जिले के कुछ हिस्से भी आते हैं। विपक्षी दलों ने सरकार की कार्रवाई को गैरकानूनी और अनुचित बताया।
विपक्ष ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए मुस्लिम समुदाय के धार्मिक स्थलों को निशाना बना रही है। इस बीच, सहारनपुर पुलिस ने मस्जिद विध्वंस को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर टिप्पणी करने के आरोप में पूर्व पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता हुडा जरीवाला को गिरफ्तार किया है।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाया था कि क्या संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी अब मुसलमानों पर लागू नहीं होती।
उन्होंने एक्स पर लिखा,
आखिर ऐसा क्यों है कि मामूली और कमजोर आधारों पर हमारे धार्मिक स्थलों पर लगातार बुलडोजर चलाया जा रहा है? मस्जिद कमेटी ने इसके अस्तित्व को साबित करने के लिए वर्ष 1911 तक के दस्तावेज पेश किए थे। वहां एक सदी से भी अधिक समय से लगातार नमाज अदा की जाती रही है। उन्होंने कहा, “यह ‘वक्फ बाय यूजर’ की स्पष्ट परिभाषा है और कानून के तहत आज भी इसे वक्फ के रूप में संरक्षण प्राप्त है।
उन्होंने आगे कहा कि.
परिसीमा अधिनियम, 1963 आमतौर पर सरकार को असीमित समय नहीं देता। सरकार अचानक किसी दिन जागकर अचल संपत्ति पर अपना कब्जा होने का दावा नहीं कर सकती।इस संपत्ति पर एक सदी से अधिक समय तक खुला, निरंतर और सार्वजनिक कब्जा रहा है। राज्य यह दिखावा नहीं कर सकता कि यह कब्जा कल ही शुरू हुआ। इसलिए यदि हम राज्य की दलीलों को मान भी लें, तब भी प्रतिकूल कब्जे यानी ‘एडवर्स पजेशन’ का सिद्धांत लागू होगा। मस्जिद पहले बनी थी और कलेक्ट्रेट बाद में।”
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आदित्यनाथ सरकार पर राम मंदिर के चढ़ावे में हुई चोरी से लोगों का ध्यान हटाने के लिए “सांप्रदायिक” मुद्दे का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। यादव ने आरोप लगाया कि सहारनपुर के अधिकारियों ने राज्य सरकार के इशारे पर कार्रवाई की, ताकि मस्जिद के देखभालकर्ताओं को स्थानीय अदालत के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील करने का अवसर न मिल सके।
पत्रकारों से बातचीत में अखिलेख यादव ने कहा,
जो लोग दूसरे धर्मों का सम्मान नहीं करते, वे कभी सनातनी नहीं हो सकते। जो दूसरों की आस्था से खिलवाड़ करते हैं, वे भी कभी सनातनी नहीं हो सकते। एक सच्चा हिंदू कभी किसी दूसरे का अपमान नहीं कर सकता—यही हमने सनातन धर्म में सीखा है। सच्चे सनातनी वे हैं जो सद्भाव को महत्व देते हैं। सद्भाव बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मस्जिदों को अवैध घोषित कर जल्दबाजी में ध्वस्त करने की जो प्रवृत्ति चल रही है, वह उचित नहीं है। उन्होंने एक्स पर लिखा,
सरकार को इसे तत्काल रोकना चाहिए और ऐसी नकारात्मक परिस्थितियों से बचने के लिए इस मुद्दे का समाधान दूसरे उपायों के जरिए करना चाहिए।
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा कि मस्जिद को गिराना संविधान का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिद वक्फ बोर्ड में पंजीकृत थी, लेकिन इस मामले में वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाया गया।
मसूद ने कहा,
आप यह साबित नहीं कर सकते कि यह जमीन आपकी है। खसरा रिकॉर्ड के आधार पर आपने दावा किया कि यह सरकारी कलेक्ट्रेट की जमीन है। लेकिन आज भी कलेक्ट्रेट की जमीन का रिकॉर्ड वहीद खान और याकूब खान के नाम पर दर्ज है, जिनकी जमींदारी में यह मस्जिद बनाई गई थी। यह जमीन अब भी उन्हीं के नाम पर दर्ज है।