क्या जनगणना के बहाने मोदी सरकार पता करेगी लोगों की नागरिकता?
जनगणना के लिए जो सवाल बनाए गए हैं उसको लेकर राजनीतिक दलों ने चिंता व्यक्त की है।
जनगणना के लिए जो सवाल पूछे जा रहे हैं, क्या वो उसी “क्रोनोलॉजी” का एक हिस्सा है जिसमें CAA के बाद NRC आने की बात कही गई थी। एक तरफ विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिये वोटर लिस्ट से मुसलमानों के नाम काटे जा रहे हैं और दूसरी तरफ जनगणना के जरिये नागरिकता पता करने की तैयारी है। जनगणना के लिए जो सवाल बनाए गए हैं उसको लेकर राजनीतिक दलों ने चिंता व्यक्त की है।
Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, जनगणना 2027 के जनसंख्या गणना चरण के लिए तैयार की गई प्रश्नावली को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि उत्तरदाताओं और उनके माता-पिता के बारे में विस्तृत सवालों को शामिल करने से लोगों की निगरानी का रास्ता खुल सकता है और इसके पीछे कोई “गहरा दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य” हो सकता है। वाम दलों ने भी इसी तरह की चिंताएं जताई हैं।
यह विवाद 15 अगस्त को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ।
रिपोर्ट में बताया गया था कि जनगणना की प्रश्नावली में शामिल कई नए या संशोधित सवाल 2020 में अधिसूचित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) की प्रश्नावली का भी हिस्सा थे। उस समय नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों और देशव्यापी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की आशंकाओं के बीच NPR भी विवादों में आ गया था।
जनसंख्या गणना की प्रश्नावली में कुल 40 सवाल हैं। इनमें से 14 सवाल 2011 की जनगणना की तुलना में नए हैं या उनमें बदलाव किया गया है। इनमें पति या पत्नी का नाम, स्वयं घोषित राष्ट्रीयता, पिता और माता से जुड़ी जानकारी, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/जाति, साक्षरता और डिजिटल साक्षरता, उच्चतम शैक्षणिक योग्यता और पढ़ाई की धारा, कोविड-19 टीकाकरण का स्थान, बैंक खातों की संख्या, मोबाइल नंबर, आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस से संबंधित सवाल शामिल हैं। इनमें से आठ सवाल—स्वयं घोषित राष्ट्रीयता, पिता और माता की जानकारी, मोबाइल नंबर, आधार, वोटर आईडी, पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस—2020 की NPR प्रश्नावली में भी शामिल थे।
माता-पिता से जुड़े सवाल विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। 2020 की NPR प्रश्नावली में किसी व्यक्ति के पिता और माता की जन्मतिथि और जन्मस्थान पूछा गया था। इसमें जिला और राज्य की जानकारी भी मांगी गई थी और यदि माता-पिता का जन्म भारत से बाहर हुआ था, तो उस देश का नाम भी पूछा गया था। यही सवाल उस समय NPR के राजनीतिक विरोध के केंद्र में थे। इस मामले में मुख्य रूप से दो अलग-अलग चिंताएं हैं—पहली निजता यानी प्राइवेसी की और दूसरी उस राजनीतिक संदर्भ की, जिसमें NPR को दोबारा शुरू किया गया था।
निजता को लेकर तर्क यह है कि परंपरागत रूप से जनगणना के आंकड़े जनसंख्या से जुड़े आंकड़ों और योजनाएं बनाने के लिए जुटाए जाते रहे हैं। लेकिन नई प्रश्नावली में व्यक्तिगत जानकारी का दायरा काफी बढ़ गया है। इसमें ऐसी जानकारियां भी शामिल हैं जिनसे किसी व्यक्ति की पहचान की जा सकती है या उसकी जानकारी को सरकार के दूसरे डेटाबेस से जोड़ा जा सकता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि सरकार कितना डेटा इकट्ठा कर रही है, बल्कि यह भी है कि उस डेटा को कैसे रखा जाएगा, उसकी सुरक्षा कैसे होगी और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाएगा।
दूसरी चिंता नागरिकता से जुड़ी है। राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) देश के “सामान्य निवासियों” का रजिस्टर है, नागरिकों का रजिस्टर नहीं। सामान्य निवासी वह व्यक्ति है जो किसी स्थानीय क्षेत्र में कम से कम छह महीने से रह रहा हो या अगले छह महीने तक वहां रहने का इरादा रखता हो। इस परिभाषा के तहत कोई विदेशी नागरिक भी सामान्य निवासी हो सकता है, यदि वह निवास की इस शर्त को पूरा करता है।
