भूकंप नहीं, ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटकर गिरने से आई थी नेपाल में विनाशकारी बाढ़: Report
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ 4.4 तीव्रता के भूकंप से नहीं, बल्कि ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटकर गिरने से आई थी।
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ 4.4 तीव्रता के भूकंप से नहीं, बल्कि ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटकर गिरने से आई थी। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह आपदा फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली जिले में आई भयावह बाढ़ जैसी ही थी।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने बताया कि लंबी अवधि वाली भूकंपीय तरंगों के विस्तृत अध्ययन से पता चला है कि दर्ज हुए झटके भूकंप के कारण नहीं, बल्कि ग्लेशियर के ढहने और उसके बाद मलबे के तेज बहाव से पैदा हुए थे। बुधवार को तिब्बत से शुरू हुई इस अचानक बाढ़ ने नेपाल के रसुवा और धादिंग जिलों में भारी तबाही मचाई। इस आपदा में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई, जबकि बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।
USGS ने घटना से जुड़े अपने अपडेट में कहा,
शुरुआत में इस घटना को 4.4 तीव्रता का भूकंप माना गया था। लेकिन आसपास के भूकंपीय केंद्रों, लंबी अवधि वाली तरंगों और सैटेलाइट तस्वीरों के अतिरिक्त विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष निकला कि यह ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहाव की घटना थी। उस समय कोई भूकंप नहीं आया था।”
USGS ने इस भूकंपीय घटना की अनुमानित तीव्रता भी 4.4 से बढ़ाकर 5.2 कर दी है। एजेंसी के मुताबिक,
ग्लेशियर के ढहने से मलबे का भीषण बहाव पैदा हुआ, जिसने नीचे स्थित इलाकों में विनाशकारी प्रभाव डाला। कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी में भू-आकृति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर डैनियल शुगर ने बताया कि करीब 5,200 मीटर यानी लगभग 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा चट्टान से टूटकर नीचे गिरा। यह बर्फ और मलबा हजारों फीट नीचे घाटी की ओर तेजी से बढ़ा।
‘The Newyork Times’ के अनुसार, ग्लेशियर टूटने की घटना काठमांडू से करीब 64 किलोमीटर उत्तर में हुई। इसके बाद बर्फ का बहाव घाटी से उत्तर-पश्चिम दिशा में नेपाल और तिब्बत की सीमा पर स्थित भोटे कोशी नदी की ओर बढ़ गया।
डेनियल शुगर ने आपदा से एक दिन पहले और उसके बाद ली गई सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना की। उन्होंने बताया कि आसपास मौजूद ग्लेशियरों पर जमी बर्फ में केवल 24 घंटे के दौरान उल्लेखनीय कमी दिखाई दी। उन्होंने आशंका जताई कि बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने से बड़ी मात्रा में पानी ग्लेशियर के भीतर पहुंच गया होगा। यह पानी नीचे तक रिसकर ग्लेशियर के आधार को फिसलन भरा बना सकता है, जिसके कारण उसका एक बड़ा हिस्सा ढह गया।
स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ डंडी के ग्लेशियर विशेषज्ञ साइमन कुक ने कहा कि पहाड़ की इतनी अधिक ऊंचाई पर जमा बर्फ के विशाल हिस्से में अत्यधिक स्थितिज ऊर्जा होती है। जब यह हिस्सा टूटकर नीचे गिरता है तो भीषण टक्कर के कारण बर्फ तेजी से पानी और मलबे के खतरनाक मिश्रण में बदल जाती है।
कुक के अनुसार,
ऐसी ही घटना फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुई थी। उस समय ग्लेशियर और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा टूटने के बाद भीषण बाढ़ आई थी, जिसमें 100 से अधिक लोगों की जान चली गई थी।
हालांकि, वैज्ञानिकों ने अभी इस संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया है कि नेपाल की इस आपदा को भयावह बनाने में कुछ अन्य प्राकृतिक कारणों की भी भूमिका रही हो।
बता दें कि बुधवार को सुबह-सुबह भोटेकोशी नदी में अचानक आई बाढ़ ने तीन जिलों में भारी तबाही मचाई। इसमें कम से कम 162 लोगों की मौत हो गई, सुरक्षा कर्मियों व विदेशी पर्यटकों सहित कई लोग लापता हो गए। नेपाल मामलों के जानकार और स्तंभकार पुष्परंजन ने बताया कि हिम स्खलन के बाद फ्लैश फ्लड आया। प्राकृतिक बांध अचानक टूटने से नीचे की ओर भारी सैलाब आ गया, जिसे भूकंप या उच्च तापमान द्वारा प्रेरित माना जा रहा है।
