कार्बन काउंटी जेल: अकाल, खूनी श्रमिक संघर्ष और साबुन से फरारी की दास्तान
ओल्ड कार्बन काउंटी जेल-अमेरिका के शुरुआती औद्योगिक और श्रमिक इतिहास के सबसे स्याह, रक्तरंजित और क्रूर पन्नों की गवाह है
पेंसिलवेनिया के सुरम्य पहाड़ों के बीच बसा शहर जिम थोर्प अपनी खूबसूरत वादियों और वाइट-वाटर राफ्टिंग के लिए जाना जाता है। इसकी खूबसूरती की वजह से लोग इसे अमेरिका का स्विट्जरलैंड भी कहते हैं , लेकिन यहाँ खड़ी पत्थर की विक्टोरियन शैली की इमारत—
ओल्ड कार्बन काउंटी जेल (Old Carbon County Jail)—अमेरिका के शुरुआती औद्योगिक और श्रमिक इतिहास के सबसे स्याह, रक्तरंजित और क्रूर पन्नों की गवाह है।
बाहर से यह मात्र एक पुरानी जेल दिखती है, लेकिन इसके भीतर 19वीं सदी के वर्ग-संघर्ष, अमानवीय शोषण, सत्ता-उद्योगपतियों के गठजोड़ और एक कैदी की हैरतअंगेज फरारी की पूरी दास्तान दफन है।

पृष्ठभूमि: 'ग्रेट आयरिश पोटैटो फेमिन' और विस्थापन की त्रासदी
1845 से 1852 के बीच आयरलैंड में पड़ा भीषण 'आलू का अकाल' (Irish Potato Famine) इतिहास की सबसे दर्दनाक त्रासदियों में से एक था। आयरलैंड की लगभग एक-तिहाई आबादी अपनी आजीविका और भोजन के लिए पूरी तरह आलू पर निर्भर थी। जब 'ब्लाइट' (Phytophthora infestans) फंगस के कारण आलू की फसलें तबाह हुईं, तो लगभग 10 लाख लोग भुखमरी और महामारी से मारे गए और 15 लाख से अधिक को देश छोड़ना पड़ा।
आयरलैंड से भागकर लाखों बेसहारा शरणार्थी अमेरिका पहुंचे। इनमें से बड़ी संख्या में लोग पेंसिलवेनिया के एंथ्रेसाइट (हार्ड कोल) खनन क्षेत्र—जैसे कार्बन, शूल्कहिल और लुज़र्न काउंटी—में आकर बस गए। लेकिन अकाल से बचकर आए इन लोगों को क्या मालूम था कि वे भुखमरी से निकलकर एक आधुनिक नरक में प्रवेश कर रहे हैं।
खदानों का नरक, 'ब्रेकर बॉयज' और बाल श्रम का दंश
अमेरिका के औद्योगीकरण को ऊर्जा देने वाले इन खनिकों का जीवन अकल्पनीय क्रूरताओं से घिरा था:
- खूनी खदानें और ब्लैक लंग: मजदूरों को रोजाना 10 से 16 घंटे जमीन के सैकड़ों फीट नीचे घने अंधेरे में काम करना पड़ता था। खराब वेंटिलेशन के कारण फेफड़ों की लाइलाज बीमारी 'ब्लैक लंग' (Anthracosilicosis) हर मजदूर का मुकद्दर बन जाती थी। वेंटिलेशन और निकास मार्गों के अभाव में गैस विस्फोटों, छतों के धंसने और जहरीले धुएं से आए दिन सैकड़ों जानें जाती थीं।
- 'ब्रेकर बॉयज' (Breaker Boys) का अमानवीय शोषण: खदान मालिकों का लालच केवल वयस्कों तक सीमित नहीं था। खनिकों के 6 से 10 साल के मासूम बच्चों को 'ब्रेकर बॉयज' के रूप में नियुक्त किया जाता था। इनका काम कोयले में से स्लेट और पत्थरों को नंगे हाथों से छांटना था। 10-12 घंटे लगातार तेज धार वाले पत्थरों के बीच काम करने से बच्चों की उंगलियां कट जाती थीं, नाखून उखड़ जाते थे और कई बच्चे चलती मशीनों में पिस जाते थे। उस दौर में कहा जाता था कि 10 साल का ऐसा बच्चा मिलना दुर्लभ है जिसकी दसों उंगलियां पूरी सलामत हों।
