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बिहार में क्यों भड़का छात्रों का गुस्सा?

Roqaiya Bushri Roqaiya Bushri | 1h ago · 8 min read
बिहार में क्यों भड़का छात्रों का गुस्सा?

जिन युवाओं के भविष्य का फैसला एक परीक्षा से होना है, उनके सवालों के जवाब में ऐसी भाषा क्यों आई?

बिहार में छात्रों ने 25 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास के घेराव के लिए मार्च निकालने की घोषणा कई दिन पहले ही कर दी थी। मंगलवार को जब वो अपनी तय योजना के मुताबिक मार्च लेकर आगे बढ़े तो रास्ते में बैरिकेड लगाकर उन्हें रोकने की कोशिश की गई। छात्रों ने बैरिकेड पार किए और पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। लाठीचार्ज किया गया। कई छात्रों के सिर फटे और वो गंभीर रूप से घायल अस्पताल में भर्ती हैं।


लेकिन मंगलवार के छात्र प्रदर्शन की तस्वीर को सिर्फ एक प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई की तस्वीर मान लेना इस पूरे मामले को बहुत छोटा कर देना होगा। इसके पीछे कई महीनों से जमा होता आ रहा छात्रों का वो गुस्सा है, जो बार बार टलती भर्तियों, परीक्षाओं में गड़बड़ियों, अस्पष्ट प्रक्रियाओं और प्रशासन की चुप्पी से पैदा हुआ है।

इसी बीच आग में घी डालने का काम BPSC के परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार सिंह के बयान ने कर दिया , जिसने छात्रों के आक्रोश को और भड़का दिया। प्रदर्शन और परीक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा,


"हाथी चले बाजार, कुत्ता भौंके हजार।" छात्रों ने इस कहावत को अपने आंदोलन और अपनी आवाज़ के अपमान के रूप में लिया। विवाद बढ़ने के बाद राज्य सरकार ने राजेश कुमार सिंह को निलंबित कर दिया। बाद में अधिकारी ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने कहावत का इस्तेमाल किया था और उनके शब्दों से किसी को ठेस पहुंची हो तो उन्हें खेद है।

लेकिन सवाल यह है कि जिन युवाओं के भविष्य का फैसला एक परीक्षा से होना है, उनके सवालों के जवाब में ऐसी भाषा क्यों आई? क्या परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाना इतना मामूली है कि उसे एक कहावत के सहारे खारिज कर दिया जाए? छात्रों का गुस्सा सिर्फ उस बयान तक सीमित नहीं है। बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर है, जिसमें उन्हें बार बार अपनी बात मनवाने के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है।

गर्दनीबाग तक कैसे पहुंचा आंदोलन

इस आंदोलन की शुरुआत अचानक नहीं हुई। 8 मई को TRE-4 का विज्ञापन जारी करने और भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी मांगों को लेकर बड़ी संख्या में अभ्यर्थी पटना की सड़कों पर उतरे थे। उस दौरान पुलिस कार्रवाई और FIR की खबर सामने आई थी। इसके बाद भी छात्रों की मांगें खत्म नहीं हुईं। फिर 18 अगस्त से गर्दनीबाग में आमरण अनशन शुरू हुआ। शुरुआत में छात्रों की मुख्य मांग TRE-4 का विज्ञापन जारी करना थी।

आखिरकार 32,388 शिक्षक पदों के लिए TRE-4 का विज्ञापन और परीक्षा कार्यक्रम जारी कर दिया गया। लेकिन विज्ञापन आते ही आंदोलन खत्म नहीं हुआ। क्योंकि छात्रों का कहना है कि उनकी समस्या सिर्फ विज्ञापन तक सीमित नहीं है। वो चाहते हैं कि,

TRE-4 की परीक्षा एक ही चरण में हो, नकारात्मक अंक व्यवस्था खत्म की जाए और भर्ती में बिहार के स्थानीय अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा की जाए। इसके साथ ही लंबित भर्तियों को पूरा करने, TRE-1, TRE-2 और TRE-3 के बचे हुए पदों पर पूरक परिणाम जारी करने, वास्तविक रिक्तियों के अनुसार सीटें बढ़ाने और BSSC की लंबित भर्तियों को पूरा करने जैसी मांगें भी उठ रही हैं।

