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आइसलैंड का EU में आने से इंकार और मछली का व्यापार

Praveen Kumar Jha Praveen Kumar Jha | 1h ago · 7 min read
आइसलैंड का EU में आने से इंकार और मछली का व्यापार

आइसलैंड के ताज़ा जनमत-संग्रह से फिर उठा सवाल : यूरोप के भीतर रहकर भी यूरोपीय संघ से बाहर क्यों हैं कुछ समृद्ध देश?

दो दशक पूर्व 1993 में जब यूरोपीय यूनियन के नींव पड़ी, तो कईं यूरोपीय देशों ने इस से दूरी बना कर रखी, लेकिन धीरे-धीरे दूर छिटकते देश भी इस से जुड़ने लग गए। कई देश जो सोवियत ब्लॉक का हिस्सा रहे थे, वे भी इस संघ में शामिल हुए। यूक्रेन जैसे देश के जुड़ने के अटकलों ने किस युद्ध का रूप लिया, वह तो हम जानते ही हैं। और ब्रिटेन के संघ से निकलने यानी ब्रेक्सिट से भी हम परिचित हैं।

लेकिन आज भी यूरोपीय के कुछ गिने-चुने देश हैं जो EU के सदस्य नहीं। इनमें दो देश स्कैंडिनेविया से ताल्लुक रखते हैं — नॉर्वे और आइसलैंड। दो अन्य देश हैं — लिक्टेंस्टें (Lichtenstein) और स्विट्जरलैंड।

इस हफ़्ते ही आइसलैंड के मतदाताओं ने EU सदस्यता की बातचीत दोबारा शुरू करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस से पहले नॉर्वे में दो जनमत संग्रहों में EU सदस्यता को ठुकराया जा चुका है।


आइसलैंड ने फिर चुनी दूरी

उत्तरी अटलांटिक में बसा लगभग चार लाख की आबादी वाला आइसलैंड आकार में छोटा है, लेकिन यूरोप की राजनीति में उसने एक बार फिर बड़ा संदेश दिया है।

29 अगस्त 2026 को हुए सलाहकारी जनमत-संग्रह में मतदाताओं से यह पूछा गया कि क्या देश को यूरोपीय संघ (EU) में शामिल होने की बातचीत दोबारा शुरू करनी चाहिए। 52.8 प्रतिशत मतदाताओं ने ‘नहीं’ और 47.2 प्रतिशत ने ‘हाँ’ कहा। हालांकि यह सीधे EU सदस्यता पर मतदान नहीं था; ‘हाँ’ जीतती तो पहले बातचीत शुरू होती और किसी अंतिम समझौते पर बाद में एक और जनमत-संग्रह अपेक्षित था। फिर भी नतीजे का राजनीतिक अर्थ साफ है। आइसलैंड की जनता का बहुमत फिलहाल ब्रसेल्स के साथ सदस्यता की दिशा में आगे बढ़ना नहीं चाहता।

EU से बाहर, यूरोप से नहीं

इस नतीजे को ‘यूरोप-विरोध’ कहना गलत होगा। आइसलैंड यूरोप की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ा है। वह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) और यूरोपियन इकोनॉमिक एरिया (EEA) का सदस्य है। EEA के जरिए आइसलैंड, नॉर्वे और लिचेंस्टाइन EU के 27 देशों के साथ यूरोपीय सिंगल मार्केट का हिस्सा हैं। वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी और लोगों की आवाजाही के बड़े हिस्से में इन देशों को लगभग वही सुविधा मिलती है जो EU देशों को मिलती है। आइसलैंड Schengen व्यवस्था में भी शामिल है। फर्क यह है कि वह EU की संस्थाओं में पूर्ण सदस्य की तरह वोट नहीं करता और उसकी अपनी मुद्रा ‘आइसलैंडिक क्रोना’ कायम है।


मछली केवल कारोबार नहीं, संप्रभुता का सवाल

मैं जब कुछ वर्ष पहले आइसलैंड गया था, तो इस द्वीप पर एक ही प्रमुख उद्योग दिखा — मत्स्य उद्योग। मछली पकड़ना यहां केवल एक उद्योग नहीं, राष्ट्रीय पहचान और आर्थिक स्वायत्तता का प्रतीक है। EU की Common Fisheries Policy के अंतर्गत समुद्री संसाधनों के प्रबंधन और कोटा व्यवस्था पर साझा यूरोपीय नियम लागू होते हैं।