- 'कंपनी टाउन' और आर्थिक बंधुआ मजदूरी: मजदूरों को अमेरिकी डॉलर के बजाय कंपनी द्वारा जारी अपनी निजी करेंसी (Scrip) दी जाती थी। इसे केवल कंपनी द्वारा संचालित महंगे स्टोरों पर ही भुनाया जा सकता था। खनिक कंपनी के ही किराए के घरों में रहते थे। यदि कोई खनिक खदान हादसे में मारा जाता, तो महज 3 दिन के भीतर उसकी विधवा और अनाथ बच्चों को घर से बेदखल कर सड़कों पर फेंक दिया जाता था।
आयरिश संघर्षशीलता और 'मौली मैगुआयर्स' (Molly Maguires)
आयरलैंड में सदियों से दमनकारी ब्रिटिश जमींदारों के खिलाफ छद्म युद्ध लड़ने की एक परंपरा थी—जिसे 'व्हाइटबॉयज' या 'मौली मैगुआयर्स' कहा जाता था। जब पेंसिलवेनिया की खदानों में शोषण असहनीय हो गया, तो आयरिश-अमेरिकन खनिकों ने उसी जुझारूपन को फिर से जीवित किया।

आयरिश प्रवासियों ने एंशिएंट ऑर्डर ऑफ हिबर्नियंस (AOH) जैसी संस्थाओं के भीतर एक भूमिगत प्रतिरोध नेटवर्क तैयार किया, जिसे इतिहास में मौली मैगुआयर्स के नाम से जाना गया।
- जब शांतिपूर्ण हड़तालों और शुरुआती मजदूर यूनियनों (जैसे Workingmen's Benevolent Association) को कंपनियों ने कुचल दिया, तो मजदूरों का आक्रोश हिंसक प्रतिरोध में बदल गया।
- खदान के बेरहम सुपरवाइजरों, दलाल अफसरों और कंपनी के गुर्गों को 'कॉफिन नोटिस' (ताबूत के चित्र वाले धमकी भरे पत्र) भेजे जाने लगे। बात न मानने पर मारपीट, आगजनी और खदान अधिकारियों की हत्याएं तक हुईं।
कॉर्पोरेट तानाशाही, पक्षपातपूर्ण मुकदमे और सत्ता की मिलीभगत
इस श्रमिक प्रतिरोध को पूरी तरह खत्म करने के लिए फिलाडेल्फिया एंड रीडिंग रेलरोड के शक्तिशाली और क्रूर अध्यक्ष फ्रैंकलिन बी. गोवेन (Franklin B. Gowen) ने एक खौफनाक योजना बनाई:
- पिंकर्टन जासूस की घुसपैठ: गोवेन ने अमेरिका की सबसे बड़ी जासूसी एजेंसी 'पिंकर्टन डिटेक्टिव एजेंसी' को किराए पर लिया। जासूस जेम्स मैकपार्लैंड (James McParlan) ने 'जिम मैकेना' नाम से आयरिश खनिक बनकर संगठन में घुसपैठ की और दो साल तक भीतर रहकर सूचनाएं और सबूत जुटाए।
- निजी पुलिस का आतंक: राज्य सरकार ने कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी निजी कोयला कंपनियों की सशस्त्र सेना 'कोल एंड आयरन पुलिस' (Coal and Iron Police) के हवाले कर दी, जिसने आयरिश बस्तियों में बर्बर छापेमारी की।
- कंगारू कोर्ट और फर्जी मुकदमे: पेंसिलवेनिया की स्थानीय सरकार और न्यायपालिका ने पूरी तरह आंखें मूंद लीं। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि मुकदमों में सरकारी वकील की जगह खुद रेलरोड कंपनी का मालिक फ्रैंकलिन गोवेन मुख्य अभियोजक (Special Prosecutor) के रूप में कोर्ट में पेश हुआ। जूरी में जानबूझकर केवल जर्मन और गैर-आयरिश लोगों को रखा गया जो अंग्रेजी भी ठीक से नहीं समझते थे, जबकि आयरिश कैथोलिक गवाहों को अदालत में बोलने की अनुमति तक नहीं दी गई।
'डे ऑफ हैंगिंग' और सेल नंबर 17 का रहस्य
1877 से 1879 के बीच लगभग 20 आयरिश खनिकों को फांसी की सजा दी गई।

- 21 जून 1877 (Black Thursday / Day of the Hanging): इतिहास का वह काला दिन जब एक ही दिन कार्बन काउंटी जेल (माउच चंक) में चार प्रमुख खनिकों (एलेक्जेंडर कैंपबेल, जॉन डोनाहु, माइकल डॉयल और एडवर्ड केली) को और पॉट्सविले जेल में छह अन्य को एक साथ फांसी पर लटका दिया गया।