यह हाल के वर्षों में देश की सबसे खराब आपदाओं में से एक थी। मरने वालों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ेगी। रसुवा, नुवाकोट, चितवन, धाडिंग और अन्य जिले अचानक आई बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। बिहार और यूपी भी इस तबाही की चपेट में आएंगे।
यह बाढ़ तब आई जब हिमस्खलन ने भोटेकोशी की सहायक नदी 'ल्हेन्डे' के बहाव को रोक दिया और पानी की लहर ने सबसे पहले रसुवागढ़ी में चीन के साथ नेपाल की सीमा के पास स्थित तिमुरे को अपनी चपेट में लिया। बाढ़ के आगे बढ़ने से पहले ही सैकड़ों लोगों का घर, बस्ती का बड़ा हिस्सा बह गया। इलाके में बारिश न होने के कारण निवासियों को आपदा की कोई चेतावनी नहीं मिली थी और जब बाढ़ आई, तब वे अपने रोज़मर्रा के कामों में लगे हुए थे।
रसुवा ज़िले में अचानक आई बाढ़ से प्रभावित इलाक़े से लगभग 114 घायल लोगों को एयरलिफ़्ट करके बचाया गया है। नेपाली सेना के हेलिकॉप्टरों ने 85 लोगों को बचाया, जबकि प्राइवेट सेक्टर के हेलिकॉप्टरों ने 29 लोगों को एयरलिफ़्ट किया। रसुवा नेपाल के बागमती प्रदेश के अंतर्गत एक पहाड़ी जिला है, जो तिब्बत सीमा से लगा हुआ है।
रसुवा के मुख्य सीमा शुल्क अधिकारी राजेंद्र ढुंगाना ने बताया कि,
बुधवार सुबह जब उन्होंने ज़मीन हिलती हुई महसूस की, तो उन्हें लगा कि भूकंप आया है। जब वे बाहर भागे, तो उन्होंने पानी की एक विशाल दीवार देखी, जिसके पीछे धुएं का गुबार जैसा कुछ दिख रहा था; यह पानी ऊपर से नीचे की ओर तिमुरे बाज़ार की तरफ तेज़ी से बढ़ रहा था। ढुंगाना ने बताया, "यह बाढ़ थी, जो लगभग 100 मीटर ऊंची लहर की तरह उठ रही थी और बाज़ार को अपनी चपेट में ले रही थी।" "कुछ ही पलों में बाज़ार खत्म हो गया।"
जैसे ही आपदा की भयावहता का पता चला, ढुंगाना और दर्जनों अन्य लोग पास के जंगल की ओर भाग गए। कस्टम चेकपॉइंट पर खड़े 300 से ज़्यादा वाहन और ट्रक बह गए। बाढ़ सयाफ्रुबेसी और नदी के निचले इलाकों की ओर बढ़ी, इसने रास्ते में आने वाली लगभग हर चीज़ को अपनी चपेट में ले लिया—इसमें लोग, जानवर, इमारतें और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा शामिल थे। प्रधानमंत्री कार्यालय के एक बयान के अनुसार, सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनमें 391 विदेशी और 44 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। लापता लोगों में कम से कम 133 भारतीय बताये गए हैं.
पिछले साल भी इसी नदी में बाढ़ आई थी और तबाह हुए इलाके अभी तक सामान्य स्थिति में नहीं लौट पाए थे। पिछले साल 8 जुलाई को लेंडे नदी में आई बाढ़ में कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई थी और इस रास्ते पर कई जगहों पर सड़क का कुछ हिस्सा बह गया था। इसने नेपाल और चीन को जोड़ने वाले मितरी पुल को बहा दिया था। अधिकारियों का कहना है कि अचानक आई बाढ़ के बारे में सही जानकारी न होने के कारण जान-माल का भारी नुकसान हुआ। रसुवा ज़िला प्रशासन कार्यालय के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें तिब्बत से शुरू हुई बाढ़ के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
इस घटना ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है। क्या नेपाल की नदियों में बड़ी बाढ़ आने के बाद ही निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को चेतावनी दी जानी चाहिए, या फिर हिमालय के संवेदनशील इलाके में कोई घटना होते ही जानकारी पाने का कोई सिस्टम होना चाहिए? समस्या सिर्फ़ नेपाल और चीन के बीच जानकारी साझा करने तक ही सीमित नहीं है। ऐसा लगता है कि बाढ़ आने से पहले नेपाल ने अपने इलाके में जो उपकरण लगाए थे, वे भी चेतावनी भेजने में नाकाम रहे।
सबसे ज़्यादा भारतीय टूरिस्ट लापता हैं। अब तक, 133 भारत से, 47 US से, 34 ऑस्ट्रेलिया से, 33 UK से, 24 कनाडा से, 19 मलेशिया से, सात यूक्रेन से, छह-छह सिंगापुर और साउथ अफ्रीका से, और पाँच-पाँच न्यूज़ीलैंड और जापान से हैं। इसके अलावा, नेपाल टूरिज्म बोर्ड के मुताबिक, जर्मनी, फ्रांस, रूस, स्पेन, आयरलैंड, नीदरलैंड्स और दूसरे 25 से ज़्यादा देशों के नागरिक बाढ़ में लापता हैं। बाढ़ से तिमुरे और स्याफ्रूबेसी इलाकों में बस्तियों, पुलिस चौकियों और कस्टम ऑफिस को बड़ा नुकसान हुआ है। बाढ़ की वजह से रसुवागढ़ी बॉर्डर क्रॉसिंग को जोड़ने वाली सड़कें और पुल भी खराब हो गए हैं।
नेपाल टूरिज्म बोर्ड ने किसी भी जानकारी या मदद के लिए टोल फ्री नंबर 1234, हॉटलाइन नंबर 1144 और टूरिज्म पुलिस 9851289445 पर संपर्क करने को कहा है।