EU विरोधियों को आशंका रही है कि सदस्यता के बाद आइसलैंड अपने समृद्ध मत्स्य संसाधनों पर वैसा स्वतंत्र नियंत्रण नहीं रख पाएगा जैसा आज रखता है। छोटे तटीय समुदायों के लिए यह सवाल और भी संवेदनशील है। राजधानी रेक्याविक और ग्रामीण इलाकों के राजनीतिक रुझान में इसी कारण अंतर दिखाई देता है।

2008 के संकट से शुरू हुई सदस्यता की कहानी

आइसलैंड और EU का यह विवाद नया नहीं है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट में देश की बैंकिंग व्यवस्था लगभग ढह गई थी और आइसलैंडिक क्रोना की कीमत तेजी से गिरी। उस अस्थिरता के बाद EU और यूरो को आर्थिक सुरक्षा के विकल्प के रूप में देखने वालों की संख्या बढ़ी। आइसलैंड ने 2009 में EU सदस्यता के लिए आवेदन किया और 2010 में औपचारिक वार्ता शुरू हुई। लेकिन मत्स्य नीति, कृषि और संप्रभुता जैसे मुद्दों पर घरेलू विरोध बना रहा। 2013 में नई सरकार ने वार्ता रोक दी। एक दशक से अधिक समय बाद महंगाई, मुद्रा की अस्थिरता और बदलती भू-राजनीति ने सवाल फिर जीवित किया, लेकिन 2026 का जनमत फिलहाल उसी पुराने संकोच की पुष्टि करता है।

आइसलैंड का उदाहरण उसके पड़ोसी नॉर्वे की याद दिलाता है। नॉर्वे ने यूरोपीय संघ की सदस्यता पर दो बार जनमत-संग्रह कराया। 1972 में बहुमत ने सदस्यता को ठुकराया। 1994 में सवाल फिर जनता के सामने आया और एक बार फिर ‘नहीं’ जीत गया। दूसरी बार अंतर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन निर्णय टिकाऊ साबित हुआ। तब से नॉर्वे EU के बाहर रहते हुए EEA के माध्यम से सिंगल मार्केट में भाग लेता है। वह Schengen में भी है और यूरोप के अनेक कार्यक्रमों में आर्थिक योगदान देता है। इसलिए नॉर्वे की स्थिति को कभी-कभी मजाक में EU का ऐसा साथी कहते हैं जिसकी जगह ब्रुसेल्स के मेज पर नहीं है।

तीन EEA-EFTA देश और अलग रास्ते वाला स्विट्जरलैंड

आज EEA के EFTA पक्ष में केवल तीन देश हैं— नॉर्वे, आइसलैंड और लिचेंस्टाइन। स्विट्जरलैंड भी EFTA में है, लेकिन वह EU या EEA का सदस्य नहीं है। उसने EU के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में द्विपक्षीय समझौतों का जाल बनाया है। इसलिए यूरोप के नक्शे में इन चार देशों को एक ही श्रेणी में रखना आसान लगता है, पर उनकी कानूनी व्यवस्था अलग है।

नॉर्वे, आइसलैंड और लिचेंस्टाइन EU के आंतरिक बाजार से EEA समझौते के जरिए जुड़े हैं, जबकि स्विट्जरलैंड ने अपना अलग मॉडल चुना है। यहाँ गौर करने वाली बात यह भी यह है कि भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता EU से भी पहले EFTA देशों ने किया।


NATO में रहना और EU से बाहर रहना विरोधाभास नहीं

आइसलैंड और नॉर्वे दोनों NATO के संस्थापक सदस्यों में हैं। यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि EU सदस्यता के विरोध को कभी-कभी पश्चिमी गठबंधनों से दूरी मान लिया जाता है। वास्तव में इन देशों ने सुरक्षा और आर्थिक एकीकरण के लिए अलग-अलग संस्थागत रास्ते चुने हैं। NATO सामूहिक रक्षा का गठबंधन है, जबकि EU आर्थिक बाजार से कहीं आगे बढ़कर कानून, व्यापार, कृषि, क्षेत्रीय नीति और अनेक राजनीतिक क्षेत्रों में साझा निर्णय की व्यवस्था है। इसलिए कोई देश NATO के भीतर रहकर भी EU की राजनीतिक-संस्थागत सदस्यता से बाहर रह सकता है।

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने 2026 की आइसलैंडिक बहस को पुरानी आर्थिक बहस से आगे पहुंचा दिया। EU समर्थकों का तर्क है कि छोटे देशों के लिए अब अकेला रहना विकल्प नहीं। उन्हें साथ मिल कर ही चलना होगा। जबकि EU विरोधी कहते हैं कि NATO, अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध और EEA के जरिए आर्थिक पहुंच पहले से उपलब्ध है; ऐसे में पूर्ण EU सदस्यता के लिए मछली, कृषि और राष्ट्रीय नीति पर अतिरिक्त अधिकार साझा करने की जरूरत क्यों हो?

