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हथियारों की कमी या चुनावी मजबूरी: ट्रंप क्यों रोक रहे हैं ईरान पर अगला वार?

Md. Tousif Md. Tousif | 1h ago · 5 min read
हथियारों की कमी या चुनावी मजबूरी: ट्रंप क्यों रोक रहे हैं ईरान पर अगला वार?

ईरान के साथ स्विट्जरलैंड में हुए MOU के टूटने के बाद से ट्रंप लगातार ईरान पर नए हमले से बचते नजर आ रहे हैं।

17 अगस्त को ही अमेरिका-ईरान के बीच हुए शांति वार्ता की मियाद पूरी हो गई थी। फिर भी अमेरिका हिम्मत नहीं कर रहा है कि वो ईरान पर हवाई हमले की अगली खेप शुरू कर सके। जाहिर है अमेरिका अब युद्ध को टालना चाहता है। वजह साफ है कि अब अमेरिका के पास हवाई हमलों को रोकने के लायक एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम यानी इंटरसेप्टर ही नहीं है।

Associated Press ने NATO के एक अधिकारी के हवाले से बताया है कि अमेरिकी सेना के सामने यूरोप में आधुनिक मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर की भारी कमी पैदा हो गई है। अधिकारी ने इस स्थिति को “Beyond Critical” बताया है। इसकी वजह से रूस के संभावित हमले की स्थिति में NATO देशों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।


डिफेंस से जुड़े एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, सबसे ज्यादा चिंता पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर की कमी को लेकर है। ये मिसाइलें रूस की तेज गति वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में नष्ट करने में सक्षम हैं। अमेरिकी अधिकारी ने यह भी बताया कि अगर रूस किसी आर्मी हेडक्वार्टर या इलेक्ट्रिसिटी प्लांट जैसे ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला करता है, तो NATO की स्थिति पैट्रियट मिसाइल की कमी से जूझ रहे यूक्रेन जैसी हो सकती है और उसे लगातार मिसाइल हमले झेलने पड़ सकते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह हालात ट्रंप के ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के फैसले के व्यापक असर की तरफ इशारा करते हैं। आज 28 अगस्त को ईरान के साथ अमेरिका का युद्ध शुरू हुए 6 महीने पूरे हो चुके हैं।

यूरोप में मौजूद अमेरिकी मिसाइल स्टॉक का एक हिस्सा “मिडिल ईस्ट” भेज दिया गया है, जहां अमेरिकी और खाड़ी देशों की सेनाओं ने ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को रोकने के लिए बड़ी संख्या में इंटरसेप्टर, जिनमें पैट्रियट भी शामिल हैं, इस्तेमाल किए हैं। हालांकि NATO के वरिष्ठ सैन्य प्रवक्ता अमेरिकी सेना के कर्नल मार्टिन ओ'डॉनेल ने इस दावे को खारिज किया कि यूरोप में पैट्रियट की कमी खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि NATO के पास अपनी रक्षा करने और यूक्रेन को सहायता देने के लिए पर्याप्त एयर डिफेंस और हथियार मौजूद हैं।

पेंटागन के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने भी अमेरिकी हथियारों की कमी के दावों को गलत बताया। उनके मुताबिक, अमेरिका के पास राष्ट्रपति के निर्देश पर किसी भी समय और किसी भी स्थान पर सैन्य कार्रवाई करने के लिए जरूरी हथियार मौजूद हैं। हालांकि, यूक्रेन लगातार रूस के मिसाइल हमलों से बचाव के लिए और पैट्रियट मिसाइलों की मांग कर रहा है। 2022 में रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को बड़ी संख्या में पैट्रियट मिसाइलें दी हैं, जिसकी वजह से भी अमेरिकी स्टॉक कम हुआ है।

हथियारों की भारी कमी के बारे में कई बड़े मीडिया संस्थानों ने अलग-अलग सूत्रों के हवाले से खबरें दी हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने हर बार ऐसी रिपोर्टों को खारिज किया है और कई बार तो खुद ट्रंप ने ऐसे मीडिया संस्थानों पर कानूनी कार्रवाई करने की धमकी भी दी है। लेकिन उनके जंग टालने के तरीके और बार-बार अपने ही बयानों से पलटने का विश्लेषण करें तो तस्वीर काफी साफ होती नजर आती है।

ईरान के साथ स्विट्जरलैंड में हुए MOU के टूटने के बाद से ट्रंप लगातार ईरान पर नए हमले से बचते नजर आ रहे हैं और ईरान पर लगाए गए नए सैंक्शनों को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जा रहा है। ट्रंप के इस फैसले के पीछे एक वजह हथियारों की कमी हो सकती है और दूसरी वजह कुछ महीनों में अमेरिका में होने वाले मिड टर्म चुनाव में अपनी साख बचाने की कोशिश भी हो सकती है।

ऐसी कई खबरें आ चुकी हैं, जिनमें बताया गया है कि अमेरिका में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग लगातार गिरती जा रही है। 25 अगस्त 2026 की The Economist की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 35% पर पहुंच गई, जो पिछले सप्ताह से भी 0.3% कम है।


वाशिंगटन से प्रकाशित होने वाली मशहूर पत्रिका The Atlantic ने एक रिपोर्ट में लिखा है कि,

ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने के पीछे राष्ट्रपति ट्रंप की मंशा यह हो सकती है कि अमेरिका के वोटर मिड टर्म चुनाव तक ईरान के साथ जंग में हुए नुकसान और परेशानी को भूल जाएं या उनकी यादें धुंधली पड़ जाएं।

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान से युद्ध में ट्रंप प्रशासन के सामने अब विकल्प काफी सीमित हैं, जिसके कारण ट्रंप ने ईरान पर लंबे समय तक आर्थिक दबाव बनाने का रास्ता अपनाया है। इसका उद्देश्य ईरान पर इतना दबाव डालना है कि उसके नेता बातचीत की मेज पर लौटने को मजबूर हो जाएं। लेकिन इस योजना की भी अपनी सीमा है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर अमेरिका ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों जैसे चीन, भारत, रूस और उत्तर कोरिया के खिलाफ कार्रवाई करता है या इन पर और प्रतिबंध लगाता है, तो उनकी विदेश नीति पर भी सवाल खड़े होंगे। दूसरी तरफ, राष्ट्रपति ट्रंप अबतक रूस और चीन के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा में आने से बचते रहे हैं।

ट्रंप के सलाहकारों और सहयोगियों का मानना है कि आर्थिक दबाव ईरान को अमेरिकी राजनीतिक पृष्ठभूमि से बाहर करने का प्रयास है। साथ ही उम्मीद की जा रही है कि गैस की कीमतें कुछ कम होंगी और मिड टर्म चुनावों से पहले ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के मतदाताओं का ध्यान अधिक राजनीतिक रूप से ऐसे मुद्दों की ओर ले जा सकेंगे, जिससे पार्टी को फायदा हो सकता है। राष्ट्रपति के एक पूर्व सलाहकार और प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि,

ट्रंप ने निजी तौर पर अपने राजनीतिक सहयोगियों से कहा है कि जैसे ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ दोबारा खुल जाएगा, वह इसे जीत घोषित करके आगे बढ़ने के इच्छुक हैं। हालांकि, ईरान के हालिया रुख से यह भी मुश्किल होता जा रहा है।
Md. Tousif

Md. Tousif

मोहम्मद तौसिफ़ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरों पर नजर रखते हैं और ‘द क्रेडिबल हिस्ट्री’ में रिसर्चर के रूप में कार्यरत हैं।