CJI की मौजूदगी पर विवाद, NLSIU ने दीक्षांत समारोह किया रद्द
यह फैसला उस विवाद के बाद आया है, जिसमें छात्रों ने प्रस्तावित दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की मौजूदगी का विरोध किया था।
नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) ने 12 सितंबर को प्रस्तावित अपना 2026 का दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया है। विश्वविद्यालय ने इसके पीछे “अपरिहार्य परिस्थितियों” का हवाला दिया है।

यह फैसला उस विवाद के बाद आया है, जिसमें छात्रों ने प्रस्तावित दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की मौजूदगी का विरोध किया था। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कुछ समय के लिए NLSIU के 2026 बैच की नामांकन प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। बाद में छात्रों और पूर्व छात्रों ने समारोह में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा और भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रस्तावित उपस्थिति पर भी आपत्ति जताई थी।
Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि,
अब स्नातक कर रहे छात्रों को उनकी अनुपस्थिति में डिग्रियां प्रदान की जाएंगी। यानी छात्रों को किसी औपचारिक दीक्षांत समारोह में शामिल हुए बिना ही प्रमाणपत्र मिलेंगे।विश्वविद्यालय ने 3 अगस्त को ईमेल के जरिए छात्रों को बताया था कि दीक्षांत समारोह 12 सितंबर को आयोजित किया जाएगा। हालांकि, 27 अगस्त को जारी नए नोटिस में कहा गया कि “अपरिहार्य परिस्थितियों” के कारण अब समारोह आयोजित नहीं होगा।
नोटिस में कहा गया,
हमारे सामूहिक और भरसक प्रयासों के बावजूद अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण हम 34वां वार्षिक दीक्षांत समारोह आयोजित करने में असमर्थ हैं।” शासी निकायों की आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद सभी स्नातक छात्रों को उनकी अनुपस्थिति में डिग्रियां प्रदान की जाएंगी।
विश्वविद्यालय ने कहा,
छात्र अपने प्रमाणपत्र कूरियर के माध्यम से मंगवा सकते हैं या परिसर से स्वयं प्राप्त कर सकते हैं। पसंदीदा विकल्प चुनने के लिए विश्वविद्यालय जल्द ही एक नया फॉर्म और पूरी प्रक्रिया सभी स्नातक छात्रों के साथ साझा करेगा।”
इस घोषणा पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने भी प्रतिक्रिया दी है। संगठन के सह-संयोजक सौरव दास ने उम्मीद जताई कि स्नातक बैच अपना अलग दीक्षांत समारोह आयोजित करेगा और छात्रों को सम्मानित करने के लिए किसी खास अतिथि को आमंत्रित करेगा।
सौरव दास ने कहा कि,
मुझे उम्मीद है कि NLSIU का स्नातक बैच अपना दीक्षांत समारोह खुद आयोजित करेगा और छात्रों को सम्मानित करने के लिए सबसे सम्माननीय अतिथि को आमंत्रित करेगा। इसे जेन-Z के अंदाज में कीजिए!
