International

BRICS सम्मेलन में क्या भारत US–Iran युद्ध से बंटे सदस्य देशों के बीच सहमति बना पाएगा?

TCN Desk TCN Desk | 50m ago · 6 min read
BRICS सम्मेलन में क्या भारत US–Iran युद्ध से बंटे सदस्य देशों के बीच सहमति बना पाएगा?

BRICS शिखर सम्मेलन में सहमति बनाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी

नई दिल्ली में इस सप्ताहांत 18वां BRICS शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब US–Iran युद्ध और पश्चिम एशिया में गहराते संकट ने दुनिया के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। BRICS अध्यक्ष के रूप में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती सदस्य देशों के परस्पर विरोधी हितों के बीच संतुलन बनाकर साझा सहमति तैयार करना होगी।

12 और 13 सितंबर को भारत मंडपम में होने वाले इस सम्मेलन की आधिकारिक थीम लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता का निर्माण रखी गई है। BRICS की शुरुआत 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के अनौपचारिक समूह BRIC के रूप में हुई थी। आज इस संगठन में दुनिया की 11 प्रमुख उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। विस्तारित BRICS में ईरान के साथ UAE और सऊदी अरब भी शामिल हैं। पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष को लेकर इन देशों की स्थितियां और हित अलग-अलग हैं। वहीं, भारत के अमेरिका तथा खाड़ी देशों के साथ भी महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। ऐसे में नई दिल्ली की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन यानी (ORF) में स्टडीज एंड फॉरेन पॉलिसी के उपाध्यक्ष हर्ष वी. पंत के अनुसार,

BRICS शिखर सम्मेलन में सहमति बनाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी।


पंत ने समाचार एजेंसी PTI से कहा,

दुनिया में विखंडन बढ़ रहा है और बड़ी शक्तियां आमने-सामने हैं। मध्य पूर्व से यूरोप तक युद्ध जारी हैं और उनका अंत दिखाई नहीं दे रहा। बहुपक्षीय व्यवस्था कमजोर पड़ने और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी युद्धों से विकासशील देश अधिक असुरक्षित हो गए हैं। ऐसे समय में भारत को BRICS के माध्यम से ग्लोबल साउथ के लिए व्यावहारिक समाधान तलाशने में केंद्रीय भूमिका निभानी होगी।

‘ग्लोबल साउथ’ शब्द का इस्तेमाल मुख्य रूप से अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और ओशिनिया के विकासशील, कम विकसित तथा उभरते देशों के लिए किया जाता है। US–Iran युद्ध का असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है। इससे ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है। होर्मुज इस संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र बनकर उभरा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक,

इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान रहने से भारत जैसी ऊर्जा आयातक अर्थव्यवस्थाओं को बड़ा नुकसान हो सकता है। भारत के लिए पश्चिम एशिया ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक संबंधों और वहां रहने वाले विशाल भारतीय समुदाय के कारण बेहद महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक संकट बने रहने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है, महंगाई का दबाव तेज हो सकता है और देश की आर्थिक संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि,

US–Iran युद्ध ने BRICS के भीतर मौजूद बुनियादी विरोधाभासों को भी उजागर कर दिया है। संगठन पश्चिमी देशों के प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के विकल्प की बात करता है, लेकिन वास्तविक भू-राजनीतिक संकट के समय इसके सदस्य देशों के हित अलग-अलग दिखाई देते हैं।

11 सदस्य देशों के वरिष्ठ वार्ताकार यानी BRICS शेरपा नई दिल्ली घोषणापत्र को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। बताया जा रहा है कि पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा वार्ता में विवाद का प्रमुख मुद्दा बनी हुई है। ईरान, UAE और सऊदी अरब के सम्मेलन की मेज पर मौजूद रहने के कारण सभी पक्षों को स्वीकार्य साझा बयान तैयार करना आसान नहीं होगा।

Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार,

भारत के साथ रूस, ब्राजील और मिस्र के अधिकारी ईरान तथा UAE के बीच मतभेद कम करने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय अधिकारी दोनों देशों के प्रतिनिधियों से अलग-अलग बातचीत कर उन्हें दिल्ली घोषणापत्र पर सहमत कराने का प्रयास कर रहे हैं। ईरान पहले ही BRICS के माध्यम से अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ साझा विरोध खड़ा करने की कोशिश कर चुका है। उसने संगठन के अध्यक्ष भारत से एक समान रुख तैयार करने में मदद करने का आग्रह किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त को किर्गिस्तान के बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मुलाकात की थी। US–Iran युद्ध शुरू होने के बाद दोनों नेताओं की यह पहली मुलाकात थी।

मसूद पेजेश्कियान ने मोदी से अपील की थी कि भारत विभिन्न पक्षों के साथ अपने व्यापक संपर्कों का उपयोग करते हुए उन्हें युद्ध और रक्तपात का रास्ता छोड़कर संवाद तथा समझौते की ओर लौटने में मदद करे।

फरवरी में युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें UAE में मौजूद ठिकाने भी शामिल हैं। इसके कारण ईरान और UAE के बीच तनाव और बढ़ गया है। लेखक और टिप्पणीकार डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने Project Syndicate में लिखा है कि,

पिछले 20 वर्षों में BRICS ने उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन इसकी असाधारण आंतरिक विविधता उसके सामने बड़ी चुनौती भी है। संगठन में उदार लोकतांत्रिक और सत्तावादी शासन वाले देश, बड़े ऊर्जा निर्यातक और आयातक, विनिर्माण शक्तियां तथा कमोडिटी आधारित अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इसमें भारत–चीन, ईरान–सऊदी अरब और मिस्र–इथियोपिया जैसे भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी मौजूद हैं। संस्थापक देशों के दृष्टिकोण में भी अंतर है। भारत और ब्राजील मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार की वकालत करते हैं, जबकि चीन और रूस अमेरिका के नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था को अधिक खुली चुनौती देना चाहते हैं।

चेलानी के मुताबिक,

यदि BRICSसे मौद्रिक संघ, एकल बाजार या एकीकृत राजनीतिक गठबंधन बनने की उम्मीद की गई थी, तो वह पूरी नहीं हुई। लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए वैश्विक मंच पर जगह बढ़ाने, दक्षिण-दक्षिण सहयोग मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार का दबाव बनाने के मामले में BRICS उम्मीदों से आगे निकला है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भागीदारी की पुष्टि हो चुकी है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के भी सम्मेलन में भाग लेने की उम्मीद है।

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा इस बैठक में शामिल नहीं होंगे। उनकी जगह ब्राजील सरकार के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि को भेजा जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी की पुतिन और पेजेश्कियान के साथ द्विपक्षीय बैठकें शुक्रवार को निर्धारित हैं। मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात शनिवार यानी सम्मेलन के पहले दिन होने की संभावना है।

12 सितंबर को सम्मेलन की शुरुआत BRICS सदस्य देशों के नेताओं की बंद कमरे में होने वाली बैठक से होगी। इसका विषय समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मजबूत करना” होगा। पहले दिन के कार्यक्रमों का समापन प्रधानमंत्री मोदी की ओर से आयोजित रात्रिभोज के साथ होगा। 13 सितंबर को BRICS सदस्य देशों, साझेदार राष्ट्रों और विशेष आमंत्रित देशों के नेता खुले सत्र में भाग लेंगे। इस सत्र का विषय होगा—“लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता: समावेशी वैश्विक विकास के भविष्य को आकार देना।”

सम्मेलन से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत US–Iran युद्ध से बंटे सदस्यों के बीच सहमति बना पाएगा और BRICS को ग्लोबल साउथ के लिए ठोस समाधान प्रस्तुत करने वाले मंच के रूप में आगे बढ़ा सकेगा।