- दीवार पर वह अमर हाथ का निशान: फांसी के तख्ते पर जाने से ठीक पहले, सेल नंबर 17 में बंद एलेक्जेंडर कैंपबेल (Alexander Campbell) ने अपनी बेगुनाही की अंतिम गवाही के रूप में कालकोठरी की दीवार पर कोयले/मिट्टी से सनी अपनी हथेली छाप दी। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा था:
“यह निशान मेरी बेगुनाही का हमेशा गवाह रहेगा। इसे कोई मिटा नहीं सकेगा।” सैकड़ों सालों में जेल प्रशासन ने उस दीवार को खुरचा, उस पर दर्जनों बार गाढ़ा प्लास्टर और पेंट कराया, लेकिन आज भी कार्बन काउंटी जेल की सेल नंबर 17 की दीवार पर वह हथेली का रहस्यमयी निशान साफ उभरकर दिखाई देता है।
जब एक कैदी ने साबुन की टिकिया से लिखी फरारी की इबारत
कार्बन काउंटी जेल के इतिहास में जहाँ एक तरफ मौली मैगुआयर्स का खूनी और गंभीर अध्याय दर्ज है, वहीं दूसरी तरफ जेल के रिकॉर्ड में दर्ज है एक ऐसा हैरतअंगेज और रोचक किस्सा, जिसने जेल प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। यह कहानी है फ्रैंक 'स्लिपरी ओली' ओ'मैली (Frank "Slippery Ollie" O'Malley) की।
फ्रैंक ओ'मैली एक छोटी-मोटी चोरी के आरोप में पकड़े गए थे और अदालत ने उन्हें कार्बन काउंटी जेल में एक साल (365 दिन) की सजा सुनाई थी।
कार्बन काउंटी जेल का माहौल बेहद दमघोंटू और भारी था। कोठरियों की हवा में तीन चीजों की गंध हमेशा रची-बसी रहती थी—सड़े हुए बासी तंबाकू का धुआं, महीनों से न नहाए कैदियों के पसीने की दुर्गंध और रात में परोसे जाने वाले गाढ़े, बेस्वाद सूप की भाप। फ्रैंक के लिए जेल की इस नीरस और बदबूदार जिंदगी में आने वाले 180 से अधिक दिन काटना एक असहनीय मानसिक बोझ बनता जा रहा था। उन्हें किसी भी कीमत पर खुली हवा में सांस लेनी थी।
फ्रैंक की कोठरी में रोशनी और हवा के नाम पर दीवार के ऊपरी हिस्से में केवल 7 इंच चौड़ी एक बेहद संकरी खिड़की बनी थी। वह खिड़की इतनी पतली थी कि उससे रात में मुश्किल से चांदनी की एक हल्की लकीर ही अंदर आ पाती थी। किसी भी आम इंसान के लिए उस खिड़की से बाहर निकलने का सोचना भी पागलपन था।

लेकिन फ्रैंक ने उस खिड़की को बहुत बारीकी से देखा:
- खिड़की के बीच में लगी लोहे की सलाखें एक धातु के फ्रेम में जड़ी थीं।
- सालों की सीलन और उपेक्षा के कारण सलाखों के किनारों पर लगा पुराना चूना-गारा (mortar) सड़ चुका था और भुरभुरा हो रहा था।
समस्या यह थी कि उस गारे को कुरेदने के लिए कोई मजबूत और नुकीला औजार चाहिए था, जो एक सख्त जेल में मिलना नामुमकिन था। तभी फ्रैंक की नजर जेल प्रशासन द्वारा नहाने के लिए दी गई सस्ती, सख्त और तीखी 'लाई' (Lye) साबुन की टिकिया पर पड़ी।
फ्रैंक ने साबुन की उस सख्त टिकिया के नुकीले कोने को अपना गुप्त 'छेनी-हथौड़ा' बना लिया।
- वे हर रात, जब बाकी कैदी और पहरेदार सो जाते, चुपचाप खिड़की तक चढ़ते और घंटों तक उस सख्त साबुन के कोने से सलाख के चारों तरफ के गारे को धीरे-धीरे कुरेदते।
- हफ्तों की इस घिसाई से उनकी उंगलियों की चमड़ी छिल गई, गहरे छाले पड़ गए और असहनीय दर्द होने लगा।
