अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा और भारत की नई मान्यता: समस्या कहाँ है?
चीन अरुणाचल को “दक्षिण तिब्बत” के रूप में स्वीकारता है और भारत के अधिकार को नकारता है।
- -नित्य नगीना मिश्रा
अरुणाचल प्रदेश की पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल के चीन द्वारा भारतीय सेना की अरुणाचल प्रदेश के महत्वपूर्ण इलाकों में पहुँच को सीमित किए जाने के आरोप के बीच गृह मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के 27 इलाकों को भारतीय नक्शे में आधिकारिक रूप से मान्यता दी है।
अरुणाचल प्रदेश पर चीनी दावा नया नहीं है।1959 में शुरुआती झगड़ों का केंद्र भी अरुणाचल प्रदेश का लॉंग जु क्षेत्र था। इसी के साथ माजा, थाँग ला आदि इलाकों पर भी चीन देर सबेर अपने दावे को पेश करते रहता है। भारत-चीन के 64 साल के तनाव भरे इतिहास में चीन अरुणाचल पर अपने दावे को लेकर अधिक उग्र नजर आता है।
गौरतलब है कि चीन दुनिया की 20 प्रतिशत आबादी वाला देश होने के बाद भी जल के महज 6 प्रतिशत हिस्से पर काबिज है। पहले ही जल की कमी के साथ ही जल का वितरण भी उसके लिए चिंता का सबब है। दरअसल चीन के 80 प्रतिशत जल संसाधन यांगजते नदी के दक्षिण में है जबकि उसकी आबादी का बड़ा हिस्सा चीन के उत्तरी मैदानों में रहता है। इन मैदानों पर रहने वाली आबादी चीन के वैश्विक विनिर्माण साम्राज्य का हिस्सा न होकर अभी भी मुख्यत: कृषि गतिविधियों में संलग्न है। ऐसी हालत में अरुणाचल चीन के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ब्रह्मपुत्र नदी का 60 प्रतिशत जल भारतीय इलाके में आता है। समय के साथ बढ़ते चिप विनिर्माण ने भी जल की महत्ता को चीन के लिए बढ़ा दिया है क्योंकि अमेरिकी आर्थिक साम्राज्य से स्वयं को बचाने और आने वाले समय में दुनिया की खुद पर तकनीकी निर्भरता को बनाए रखने के उसकी आत्मनिर्भरता आवश्यक है|
पूर्व विदेश सचिव श्याम शरण अपनी किताब How India Sees the World: Kautilya to the 21st Century में एक चीनी राजा की कहानी बताते हुए लिखते हैं कि चीनी आक्रामकता का मूल उसकी असुरक्षा है। पिछले कई वर्षों में चीन ने अपनी असुरक्षा से निपटने के लिए कई काम किए, जिसमें एक चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा है ताकि वह मलक्का क्षेत्र में किसी भी प्रकार के खतरे की संभावना से अपनी आर्थिकी को बचा सके। इसी प्रकार अरुणाचल भी उसके लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
अरुणाचल प्रदेश का 3500 मीटर पर बसा तवांग क्षेत्र चीन के लिए एक रणनीतिक खतरा है जो किसी भी प्रकार के विवाद पर उसके लिए खतरा बन सकता है।1967 में सिक्किम के नाथु ला क्षेत्र में भारत चीन झड़प में चीन के पर्वतों पर लड़ाई के अनुभव भी खासा अच्छे नहीं रहे। ऐसे में चीनी असुरक्षा बार बार अरुणाचल प्रदेश पर उसके दावे के रूप में दुनिया के सामने आती रहती है।
तमाम रणनीतिक और संसाधनजन्य कारणों के अतिरिक्त इस विवाद का एक सांस्कृतिक पहलू भी है जिसकी चर्चा बहुत कम होती है। वैश्विक राजनीति में चीन की दो मुख्य कमजोर कड़ी मानी जाती है। इनमे से एक तिब्बत है जिसे चीन ने पहले ही हासिल कर लिया है और दूसरा ताइवान, जो चीन का एक अधूरा काम है जिसे पूरा करने के संकल्प को वह देर सवेर दोहराता रहता है।
तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के मध्य सांस्कृतिक, राजनीतिक रिश्ते बहुत पुराने रहे है। तवांग में रहने वाले मोंपा लोगों का रहन सहन, अरुणाचल प्रदेश में प्रचलित बुद्ध धर्म की प्रकृति आदि की समानता तिब्बत में रहने वाले लोगों से है।

तवांग मठ का निर्माण भी पाँचवे दलाई लामा के कहने पर हुई थी और साथ ही छठवें दलाई लामा का जन्म भी अरुणाचल में ही हुआ था। ये सारे तथ्य बताते है कि तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश सदैव ही एक समाज के तौर पर आपस में जुड़े हुए रहे हैं। ऐसे में तिब्बत पर अपने रुख और मजबूत करने के लिए अरुणाचल पर चीन हमेशा दावा ठोकता रहता है। गौरतलब है कि चीन अरुणाचल को “दक्षिण तिब्बत” के रूप में स्वीकारता है और भारत के अधिकार को नकारता है। हालांकि तिब्बत पर उसका दावा भी विवादित है और दलाई लामा तिब्बत पर चीन के अधिकार को चुनौती देते रहते हैं।
ऐसे में भारत सरकार को चाहिए कि चीनी दावों को खुले तौर पर अस्वीकार करें ताकि न केवल भारतीय रुख मजबूत हो बल्कि अरुणाचल प्रदेश में रहने वाले भारतीय भी बिना किसी डर के एक सुरक्षित कल के सपने को देख सके। क्योंकि कोई भी देश राष्ट्र ज़मीन से अधिक वहां रहने वाले लोगों से बनता है।