यानी जिस आंदोलन की शुरुआत एक विज्ञापन की मांग से हुई थी, वो अब बिहार की पूरी भर्ती व्यवस्था पर सवाल बन चुका है। और यही समझना जरूरी है कि आखिर विज्ञापन जारी होने के बाद भी छात्र सड़क पर क्यों हैं? क्योंकि एक युवा के लिए सिर्फ यह जान लेना काफी नहीं है कि भर्ती निकलेगी। उसे यह भरोसा भी चाहिए कि परीक्षा समय पर होगी, निष्पक्ष होगी, परिणाम समय पर आएगा और नियुक्ति के लिए उसे वर्षों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

बिहार में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा पहले विज्ञापन का इंतजार करता है, फिर परीक्षा का, फिर परिणाम का और फिर नियुक्ति का। इस बीच उम्र निकलती रहती है और परिवार का पैसा तथा छात्र की मेहनत दोनों खर्च होते रहते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उसके भीतर का असंतोष सड़क तक पहुंचना अस्वाभाविक नहीं है।

BPSC और टूटता हुआ भरोसा

यहां BPSC के पुराने विवादों को भी याद करना जरूरी है। क्योंकि छात्रों का असंतोष सिर्फ आज की किसी एक घटना से पैदा नहीं हुआ है। 2022 में 67वीं BPSC प्रारंभिक परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप के बाद रद्द करनी पड़ी थी। उस समय भी हजारों अभ्यर्थियों की मेहनत और समय पर इसका सीधा असर पड़ा था। इसके बाद 2024 में TRE-3 की परीक्षा भी प्रश्नपत्र लीक के मामले के बाद रद्द कर दी गई। उस परीक्षा में लाखों अभ्यर्थी शामिल हुए थे और हजारों शिक्षक पदों पर भर्ती होनी थी।

फिर 70वीं BPSC ने एक नया विवाद खड़ा किया। अभ्यर्थियों ने प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा केंद्रों पर अनियमितताओं के आरोप लगाए। मामला पटना हाई कोर्ट तक पहुंचा। अदालत की प्रक्रिया में अभ्यर्थियों की ओर से परीक्षा में अनियमितताओं के कई आरोप सामने आए। बाद में पूरे राज्य में परीक्षा रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं हुई और एक परीक्षा केंद्र के लिए दोबारा परीक्षा कराने के आयोग के फैसले को बरकरार रखा गया।

लेकिन कानूनी फैसला अपनी जगह है और छात्रों का भरोसा अपनी जगह। अगर किसी परीक्षा के बाद हजारों अभ्यर्थी लगातार सवाल उठा रहे हैं तो उन सवालों को केवल विरोध की आवाज समझकर छोड़ देना समस्या का समाधान नहीं है।

इसी संदर्भ में अभ्यर्थियों पर कार्रवाई और डिबारमेंट का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 70वीं BPSC के बाद कुछ अभ्यर्थियों को कथित अनुचित साधनों के इस्तेमाल के मामले में तीन साल के लिए डिबार किए जाने की कार्रवाई हुई। आयोग के पास अनुशासन बनाए रखने और अनुचित साधनों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन छात्रों का सवाल यह है कि परीक्षा व्यवस्था को लेकर शिकायत करने वाले अभ्यर्थियों की शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई कौन करेगा?

किसी युवा के लिए तीन साल केवल कैलेंडर के तीन साल नहीं होते। वो उसके जीवन का वो समय है, जिसमें उसकी उम्र, उसकी तैयारी और उसके करियर के अवसर आगे बढ़ते हैं। इसलिए किसी अभ्यर्थी पर तीन साल की पाबंदी जैसी कार्रवाई उसके पूरे भविष्य को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि छात्रों का सवाल केवल नौकरी का नहीं है। सवाल यह है कि जिस व्यवस्था के हाथ में उनके भविष्य का फैसला है, उस व्यवस्था पर वो भरोसा कैसे करें?

