Politics

यूपी की वोटर लिस्ट में जुड़े 16.18 लाख मतदाताओं की पहचान पर उठे गंभीर सवाल : The Reporters Collective

TCN Desk TCN Desk | 15h ago · 8 min read
यूपी की वोटर लिस्ट में जुड़े 16.18 लाख मतदाताओं की पहचान पर उठे गंभीर सवाल : The Reporters Collective

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर इन 16.18 लाख मतदाताओं का विवरण मौजूद नहीं है।

The Reporters Collective की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने SIR के दौरान उत्तर प्रदेश में जोड़े गए 16.81 लाख मतदाताओं की पहचान सार्वजनिक नहीं की है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर इन 16.18 लाख मतदाताओं के नाम जोड़ने के आवेदनों की सूची और उनका विवरण मौजूद नहीं है।


चुनाव आयोग ने जोड़े गए इन 16.81 लाख मतदाताओं की पहचान के बारे में एक रहस्यमयी चुप्पी साध रही है। कौन हैं ये रहस्यमयी वोटर? चुनाव आयोग की इस करतूत पर अब सवाल उठने लगे हैं कि बिना फोटो अपलोड किए कैसे वोटर जोड़ दिए गए।

दरअसल, कानून का उल्लंघन करते हुए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने उन 16.18 लाख मतदाताओं की पहचान सार्वजनिक नहीं की है, जिनके नाम उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के शुरुआती चरणों में जोड़ने का वह दावा करता है।

कानून के मुताबिक,

निर्वाचन आयोग को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की वेबसाइट पर मतदान केंद्रवार दावों और आपत्तियों की सूची प्रकाशित करनी होती है। इसमें “बिना तस्वीर वाले प्रत्येक व्यक्तिगत आवेदन फॉर्म तक पहुंचने की सुविधा” भी होनी चाहिए। मुख्य निर्वाचन अधिकारी किसी राज्य में चुनाव से जुड़े सभी कामों के प्रभारी निर्वाचन आयोग के शीर्ष अधिकारी होते हैं और सीधे दिल्ली स्थित आयोग को रिपोर्ट करते हैं।

The Reporters Collective ने भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विश्लेषण करते हुए कानून के इस उल्लंघन का पता लगाया। इस राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। रिपोर्ट में जांच की गई कि कितने लोगों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया था। इनमें वे लोग शामिल थे, जिनके नाम निर्वाचन आयोग ने SIR के दौरान तैयार की गई मसौदा मतदाता सूची से हटा दिए थे, या जो हाल ही में मतदान की उम्र के हुए थे। इसके बाद इन आवेदनों की संख्या की तुलना उन लोगों की संख्या से की, जिनके नाम वास्तव में अंतिम मतदाता सूची में जोड़े गए। जांच के दौरान ऐसा नतीजा मिला, जिसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं थी।

स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा अलग-अलग हिस्सों में सार्वजनिक किए गए सभी फॉर्म 6 आवेदनों को डाउनलोड किया, एकत्र किया और उनका विश्लेषण किया। जांच में पाया गया कि निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आए 71.38 लाख आवेदनों का विवरण सार्वजनिक किया था। इनमें अधिकांश आवेदन उन लोगों के थे, जिनके नाम आयोग ने मसौदा सूची से हटा दिए थे। इसके मुकाबले निर्वाचन आयोग ने अंतिम सूची में 84.3 लाख मतदाता जोड़े थे। यानी सार्वजनिक किए गए आवेदनों की संख्या से 12.92 लाख अधिक मतदाताओं के नाम सूची में जोड़ दिए गए।

कानूनी तौर पर ऐसा होना असंभव है। निर्वाचन आयोग किसी मतदाता का नाम सूची में तभी जोड़ सकता है, जब वह फॉर्म 6 के जरिए आवेदन करे। मतदाता सूची में जोड़े गए लोगों की संख्या, नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करने वालों की संख्या से अधिक नहीं हो सकती।
इसके अलावा, मसौदा सूची से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए भी निर्वाचन आयोग को कुछ लाख आवेदन मिले थे। इसे देखते हुए सूची में इतने अतिरिक्त मतदाताओं का जुड़ना और भी अविश्वसनीय लगता है।

