जस्टिस दीपक गुप्ता ने क्यों कहा, अदालतें बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रही हैं?
देश में नागरिकों की वास्तविक स्वतंत्रता को लेकर एक रिटायर्ड जस्टिस ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
देश में नागरिकों की वास्तविक स्वतंत्रता को लेकर एक रिटायर्ड जस्टिस ने गंभीर सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ कानूनविद जस्टिस दीपक गुप्ता ने अपने लेख में कहा है कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है, बल्कि नागरिकों को बिना डर के सोचने, बोलने, असहमति जताने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की आजादी भी होनी चाहिए।
Live Law में प्रकाशित लेख में जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा है कि भारत तभी पूरी तरह स्वतंत्र माना जा सकता है, जब नागरिकों के साथ जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव न हो और सभी को समान अवसर मिले। भ्रष्टाचार, पक्षपात, कट्टरता और असहिष्णुता से मुक्ति भी वास्तविक स्वतंत्रता के लिए जरूरी है।
लेख का मुख्य फोकस न्यायपालिका पर है। इसमें कहा गया कि कोई भी देश तब तक पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक उसकी न्यायपालिका स्वतंत्र और निडर न हो।
जस्टिस दीपक गुप्ता के अनुसार,
न्यायाधीशों में ईमानदारी और बौद्धिक क्षमता के साथ अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस भी होना चाहिए। उन्हें संविधान की शपथ के अनुरूप बिना "डर या पक्षपात" के काम करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना भी उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार भी मौलिक अधिकार के रूप में दिया गया है। लेख में कहा गया कि कानूनी सिद्धांत के तौर पर "बेल, जेल नहीं" को महत्व दिया जाता है, लेकिन व्यवहार में स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है।
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि भारत में दोष सिद्ध होने वाले लोगों की तुलना में विचाराधीन कैदियों की संख्या बहुत अधिक है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी व्यक्ति को दोषी साबित होने तक निर्दोष माना जाता है, तो लंबे समय तक जेल में रखना उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को कैसे प्रभावित करता है?
उमर खालिद के मामले का उदाहरण देते हुए लेख में उनकी लंबे समय से चली आ रही हिरासत और मुकदमे में देरी को लेकर सवाल उठाए गए हैं। जस्टिस दीपक गुप्ता ने पूछा कि ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार का क्या होगा।
लेख में यह भी कहा गया कि,
कई मामलों में न्याय मिलने की प्रक्रिया ही व्यक्ति के लिए सजा बन जाती है और लोगों को "राष्ट्रविरोधी" जैसे लेबल लगाकर सामाजिक रूप से नुकसान पहुंचाया जाता है।
लेख में सोनम वांगचुक की हिरासत का भी उल्लेख किया गया है।
लेखक ने कहा कि,
बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस याचिका का फैसला जल्द किया जाना चाहिए।
लेख के अनुसार,
इस मामले में अदालत में सुनवाई टलती रही और बाद में हिरासत का आदेश वापस लिए जाने के बाद मामले को निष्फल बताया गया। लेखक का तर्क है कि अदालत को यह तय करना चाहिए था कि हिरासत कानूनी थी या नहीं।
लेख में कहा गया कि,
लोकतंत्र बहुमत के शासन पर आधारित है, लेकिन बहुमतवाद ऐसी स्थिति है जहां दूसरे पक्ष की आवाज को दबा दिया जाता है। यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है।
राम जन्मभूमि और ज्ञानवापी से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए लेखक ने न्यायपालिका के कुछ फैसलों पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि ऐसे फैसलों का असर विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक सौहार्द पर पड़ सकता है।
लेख में अलग-अलग समुदायों के लोगों से जुड़े जमानत मामलों का उदाहरण देते हुए न्यायिक व्यवस्था में समानता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
लेख में हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में हुई न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर भी चिंता जताई गई है। जस्टिस गुप्ता का कहना है कि न्यायपालिका में विभिन्न जातियों, समुदायों और धर्मों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी विशेष न्यायाधीश की योग्यता या ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाया जा रहा, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होना जरूरी है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर लेख में कहा गया कि यह प्रणाली पारदर्शी नहीं है। लेखक के अनुसार, कॉलेजियम कई महत्वपूर्ण फैसले बिना पर्याप्त कारण सार्वजनिक किए लेता है।
लेख में कहा गया कि न्यायपालिका में लोगों का भरोसा अभी भी संसद और कार्यपालिका की तुलना में अधिक है, लेकिन यह भरोसा धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। सोशल मीडिया पर न्यायाधीशों की लगातार निगरानी और सार्वजनिक आलोचना भी न्यायपालिका के सामने एक नई चुनौती बन गई है।
लेख में केवल न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि वकीलों और बार काउंसिल की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। लेखक के अनुसार,
स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए स्वतंत्र बार भी जरूरी है। वकीलों को राजनीतिक विचारधारा और जातीय पहचान से ऊपर उठकर नागरिकों के अधिकारों और न्याय के लिए आवाज उठानी चाहिए।
लेख में कहा गया कि,
वकीलों की फीस में काफी बढ़ोतरी हुई है, जबकि प्रो-बोनो यानी जरूरतमंद लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता देने का काम कम हुआ है।
बार काउंसिल की भूमिका पर सवाल उठाते हुए लेखक ने कहा कि कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने और पेशेवर आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करने में संस्थाएं अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। लेख में नागरिकों के असहमति जताने के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। लेखक के अनुसार, लोगों को बिना डर के अपनी राय रखने और सरकार या व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार होना चाहिए।
प्रदर्शन और विरोध के दौरान आम लोगों को असुविधा होने की बात स्वीकार करते हुए लेख में कहा गया कि प्रभावी विरोध के लिए कभी-कभी सार्वजनिक असुविधा होना स्वाभाविक है।
लेखक ने चिंता जताई कि यदि न्यायाधीश ही विरोध प्रदर्शनों को सीमित करने के तरीके सुझाने लगें, तो सवाल उठता है कि ऐसे हालात में नागरिकों के असहमति के अधिकार की रक्षा कौन करेगा?
लेख के अंत में कहा गया कि अधिकांश न्यायाधीश ईमानदार और सक्षम हैं, लेकिन न्यायपालिका में कुछ ऐसे मामले बढ़ रहे हैं जो उसकी छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेखक ने न्यायपालिका से आत्ममंथन करने और अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस हासिल करने के लिए कदम उठाने की अपील की।
लेख के अनुसार, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व संविधान की प्रस्तावना के मूल सिद्धांत हैं। यदि नागरिकों का न्यायपालिका पर भरोसा खत्म हो जाता है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो सकती है।