गौरतलब है कि इससे पहले बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और उसके लगभग डेढ़ दशक से अध्यक्ष रहे मनन कुमार मिश्रा ने सीजेआई सूर्यकांत के सम्मान में फरमान जारी कर दिया था कि NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से इस साल ग्रेजुएट होने वाले सभी छात्र वकालत नहीं कर सकेंगे। लेकिन लोकतंत्र की ताकत का इन्हें शायद अंदाजा नहीं था।
उनके इस फरमान का इतना विरोध हुआ कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को कुछ ही घंटों के भीतर अपना वह आदेश वापस लेना पड़ा, जिसने हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से इस साल ग्रेजुएट होने वाले सभी छात्रों के करियर पर रोक लगा दी थी। यह आदेश उन खबरों के बाद जारी किया गया था, जिनमें कहा गया था कि कैंपस के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस सूर्यकांत के प्रस्तावित कार्यक्रम का विरोध किया था।
Bar and Bench की एक रिपोर्ट के अनुसार, कानूनी शिक्षा और वकालत की सर्वोच्च नियामक संस्था BCI ने दिन में पहले एक अभूतपूर्व आदेश जारी करते हुए सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे इस साल NALSAR से ग्रेजुएट होने वाले किसी भी छात्र का वकील के रूप में नामांकन न करें। यह कार्रवाई कुछ छात्रों द्वारा चलाए गए कैंपस अभियान की मीडिया रिपोर्टों के आधार पर की गई थी। इस फैसले के बाद राजनेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स की ओर से जबरदस्त तीखी आलोचना हुई थी। छात्र मुद्दों पर नरेंद्र मोदी सरकार को हाल में झुकने के लिए मजबूर करने वाली कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) ने एक और विरोध प्रदर्शन की चेतावनी भी दी थी।
नियमों के अनुसार, कानून की डिग्री पूरी करने और साल में दो बार आयोजित होने वाली ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास करने के बाद किसी व्यक्ति को वकालत के लिए नामांकित किया जा सकता है। BCI के चेयरमैन और BJP के राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा द्वारा सभी राज्य बार काउंसिलों को भेजे गए पहले आदेश में कहा गया था कि,
अगले आदेश तक NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ का कोई भी छात्र, जिसने वर्ष 2026 में कानून की डिग्री प्राप्त की है, किसी भी राज्य बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकित नहीं किया जाएगा।
आदेश में यह भी कहा गया था कि इस स्तर पर BCI यह नहीं मान रही है कि संबंधित प्रतिनिधित्व या अभियान में हिस्सा लेने मात्र से कोई व्यक्ति धारा 24A के तहत नामांकन के लिए अयोग्य हो गया है। हालांकि, आदेश में कहा गया कि BCI कुछ आवेदकों के मामले में पेशे में प्रवेश को नियंत्रित करने वाले नियामकीय पहलुओं” की जांच कर रही है। ऐसी जांच लंबित रहने के दौरान ग्रेजुएट छात्रों का नामांकन कर दिया गया तो इससे ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसे बाद में पलटना मुश्किल होगा और वैधानिक जांच निष्प्रभावी हो सकती है।
लेकिन कैंपस में असहमति के खिलाफ इस कार्रवाई पर हंगामा बढ़ने के बाद मिश्रा ने नया आदेश जारी करते हुए पहले आदेश को “संशोधित” कर दिया।
दूसरे आदेश में कहा गया कि,
सभी छात्र अपनी पसंद की राज्य बार काउंसिल में नामांकन कराने के हकदार होंगे।”
हालांकि, शुरुआती आदेश की आलोचना करने वाले कई लोगों ने यह सवाल उठाया था कि लोकतंत्र में किसी कैंपस कार्यक्रम में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की प्रस्तावित भागीदारी का विरोध करना अपने आप में सजा देने योग्य कैसे हो सकता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लॉ यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने अभियान चलाकर वाइस-चांसलर और अन्य अधिकारियों को दीक्षांत समारोह में जस्टिस सूर्यकांत को आमंत्रित नहीं करने के लिए राजी किया था। बताया गया कि इन छात्रों का तर्क था कि जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सुरक्षा बलों की ज्यादतियों पर कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं को लेकर जस्टिस सूर्यकांत का रुख स्थापित कानूनी न्यायशास्त्र के अनुरूप नहीं था।
हाल ही में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने अपना दीक्षांत समारोह स्थगित कर दिया था, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत को शामिल होना था। ऐसी खबरें थीं कि उनकी मौजूदगी के खिलाफ संभावित छात्र विरोध को देखते हुए कैंपस प्रशासन को कार्यक्रम स्थगित करने की सलाह दी गई थी। हालांकि, संस्थान ने ऐसी कोई सलाह मिलने से इनकार किया था।