एक युवा कई साल तैयारी करता है। परिवार उसकी पढ़ाई का खर्च उठाता है। वो अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण साल किताबों और नोट्स के बीच गुजार देता है। उसके सामने एक ही सपना होता है कि परीक्षा पास होगी, नौकरी मिलेगी और जिंदगी थोड़ी बेहतर होगी। लेकिन फिर कभी विज्ञापन में देरी होती है, कभी परीक्षा में। कभी परीक्षा पर सवाल उठता है, कभी रिजल्ट पर। कभी पेपर लीक की खबर आती है और कभी भर्ती प्रक्रिया ही विवाद में चली जाती है। और जब वही छात्र सवाल पूछने सड़क पर आता है तो उसके सामने बैरिकेड खड़े कर दिए जाते हैं, वाटर कैनन चलती है, लाठीचार्ज होता है, हिरासत होती है और FIR होती है। आखिर हर बार कीमत छात्र ही क्यों चुकाए?

सवाल नौकरी से कहीं बड़ा है

आज शिक्षा मंत्री की ओर से यह कहा गया है कि छात्रों की लगभग सभी समस्याओं का समाधान कर दिया गया है और सरकार संवाद के लिए तैयार है। सरकार ने छात्रों की शिकायतों के लिए विद्यार्थी सहयोग शिविर, हेल्पलाइन और ऑनलाइन व्यवस्था शुरू करने की बात भी कही है।

दूसरी तरफ BPSC ने साफ कर दिया है कि नकारात्मक अंक व्यवस्था खत्म नहीं की जाएगी और उसकी परीक्षाएं कम से कम दो चरणों में होंगी। यानी सरकार और आयोग की ओर से समाधान का दावा अपनी जगह है, लेकिन छात्रों का आंदोलन अपनी जगह जारी है। और यही सबसे बड़ा सवाल है।

इन सवालों का जवाब केवल बयान देकर नहीं दिया जा सकता। जवाब तब मिलेगा जब भर्ती समय पर होगी। जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठेंगे। जब प्रश्नपत्र लीक करने वाले गिरोहों पर ऐसी कार्रवाई होगी कि दोबारा किसी को ऐसा करने की हिम्मत ना हो। जब OMR और उत्तर कुंजी को लेकर अभ्यर्थियों को संदेह की स्थिति में नहीं रहना पड़ेगा। परिणाम और नियुक्ति वर्षों तक नहीं अटकेगी। और जब कोई छात्र अपनी शिकायत लेकर आयोग के सामने जाएगा तो उसे सुना जाएगा, उसकी आवाज का मजाक नहीं बनाया जाएगा।

क्योंकि गर्दनीबाग में बैठे छात्र सिर्फ अपनी नौकरी की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। वो अपने समय की कीमत मांग रहे हैं। वो अपनी मेहनत का सम्मान मांग रहे हैं। वो अपने भविष्य पर भरोसा मांग रहे हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या बैरिकेड से छात्रों के सवाल रुक जाएंगे? क्या वाटर कैनन से भर्ती व्यवस्था पर उठे सवाल धुल जाएंगे? क्या लाठीचार्ज से उस युवा की बेचैनी खत्म हो जाएगी, जिसने अपनी उम्र के कई साल एक सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा दिए हैं? शायद नहीं।

क्योंकि गर्दनीबाग में आज सिर्फ कुछ अभ्यर्थी नहीं बैठे हैं। वहां बिहार के उस युवा वर्ग का भरोसा बैठा है, जो चाहता है कि उसकी मेहनत का फैसला किसी लापरवाही, किसी पेपर लीक, किसी अनियमितता या किसी अपारदर्शी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष व्यवस्था से हो। सरकार के पास सत्ता है, आयोग के पास व्यवस्था है, लेकिन छात्रों के पास उनका सवाल है। और लोकतंत्र में किसी भी सरकार की असली परीक्षा यही होती है कि वो अपने खिलाफ उठे सवालों को दबाती है या उनका जवाब देती है। गर्दनीबाग का छात्र आंदोलन इसलिए केवल नौकरी का आंदोलन नहीं है। यह बिहार की भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा है। और इस परीक्षा में सवाल छात्रों से नहीं, अब व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।

Roqaiya Bushri

Roqaiya Bushri

शोधार्थी रौकेया बसरी को सामाजिक,राजनीतिक और महिलाओं के मुद्दे पर लिखने में रुचि है।