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फॉर्म 6 किसने बदला? सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव की मंजूरी नहीं दी: CJI

TCN Desk TCN Desk | 47m ago · 4 min read
फॉर्म 6 किसने बदला? सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव की मंजूरी नहीं दी: CJI

सीजेआई की यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई।

मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में कथित गैरकानूनी बदलावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि उसने किसी भी संशोधित Form 6 को मंजूरी नहीं दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग की रिपोर्ट आने के बाद अदालत यह देखना चाहेगी कि किसने क्या बदलाव किए। यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई।


Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने Form 6 में जोड़ी गई नई शर्तों का मुद्दा उठाया। उन्होंने दलील दी कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने वाले नए आवेदकों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे इस वैधानिक फॉर्म में ऐसे बदलाव किए गए, जिनकी कानून के तहत अनुमति नहीं थी। उनके मुताबिक, इन बदलावों का असर पात्र मतदाताओं के पंजीकरण पर पड़ा।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि,

यह बिल्कुल स्पष्ट कर दें कि किसी भी संशोधित Form 6 को हमने मंजूरी नहीं दी है। यह भी स्पष्ट कर दें कि जब रिपोर्ट पेश की जाएगी, तो हम देखना चाहेंगे कि किसने क्या संशोधित किया है।
अदालत की इस टिप्पणी के बाद फॉर्म में किए गए बदलावों और उनके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल सामने आए हैं।
विवाद चुनाव आयोग के ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण फॉर्म से जुड़ा है। पहली बार Form 6 के डिजिटल संस्करण में एक नया हिस्सा शामिल किया गया, जिसमें आवेदक के माता-पिता की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी गई।

यह जानकारी पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया, यानी एसआईआर, की मतदाता सूची के संदर्भ में मांगी जा रही थी। हालांकि, वैधानिक फॉर्म में कोई संशोधन नहीं किया गया था।

Form 6 नए मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होता है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब कानून के तहत निर्धारित फॉर्म को बदला ही नहीं गया, तो उसके ऑनलाइन संस्करण में अतिरिक्त शर्तें कैसे जोड़ी गईं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इससे पहली बार मतदाता बनने जा रहे पात्र युवाओं को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ा।

इस बीच चुनाव आयोग ने उन राज्यों में अपने ECINet आवेदन पोर्टल से Form 6 में जोड़ी गई एसआईआर संबंधी घोषणा हटा दी, जहां एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। आयोग ने 26 सितंबर को घोषणा की थी कि एसआईआर की अवधि के बाहर मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के अनुसार लागू होने वाले फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे। यह घोषणा ऑनलाइन फॉर्म में अतिरिक्त जानकारी मांगे जाने के विवाद के बीच की गई थी।

सुनवाई के दौरान मेनका गुरुस्वामी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दिल्ली का उदाहरण रखा। उन्होंने कहा कि दिल्ली में एसआईआर किस तरह की गई, इसे देखा जाना चाहिए। उनकी दलील थी कि Form 6 में दो नई शर्तें जोड़ी गईं और ऐसे फॉर्म वितरित किए गए। उन्होंने यह भी कहा कि नए फॉर्म के आधार पर उन्हें नोटिस मिला, जबकि नियमों की अनुसूची में निर्धारित फॉर्म को इस तरह संशोधित नहीं किया जा सकता।

गुरुस्वामी अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका पर पक्ष रख रही थीं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि,

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सूचना प्रौद्योगिकी महानिदेशक के साथ मिलकर जुलाई 2026 में ECINet पोर्टल पर Form 6 को डिजिटल रूप से बदल दिया। याचिका के अनुसार, यह कदम आयोग के बाध्यकारी बहुमत के रुख की अवहेलना करते हुए उठाया गया।

याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त 2026 को औपचारिक रूप से दर्ज किया था कि यह बदलाव “अनधिकृत और गैरकानूनी” है। उन्होंने कहा था कि इसके कारण युवा और पात्र नए मतदाताओं को मनमाने ढंग से परेशान किया जा रहा है तथा इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद बदला हुआ फॉर्म पोर्टल पर उपलब्ध रहा।

याचिका का मुख्य तर्क है कि पहली बार पंजीकरण कराने वाले युवा मतदाताओं के वैधानिक Form 6 में बदलाव एकतरफा तरीके से किया गया। इसके लिए न तो विधायी अधिकार था और न ही मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन किया गया। याचिका के मुताबिक, आयोग के बहुमत की ओर से इस बदलाव को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया जाना इसकी वैधता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त को मिलने वाली आधिकारिक कानूनी सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मतदाता सूची में जानबूझकर हेरफेर करने का उनके आधिकारिक कर्तव्यों से कोई उचित कानूनी संबंध नहीं है। इसलिए ऐसा कथित कृत्य आधिकारिक प्रतिरक्षा के दायरे से बाहर है और व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी पैदा करता है। फिलहाल ये याचिका में लगाए गए आरोप हैं। सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट आने पर बदलावों की जांच करने की बात कही है।