- दिन-ब-दिन उनका धैर्य उस खिड़की से आती रोशनी की किरण की तरह पतला होता जा रहा था, लेकिन आजादी का जुनून इतना गहरा था कि वे रुके नहीं।
आखिरकार, एक रात लोहे की सलाख की पकड़ ढीली हो गई। फ्रैंक ने पूरी ताकत लगाकर सलाख को हिलाया और उसे फ्रेम से बाहर खींचकर अलग कर दिया।
नग्न बदन, साबुन की चिकनाई और असंभव पलायन
लोहे की सलाख तो हट गई थी, लेकिन रास्ता अब भी केवल 7 इंच चौड़ा था। एक वयस्क इंसान की पसलियां और कंधे उस संकरे छेद से सीधे आर-पार नहीं हो सकते थे।
यहीं फ्रैंक ने अपने उपनाम 'स्लिपरी ओली' (Slippery Ollie) को सच कर दिखाया:
- उन्होंने अपने सारे कैदी कपड़े उतार फेंके।
- बचे हुए पूरे साबुन को पानी से गीला कर अपने पूरे नंगे शरीर—कंधों, सीने, जांघों और बाहों—पर मोटी परत के रूप में चिकनाई की तरह रगड़ लिया।
- बिल्कुल नग्न और साबुन से फिसलन भरे शरीर के साथ वे खिड़की की चौखट पर चढ़े।
- एक-एक इंच रेंगते हुए, खुद को मोड़कर और पसलियों को सिकोड़कर वे उस 7 इंच की संकरी झिरी से ठीक वैसे ही बाहर फिसल गए जैसे हाथ से गीला साबुन छिटक जाता है।
रात के सन्नाटे में जेल की ऊंची दीवारों को पार कर फ्रैंक ओ'मैली आजाद हो चुके थे।
3 दिन की आजादी और प्लेट पर पड़ी हथकड़ी
जेल से भागने के बाद फ्रैंक सबसे पहले एक मालगाड़ी (ट्रेन) के डिब्बे में छिपकर शहर से दूर निकल गए। लेकिन किस्मत ने ज्यादा दिन साथ नहीं दिया:
- फरारी के तीसरे दिन की रात, भूख से बेहाल फ्रैंक पास के एक छोटे कस्बे के एक स्थानीय भोजनालय (रेस्टोरेंट) में बैठकर खाना खा रहे थे।
- किसी ने उनकी संदिग्ध हालत और हुलिए को पहचानकर पुलिस को खबर कर दी।
- इससे पहले कि फ्रैंक अपनी खाने की प्लेट से हाथ हटा पाते या भागने की कोशिश करते, पुलिस ने उन्हें पीछे से दबोच लिया और हथकड़ियां पहना दीं।
जब पुलिस फ्रैंक को वापस कार्बन काउंटी जेल लेकर पहुंची, तो वार्डन ने देखा कि उनके पूरे शरीर पर तीन दिन पुराना, सूखा हुआ सफेद साबुन पपड़ी बनकर चिपका हुआ था और उससे अजीब सी गंध आ रही थी। 7 इंच की खिड़की और सामने खड़े इस 'साबुन से पुते' कैदी को देखकर जेल वार्डन ने अचरज और खीझ में अपना सिर पीट लिया।
सुधरा हुआ जीवन, बढ़ईगीरी और दो कसमें
इस फरारी के बाद फ्रैंक को वापस कालकोठरी में डाल दिया गया। हालांकि, इसके बाद उन्होंने जेल के नियमों का पूरी तरह पालन किया और एक 'आदर्श कैदी' बनकर अपनी बाकी सजा काटी।
जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने एक नई शुरुआत की:
- उन्होंने कभी अपराध की दुनिया की तरफ मुड़कर नहीं देखा।
- उन्होंने बढ़ईगीरी (Carpentry) का हुनर सीखा, अपना खुद का काम शुरू किया, शादी की और बाल-बच्चों के साथ एक सम्मानित और शांत जीवन बिताने लगे।
- जेल से छूटते वक्त उन्होंने खुद से दो कसमें खाई थीं:
- पहली: ज़िंदगी में कभी ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे दोबारा जेल जाना पड़े।
- दूसरी: अगर खुदा-ना-खास्ता कभी जेल जाना भी पड़ा, तो दोबारा कभी किसी खिड़की से निकलने की कोशिश नहीं करेंगे!