क्या अमीर छोटे देशों को EU की जरूरत कम महसूस होती है?

नॉर्वे तेल और गैस से समृद्ध है, आइसलैंड के पास मत्स्य संसाधन और नवीकरणीय ऊर्जा है, लिचेंस्टाइन अत्यंत समृद्ध वित्तीय और औद्योगिक अर्थव्यवस्था है और स्विट्जरलैंड लंबे समय से अपनी तटस्थता तथा स्वतंत्र संस्थाओं पर गर्व करता आया है। इन देशों के पास EU के बाहर रहने की आर्थिक क्षमता है। फिर भी केवल संपन्नता से कहानी पूरी नहीं होती।

आइसलैंड की लोकतांत्रिक संस्कृति में राष्ट्रीय स्वायत्तता का भाव गहरा है। सदियों तक डेनमार्क के अधीन रहने के बाद 1944 में पूर्ण गणराज्य बनने वाला यह देश अपनी भाषा, प्राकृतिक संसाधनों और संस्थाओं को लेकर सजग है।

लगभग चार लाख लोगों के समाज में नागरिक और सत्ता के बीच दूरी भी अपेक्षाकृत कम है। ऐसे देश में यह तर्क प्रभावी होता है कि जिन फैसलों को रेक्याविक में लिया जा सकता है, उन्हें ब्रसेल्स क्यों भेजा जाए।

दूसरी तरफ नई पीढ़ी और शहरी मतदाता पूछते हैं कि जब देश पहले ही EU के अनेक नियम मानता है, तो उन नियमों को बनाने वाली संस्थाओं में औपचारिक मताधिकार क्यों न हो। यही आइसलैंड की EU बहस का मूल द्वंद्व है।

ब्रेक्जिट से बिल्कुल अलग कहानी

ब्रिटेन का EU से निकलना और नॉर्वे-आइसलैंड का EU में न जाना सतही तौर पर समान लग सकता है, लेकिन दोनों की दिशा अलग है। ब्रिटेन दशकों तक EU का सदस्य था और फिर बाहर निकला। नॉर्वे कभी सदस्य बना ही नहीं; आइसलैंड ने आवेदन और वार्ता की, लेकिन सदस्यता तक नहीं पहुंचा। दोनों ने यूरोपीय बाजार से निकट संबंध बनाए रखे। इसलिए इन देशों का मॉडल ‘अलगाव’ नहीं, बल्कि चयनित एकीकरण है; जहां वे सहयोग के बड़े हिस्से में शामिल हैं, पर पूर्ण राजनीतिक सदस्यता से बाहर हैं।

आइसलैंड के ताज़ा परिणाम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि ‘नहीं’ का मतलब दरवाजा हमेशा के लिए बंद करना नहीं है। मतदान काफी करीबी रहा। लगभग 47 प्रतिशत लोगों ने वार्ता फिर शुरू करने का समर्थन किया। बदलती अर्थव्यवस्था, मुद्रा, सुरक्षा या राजनीति भविष्य में संतुलन फिर बदल सकती है। नॉर्वे में भी EU सदस्यता का सवाल समय-समय पर लौटता है, लेकिन तीसरा जनमत-संग्रह कराने के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन नहीं बन पाया है। छोटे उत्तरी यूरोपीय देशों का अनुभव बताता है कि यूरोप में एकीकरण केवल ‘अंदर या बाहर’ का सरल प्रश्न नहीं है।

आइसलैंड ने 2026 में फिर याद दिलाया कि लोकतंत्र में छोटे देश का ‘नहीं’ भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी बड़े देश का ‘हाँ’।



Praveen Kumar Jha

Praveen Kumar Jha

प्रवीण कुमार झा नार्वे में रहते हैं। पेशे से डॉक्टर हैं, मन से लेखक। कई चर्चित किताबें प्रकाशित