कानूनी तौर पर असंभव दिखने वाली इस स्थिति को समझने के लिए निर्वाचन आयोग के उत्तर प्रदेश मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर SIR से संबंधित सभी आंकड़ों और सभी प्रेस विज्ञप्तियों की जांच की गई।

जांच में पता चला कि,

निर्वाचन आयोग ने 7 मार्च की एक प्रेस विज्ञप्ति में चलते-चलते एक बार उल्लेख किया था कि मसौदा सूची तैयार होने से पहले ही 16.18 लाख मतदाताओं ने सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन किया था। SIR के तहत मसौदा सूची तैयार होने के बाद ही लोगों को पता चलता है कि उनका नाम हटा दिया गया है या उन्हें अनुपस्थित, मृत, दूसरी जगह स्थानांतरित अथवा दोहरी प्रविष्टि वाला मतदाता घोषित किया गया है। लेकिन निर्वाचन आयोग ने कहा कि मसौदा सूची सार्वजनिक होने से पहले ही 16.18 लाख मतदाताओं ने फॉर्म 6 के जरिए आवेदन कर दिया था।

बता दें कि इस चरण में केवल वे नागरिक आवेदन करते, जो मतदान की उम्र के हुए हों। कानून के तहत, नाम जोड़ने या हटाने के लिए आवेदन करने वालों के नाम और विवरण सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि दूसरे लोग जांच सकें कि आवेदन वैध है या नहीं और उस पर क्या कार्रवाई की गई।

उत्तर प्रदेश के चुनाव अधिकारियों ने ये आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए। इसलिए अब यह पता लगाना संभव नहीं है कि ये मतदाता कौन हैं, उन्हें किन विधानसभा क्षेत्रों या मतदान केंद्रों की सूची में जोड़ा गया, या अधिकारियों ने वास्तव में उनकी पात्रता की जांच की भी थी या नहीं।
इन 16.18 लाख जोड़े गए मतदाताओं की गुत्थी सुलझाने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा से बात की गई। वह भड़क गए। उन्होंने कहा, “आपके संदेह या सवाल दूर करने के लिए हम परामर्श सेवाएं नहीं देते। The Reporters Collective के सीधे सवालों को टालते हुए उन्होंने फोन काट दिया।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट का वेब आर्काइव भी जांचा, लेकिन वेबैक मशीन पर उसका कोई आर्काइव मौजूद नहीं है। इसके बाद उन्हें और दिल्ली स्थित निर्वाचन आयोग को विस्तृत सवाल भेजे, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक दोनों में से किसी ने जवाब नहीं दिया था। यदि यह मान लिया जाए कि निर्वाचन आयोग के ये रहस्यमय 16.18 लाख मतदाता, जिन्होंने मसौदा सूची से पहले आवेदन किया था, वैध हैं और यह केवल उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की प्रशासनिक चूक है, तो इस धारणा से एक और असामान्य आंकड़ा सामने आता है।

उत्तर प्रदेश में SIR के प्रत्येक चरण से लेकर अंतिम मतदाता सूची तक के आंकड़े केवल तभी मेल खाते हैं, जब यह माना जाए कि सूची से हटाए जाने के बाद दोबारा नाम जोड़ने के लिए आवेदन करने वालों और मतदान की उम्र के होने पर आवेदन करने वालों में से 96.27 प्रतिशत वैध मतदाता थे। इसका मतलब है कि जिन वैध मतदाताओं को हटाया गया था, SIR ने उनके नाम शुरुआत में ही गलत तरीके से काट दिए थे।

यह ऊंचा प्रतिशत दूसरे राज्यों के रुझानों से मेल नहीं खाता। द कलेक्टिव से बात करने वाले निर्वाचन आयोग के एक शीर्ष अधिकारी के मुताबिक,