पचास साल बाद का क्लाइमेक्स: जब टिकट का पैसा माफ हुआ
लगभग 50 साल बीत गए। बूढ़े हो चुके फ्रैंक ओ'मैली ने एक दिन अपने स्थानीय अखबार में खबर पढ़ी कि पुरानी कार्बन काउंटी जेल अब स्थायी रूप से बंद कर दी गई है और इसे एक ऐतिहासिक म्यूजियम के रूप में पर्यटकों के लिए खोला गया है।
पुरानी यादों और कौतूहल के चलते, फ्रैंक हाथ में छड़ी थामे, एक आम पर्यटक की तरह लाइन में लगे और बकायदा अपनी जेब से टिकट खरीदकर जेल के भीतर दाखिल हुए।
- वे धीरे-धीरे टूर ग्रुप के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी पुरानी कोठरी के बाहर पहुंचे।
- कोठरी बिल्कुल वैसी ही संरक्षित थी जैसी 50 साल पहले थी—वही संकरी खिड़की और वही लोहे की चारपाई।
- टूर गाइड बड़े नाटकीय और गर्व भरे अंदाज में पर्यटकों को बता रही थी:
“देवियो और सज्जनो! यह वही कोठरी है जहाँ एक बेहद नासमझ और कुख्यात चोर ने केवल एक मामूली साबुन की टिकिया की मदद से भागने की मूर्खतापूर्ण योजना बनाई थी। उसने खिड़की की सलाख ढीली की, लेकिन कुछ ही मील दूर पकड़ लिया गया। कितनी हास्यास्पद और बेवकूफी भरी तरकीब थी!”
भीड़ के बीच खड़े बुजुर्ग फ्रैंक मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने ठंडी पत्थर की दीवार का सहारा लिया, छड़ी को जमीन पर टिकाया, हल्का सा गला साफ किया और शांत आवाज में बोले:
“मैडम, जरा रुकिए... वह कोई मूर्खतापूर्ण योजना नहीं थी। उस वक्त मेरी कोठरी में उस साबुन के सिवा कोई दूसरा औजार था ही नहीं... और जिस खिड़की की आप बात कर रही हैं, उससे निकलने वाला इंसान मैं ही हूँ—मेरा नाम फ्रैंक ओ'मैली है!”
पूरी टूरिस्ट मंडली और गाइड सन्न रह गए। जब फ्रैंक ने उस रात की पूरी हकीकत बयां की, तो म्यूजियम प्रशासन ने सम्मानपूर्वक उनके टिकट के पैसे वापस लौटा दिए और इस ऐतिहासिक किस्से को जेल के आधिकारिक संग्रहालय रिकॉर्ड व किताबों में एक दुर्लभ अध्याय के रूप में दर्ज कर लिया।
पेंसिलवेनिया के कोयला खनिकों और भारतीय खदान मजदूरों (विशेषकर झारखंड के झरिया, धनबाद, रानीगंज, ओडिशा और मेघालय) के ऐतिहासिक और वर्तमान संघर्षों में चौंकाने वाली समानताएं हैं। चाहे 19वीं सदी का अमेरिका हो या 20वीं-21वीं सदी का भारत, औद्योगिक पूंजीवाद में मजदूर वर्ग का शोषण एक जैसा ही दिखता है।
1. विस्थापन और मजबूरी का भूगोल
- पेंसिलवेनिया: आयरिश मजदूर अपने देश में 'आलू अकाल' और भुखमरी से बचने के लिए भागे और पेंसिलवेनिया की खदानों में सस्ते श्रम का जरिया बने।
- भारत: झारखंड और बंगाल की कोयला खदानों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर स्थानीय संथाल, हो, मुंडा आदिवासी और बिहार-पूर्वी उत्तर प्रदेश के गरीब भूमिहीन दलित थे, जो अकाल और कर्ज के जाल में फंसकर इन खदानों में आए। दोनों ही मामलों में खदानें उन लोगों के खून-पसीने पर चलीं जो अपने मूल स्थानों से विस्थापित होकर भुखमरी की कगार पर थे।
2. ब्रेकर बॉयज' बनाम मेघालय की 'रैट-होल माइनिंग' और बाल श्रम
