फिनलैंड में लोग हिंदू मंदिर से नाराज क्यों हैं?
मंदिर के पास रहने वाले लोगों ने नगर प्रशासन में शिकायत दर्ज कराई है।
फिनलैंड के दक्षिणी शहर सिपू में हिंदू मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान होने वाली आवाज़ों को लेकर कुछ स्थानीय निवासियों ने आपत्ति जताई है। विवाद के केंद्र में सिपू के पाइप्पिनेन इलाके में स्थित एक हिंदू मंदिर है। मंदिर के पास रहने वाले लोगों ने नगर प्रशासन में शिकायत दर्ज कराई है, जिसका आसपास के मकानों में रहने वाले 15 अन्य लोगों ने भी समर्थन किया है।
फिनलैंड की एक न्यूज वेबसाइट Yle के अनुसार, स्थानीय निवासियों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील जुहा सारीमाकी ने कहा,
किसी को हिंदू धर्म से कोई आपत्ति नहीं है। सवाल यह है कि पूजा कहां और किस तरह की जा रही है। यह एक खुला ग्रामीण इलाका है, जहां आवाज़ काफी दूर तक सुनाई देती है। खुले खेतों के पार मंदिर की घंटियों, ढोल-नगाड़े बांसुरी और करीब 100 लोगों की धार्मिक शोभायात्राओं की आवाज़ सुनाई देती है।
पड़ोसी लीफ श्मिट ने कहा,
मैंने इस साल मई से अब तक 51 धार्मिक आयोजनों की गिनती की है। इनमें से प्रत्येक आयोजन तीन घंटे तक चला। धार्मिक आयोजनों के दौरान लगातार घंटियों, ढोल-नगाड़े और बांसुरी की आवाज आती रहती है।
यह मंदिर पिछले पांच वर्षों से इसी स्थान पर है। इसकी शुरुआत हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक भगवान शिव के लिए पूजा स्थल बनाने की इच्छा से हुई थी। मूल रूप से श्रीलंका के रहने वाले निरोजन सिवानंथन ने बताया,
मैं करीब दस वर्ष पहले फिनलैंड आया था। यहां वैसा कोई मंदिर नहीं था, जैसा मेरे देश में हुआ करता था। उन्होंने सिपू, केरावा, वांता और आसपास के इलाकों में कई जगहों की तलाश की। आखिरकार उन्हें सिपू के पाइप्पिनेन इलाके में एक उपयुक्त स्थान मिला।

सिवानंथन ने Yle को बताया,
“मैं इस जगह को देखने आया था। उसी रात मैंने सपना देखा कि इस भूखंड पर एक विशाल हिंदू मंदिर खड़ा है। मैंने इसे इस बात का संकेत माना कि ईश्वर ने मुझे बताया है कि यह उनका पसंदीदा स्थान है।”
सिवानंथन ने इस योजना के साथ संपत्ति खरीदी थी कि भूखंड के एक हिस्से में मंदिर और दूसरे हिस्से में अपना घर बनाएंगे। हालांकि, बाद में उन्होंने वहां घर नहीं बनाने का फैसला किया। अब भूखंड के दूसरे हिस्से का इस्तेमाल मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पार्किंग के रूप में किया जाता है। सिवानंथन स्वयं वांता में रहते हैं। उस समय तक फिनलैंड में कोई हिंदू मंदिर नहीं था। हिंदुओं के लिए पूजा स्थल आमतौर पर अन्य इमारतों या निजी घरों के भीतर बनाए जाते थे।
सिवानंथन ने कहा कि,
मंदिर समुदाय सभी लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखना चाहता है और उसने आसपास के ध्वनि प्रदूषण और वातावरण का भी ध्यान रखा है। हम केवल एक ढोल और एक बांसुरी का इस्तेमाल करते हैं। नॉर्वे, जर्मनी और फ्रांस में इसी तरह के धार्मिक समारोहों में आमतौर पर चार वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं। वहीं श्रीलंका और भारत में इनकी संख्या दस तक हो सकती है।”
उन्होंने यह भी बताया कि,
मंदिर ने सबसे बड़ी घंटी का इस्तेमाल बंद कर दिया है और घंटियां बजाने की अवधि भी कम कर दी गई है। मंदिर पिछले पाँच वर्षों से अपने वर्तमान स्थान पर स्थित है, और स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि शोर का स्तर कानूनी सीमाओं के भीतर है।
जुलाई के मध्य में मंदिर में एक धार्मिक उत्सव आयोजित किया गया था। सिपू के पर्यावरण अधिकारियों ने मंदिर प्रबंधन को निर्देश दिया था कि वह धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान आसपास के निकटतम घरों के आंगनों तक पहुंचने वाली आवाज़ का स्तर मापे। उत्सव के दौरान शनिवार शाम को यह माप दर्ज किया गया। नगर पर्यावरण अधिकारियों के मुताबिक, न तो आवाज़ का स्तर और न ही उसकी अवधि कानून द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई।

वरिष्ठ पर्यावरण निरीक्षक अनु युवोनेन ने कहा,
माप के नतीजों से यह साबित नहीं होता कि मंदिर से होने वाला शोर असाधारण रूप से परेशान करने वाला है। आयोजन के दौरान ध्वनि का स्तर बदलता रहा। माप के अनुसार आवाज़ कुछ समय के लिए दिन के निर्धारित मानक 55 डेसीबल से अधिक हुई थी। ऐसी अवधि एक बार में अधिकतम 25 मिनट तक रही, जबकि कई बार यह सीमा पांच से दस मिनट के लिए पार हुई।
नगर प्रशासन इस सप्ताह मंदिर से होने वाली घंटियों और वाद्य यंत्रों की आवाज़ के मुद्दे पर चर्चा करेगा। हालांकि, पर्यावरण विभाग फिलहाल इसे कम करने के लिए कोई कार्रवाई करने की योजना नहीं बना रहा है।
मंदिर आयोजकों को केवल यह याद दिलाया जाएगा कि वे हर वर्ष होने वाले 14 दिवसीय धार्मिक उत्सव की जानकारी आसपास के निवासियों को दें। नियम के अनुसार, उत्सव शुरू होने से कम से कम 48 घंटे पहले पड़ोसियों को इसकी सूचना देना अनिवार्य है।