दूसरे राज्यों में फॉर्म 6के जरिए नाम जोड़ने के आवेदनों की मंजूरी दर लगभग 60 से 70 प्रतिशत रही है। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में, जहां उत्तर प्रदेश के साथ ही SIR हुआ था, उसी पुनरीक्षण अवधि के दौरान फॉर्म 6 के जरिए नाम जोड़ने के आवेदनों की मंजूरी दर लगभग 18.5 प्रतिशत थी।

SIR शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश में 15.44 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे। काफी देरी के बाद उत्तर प्रदेश में SIR अक्टूबर 2025 में शुरू हुआ। 6 जनवरी 2026 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने मसौदा सूची प्रकाशित की और अनुपस्थित, दूसरी जगह स्थानांतरित, मृत या दोहरी प्रविष्टि वाले बताकर 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए। खबरों के मुताबिक, मसौदा सूची से लगभग 18.7 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटाए जाने से व्यापक घबराहट पैदा हुई। राज्य के भाजपा नेतृत्व में भी बेचैनी दिखी।

6 जनवरी को मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित किए जाने के निर्धारित समय के कुछ घंटों बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने राज्यव्यापी बैठक बुलाई। इसमें बूथ स्तर के भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा गया कि राज्य की अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले वे प्रत्येक बूथ पर कम से कम 200 मतदाता जोड़ें।

खुद मुख्यमंत्री की ओर से आया यह आदेश न केवल भोंडा था, बल्कि पार्टी के रुख से भी मेल नहीं खाता था। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व लगातार SIR को उचित ठहराता रहा है। वहीं, उसके मुख्यमंत्री अप्रत्यक्ष रूप से इसके उलट बात कह रहे थे और अपने कार्यकर्ताओं को मतदाता सूची में एक तय संख्या में मतदाताओं के नाम वापस जुड़वाने के लिए उकसा रहे थे।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने भी स्वीकार किया था कि उन्हें मिल रहे फॉर्म 6 आवेदनों का एक बड़ा हिस्सा उन मतदाताओं का था, जिनके नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। फरवरी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रिणवा ने कहा था कि “जिन लोगों के नाम मसौदा सूची से हटाए गए हैं, वही फॉर्म 6 भर रहे हैं।” इससे एक दिन पहले उत्तर प्रदेश में एक ही दिन में सबसे अधिक फॉर्म 6 आवेदन दाखिल किए गए थे।

फॉर्म 6 का आवेदन दाखिल होने के बाद उसे संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) के पास चार साल तक सुरक्षित रखा जाना चाहिए। नाम शामिल करने के हर आवेदन की पहले बूथ स्तर अधिकारी (BLO) द्वारा मौके पर जाकर जांच होनी चाहिए और उसके बाद ERO की मंजूरी मिलनी चाहिए। चूंकि संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के पार्टी कार्यकर्ता भी मतदाता सूची को अपने पक्ष में प्रभावित करने के लिए नाम जोड़ने के कई आवेदन दाखिल करते हैं, और इनमें संदिग्ध या अस्तित्वहीन मतदाता भी शामिल होते हैं, इसलिए इन आवेदनों की मंजूरी दर आमतौर पर 60 से 70 प्रतिशत रहती है।

अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहने वाले विश्लेषकों की मदद से उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों के लिए सार्वजनिक किए गए नाम जोड़ने के 71.38 लाख आवेदनों का डेटा निकाला। सभी विधानसभा क्षेत्रों में 6 जनवरी 2026 से पहले दाखिल किए गए फॉर्म 6 आवेदन गायब थे।
SIR के गणना चरण के दौरान दाखिल किए गए इन 16 लाख आवेदनों के अस्तित्व का पता उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का एक्स अकाउंट देखने के बाद ही चला। लेकिन ये आवेदन किन निर्वाचन क्षेत्रों में थे और इनका विवरण क्या है, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। और निर्वाचन आयोग ने मसौदा चरण में सूची से लगभग एक करोड़ मतदाताओं के नाम कैसे हटाए और फिर उनमें से अधिकांश को वापस कैसे जोड़ दिया, यह भी अज्ञात है।