- पेंसिलवेनिया: 8-10 साल के 'ब्रेकर बॉयज' तेज धार वाले पत्थरों के बीच कोयला छांटते हुए अपनी उंगलियां और बचपन गंवाते थे।
- भारत:
- औपनिवेशिक दौर से लेकर आजादी के कई दशकों बाद तक भारतीय खदानों में बच्चों से कोयला ढुलाई कराई जाती थी।
- मेघालय की 'रैट-होल माइनिंग' (Rat-hole mining) में 3-4 फीट संकरे सुरंगों में उतरने के लिए छोटे बच्चों को प्राथमिकता दी जाती थी क्योंकि वयस्क उन तंग गड्ढों में नहीं घुस सकते। दोनों जगह बच्चों के शारीरिक आकार का इस्तेमाल उनके क्रूर शोषण के लिए किया गया।
3. 'ब्लैक लंग' और स्वास्थ्य आपदा
- पेंसिलवेनिया: खराब वेंटिलेशन से होने वाली फेफड़ों की बीमारी 'ब्लैक लंग' (Anthracosilicosis) और जहरीली मीथेन गैस के विस्फोट आम थे।
- भारत: झरिया और रानीगंज के खनिक दशकों से सिलिकोसिस, न्यूमोकोनिओसिस और टीबी के शिकार हैं। 1965 का ढोरी (Dhori) खदान हादसा या 1975 का चासनाला खदान हादसा (जिसमें पानी भरने से 375+ खनिक जिंदा जलमग्न हो गए थे) सुरक्षा मानकों की अनदेखी और मजदूरों की जान की शून्य कीमत के वही सबूत हैं जो पेंसिलवेनिया में दिखते थे।
4. कंपनी करेंसी बनाम 'दादन' और साहूकारी का चक्रव्यूह
- पेंसिलवेनिया: खनिकों को अमेरिकी डॉलर की जगह कंपनी की अपनी करेंसी (Scrip) दी जाती थी, जिसे कंपनी स्टोर पर ही खर्च किया जा सकता था। खनिक हमेशा कंपनी के कर्जदार रहते थे।
- भारत: आजादी से पहले और बाद में भी भारतीय खदानों में 'दादन प्रणाली' (अग्रिम कर्ज देकर बंधुआ बनाना) और स्थानीय ठेकेदारों/साहूकारों का राज रहा। मजदूरों की मजदूरी का बड़ा हिस्सा राशन के कर्ज और शराब की दुकानों में वापस शोषक तंत्र के पास ही चला जाता था।
5. 'कोल एंड आयरन पुलिस' बनाम 'कोल माफिया' और पुलिसिया दमन
- पेंसिलवेनिया: खदान मालिकों ने 'कोल एंड आयरन पुलिस' और 'पिंकर्टन' जैसी निजी सशस्त्र सेनाएं रखी थीं, जो मजदूरों की बस्तियों में आतंक फैलाती थीं और राज्य सरकार मूकदर्शक बनी रहती थी।
- भारत: धनबाद और झरिया का पूरा इतिहास 'कोल माफिया', दबंग ठेकेदारों (लठैतों) और पुलिस-प्रशासन के त्रिकोण से भरा है। जब भी मजदूरों ने यूनियन बनाने या हक मांगने की कोशिश की, निजी गुर्गों और पुलिस लाठीचार्ज के जरिए आंदोलन को कुचला गया (जैसा कि 1970 के दशक में बी.पी. सिन्हा या कॉमरेड ए.के. रॉय के मजदूर आंदोलनों के दौर में देखा गया)।
6. 'मौली मैगुआयर्स' बनाम 'लाल झंडा' और भूमिगत प्रतिरोध
- पेंसिलवेनिया: जब कानूनी रास्ते बंद हो गए, तो आयरिश खनिकों ने 'मौली मैगुआयर्स' जैसा गुप्त और कभी-कभी हिंसक संगठन बनाया।
- भारत: भारत के खनन क्षेत्रों में भी जब शोषण चरम पर पहुंचा, तो मजदूरों ने कुछ इलाकों में नक्सली/भूमिगत आंदोलनों का रास्ता चुना। दोनों ही जगह हिंसक या उग्र प्रतिरोध की जड़ें व्यवस्था की चरम क्रूरता और न्यायपालिका की बेरुखी में थीं।
Atul Arora
अमेरिका में बसे अतुल अरोड़ा ट्रैवल ब्लॉगर हैं। रोजनामचा नाम का इनका एक यू-ट्यूब चैनल है जिसमें वो खालिस कनपुरिया अंदाज में Humour शो करते हैं।