हालांकि, कानून में NPR को भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने की प्रक्रिया से जोड़ा गया है। नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना) नियम, 2003 में जनसंख्या रजिस्टर तैयार करने और नागरिकों का रजिस्टर बनाने के लिए उसके सत्यापन का प्रावधान है। नियमों में यह भी व्यवस्था है कि जिन व्यक्तियों की नागरिकता को संदिग्ध माना जाता है, उन्हें आगे की जांच के लिए चिह्नित किया जा सकता है।
यह कानूनी संबंध 2019-20 में राजनीतिक रूप से बेहद विवादास्पद हो गया था। NPR को उस समय दोबारा शुरू किया जा रहा था, जब CAA पारित हो चुका था और असम में NRC की प्रक्रिया के बाद करीब 19 लाख लोगों को सूची से बाहर रखा गया था। इसी दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई बार देशव्यापी NRC की बात की और लोगों से उस “क्रोनोलॉजी” को समझने को कहा, जिसमें CAA के बाद NRC आने की बात कही गई थी।
हालांकि, NPR कोई नई व्यवस्था नहीं थी। इसे पहली बार 2010 में 2011 की जनगणना के मकान सूचीकरण चरण के साथ तैयार किया गया था। इसके बाद 2015 में घर-घर जाकर किए गए सर्वे के जरिए इसे अपडेट किया गया था। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों ने इस पूरी प्रक्रिया को देखने का नजरिया बुनियादी रूप से बदल दिया। जो प्रक्रिया पहले बिना किसी बड़े विवाद के पूरी हो गई थी, वही बाद में इस आशंका से जुड़ गई कि इसके जरिए लोगों की नागरिकता पर सवाल उठाए जा सकते हैं। सरकार ने लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान से जुड़े विवादित सवालों का जवाब देना अनिवार्य नहीं होगा।
तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था कि,
यदि किसी व्यक्ति को अपने माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान याद है, तो वह यह जानकारी दे सकता है। यदि उसे यह जानकारी याद नहीं है, तो संबंधित कॉलम खाली छोड़े जा सकते हैं।
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने भी कहा था कि,
केवल इसलिए किसी व्यक्ति की नागरिकता नहीं जा सकती कि उसे अपने माता-पिता की जन्मतिथि या जन्मस्थान की जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसी जानकारी के लिए किसी तरह का दस्तावेजी प्रमाण देने की जरूरत नहीं होगी।
सरकार का यह भी कहना था कि NPR मुख्य रूप से देश के निवासियों का एक डेटाबेस है, जिसका उद्देश्य बेहतर नीतियां बनाना और कल्याणकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी तरीके से लोगों तक पहुंचाना है। अमित शाह ने तर्क दिया था कि किसी क्षेत्र की जनसांख्यिकीय संरचना की जानकारी होने से सरकारों को सेवाओं की योजना बनाने और लाभार्थियों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, एक विरोधाभास ने अविश्वास को और बढ़ाया। दिसंबर 2019 में अमित शाह ने कहा था कि NPR के आंकड़ों का इस्तेमाल कभी NRC के लिए नहीं किया जाएगा और दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग कानूनों के तहत संचालित होती हैं। लेकिन इससे पहले संसद में दिए गए सरकारी बयानों और नागरिकता नियमों में स्वयं जनसंख्या रजिस्टर को नागरिकों का रजिस्टर तैयार करने की प्रक्रिया से स्पष्ट रूप से जोड़ा गया था। विस्तृत जनसांख्यिकीय जानकारी जुटाने के पक्ष में एक वैध प्रशासनिक तर्क भी मौजूद है।
सरकार का कहना है कि देश के निवासियों का एक व्यापक डेटाबेस नीतियां तैयार करने, सार्वजनिक सेवाओं की योजना बनाने, लाभार्थियों की पहचान करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। अलग-अलग सरकारी डेटाबेस से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल रिकॉर्ड में दोहराव और विसंगतियां कम करने तथा नागरिकों के लिए कागजी कार्रवाई घटाने में भी किया जा सकता है।