SIR पर पलटने लगी सरकार, विपक्ष के दबाव का हुआ असर
विपक्ष के व्यापक प्रदर्शन के बाद चुनाव आयोग ने अपने कुछ फैसलों में बदलाव किया है और मतदाताओं को राहत देने लगी है।
देशभर में हो रहे विरोध और विपक्ष के आक्रामक रुख के कारण पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक SIR पर चुनाव आयोग अब अपने ही फैसलों से पलटते हुए दिख रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के एकतरफा फैसलों पर India गठबंधन, सीजेपी समेत सिविल सोसायटी के व्यापक प्रदर्शन और दबाव के बाद चुनाव आयोग ने अपने कुछ फैसलों में बदलाव किया है और मतदाताओं को राहत देने लगी है।
पिछले करीब 30 दिनों में कहीं छूटे हुए मतदाताओं को दोबारा मौका दिया गया, तो कहीं दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया में राहत की बात सामने आई है। इन बदलावों को आयोग की रणनीति में नरमी के तौर पर देखा जा रहा है।
पश्चिम बंगाल के लोगों को राहत देने के लिए SIR के दौरान वोटर लिस्ट से छूट गए लोगों के नाम जोड़ने के लिए राज्य चुनाव आयोग ने सर्कुलर निकाला है।
इससे उन लोगों को अपनी पात्रता के आधार पर नाम जुड़वाने का अवसर मिल सकता है, जो प्रक्रिया के दौरान किसी वजह से छूट गए थे। आयोग के निर्देश पर पश्चिम बंगाल के सभी 24 जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEO) ने यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है कि कोई भी पात्र मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर न रह जाए।
वहीं, दिल्ली में वोटर लिस्ट के SIR के दौरान सामने आई 33 लाख गड़बड़ियों में से करीब 20 लाख मामलों का निपटारा कर लिया गया है। CEO के मुताबिक, इन मामलों में मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगतियां या 2002 की मतदाता सूची से नाम का मिलान नहीं होने जैसी समस्याएं थीं। मतदाताओं की मदद के लिए 18 और 25 अक्टूबर को विशेष शिविर लगाए जाएंगे।
फॉर्म-6 को लेकर जब चुनाव आयोग के भीतर से ही दो आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की और उसके बाद इसपर देशभर में बवाल मचा तो अब आयोग ने आवेदकों से पुरानी वोटर लिस्ट और उनके परिवार के सदस्यों के नाम से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी वाले अतिरिक्त घोषणापत्र को उन राज्यों में ऑनलाइन पोर्टल से हटा दिया गया, जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। दो चुनाव आयुक्तों ने फॉर्म-6 में इस अतिरिक्त घोषणापत्र को गैरकानूनी कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग को लगभग फटकारने की अंदाज में कहा कि फॉर्म-6 में किया गया बदलाव न हमारे सामने आया और न हमने इसे मंजूर या खारिज किया।
इधर एक नए घटनाक्रम में यूपी SIR पर बड़ा खुलासा हुआ है। The Reporters Collective की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी CEO ने माना है कि बिना वजह 85 हजार से ज्यादा वोटरों के वोट आटोमेटेड साफ्टवेयर के द्वारा काटे गए हैं, इन वोटरों के विलोपन फॉर्म साफ्टवेयर के जरिये भरे गए। यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मुस्लिम वोटरों के नाम काटने की कोशिशों की पुष्टि की है।
उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पर The Reporters Collective ने सवाल उठाए थे। The Reporters Collective ने 9 अक्टूबर को प्रकाशित अपनी जांच में दावा किया था कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने निर्वाचन अधिकारियों को ऐसे 85,854 फॉर्म पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया, जिनमें मतदाताओं के नाम हटाने का कोई कारण दर्ज नहीं था।
रिपोर्ट प्रकाशित होने के कुछ ही मिनट बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इसे ‘झूठ और अशुद्धियों से भरा’ बताया। उन्होंने उसी दिन विस्तृत खंडन जारी करने की बात कही। शाम को एक रिकॉर्डेड वीडियो जारी कर उन्होंने रिपोर्ट को ‘भ्रामक’ बताया।
हालांकि, The Reporters Collective का कहना है कि रिणवा ने अपने वीडियो में उसकी इस मुख्य पड़ताल की पुष्टि कर दी कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने अधिकारियों से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए 85,854 फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाए थे, जिनमें कारण दर्ज नहीं था। रिणवा ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सॉफ्टवेयर से अपने आप तैयार हुए अधिकांश फॉर्म में नाम हटाने का कारण क्यों नहीं लिखा गया। उन्होंने इस निष्कर्ष पर भी जवाब नहीं दिया कि कुछ फॉर्म में कारण की जगह केवल अंग्रेजी के एक-एक अक्षर—‘A’, ‘N’, ‘H’ या ‘E’—दर्ज थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मतदाता सूची से किसी का नाम हटाने के लिए स्पष्ट और उचित कारण दर्ज करना कानून के तहत अनिवार्य है। SIR के लिए चुनाव आयोग के संशोधित नियमों में भी यह जरूरी है।
Collective के अनुसार, रिणवा ने उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के नाम सामूहिक रूप से हटाने की 200 से अधिक कोशिशें सामने आने की बात भी स्वीकार की। हालांकि, उन्होंने इनकी संख्या को बेहद कम बताते हुए इसे राज्य में SIR प्रक्रिया की सफलता का प्रमाण बताया। रिणवा ने कहा कि इन फॉर्म-7 के जरिए करीब 4,700 नामों के खिलाफ सामूहिक रूप से नाम हटाने की शिकायतें की गई थीं। उन्होंने राज्य के कुल 13.39 करोड़ मतदाताओं का हवाला देते हुए कहा कि कई फॉर्म-7 वाले ऐसे केवल लगभग 4,700 नाम मिले।
बता दें कि दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान पात्रता साबित करने के लिए नोटिस पाने वाले करीब 33 लाख मतदाताओं में से 20 लाख के मामलों का निपटारा हो चुका है। यह कुल मामलों का 60 प्रतिशत से अधिक है। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी यानी CEO कार्यालय ने सोमवार को यह जानकारी दी। हालांकि, निपटाए गए मामलों में पात्र पाए गए मतदाताओं के साथ वे मामले भी शामिल हैं, जिन्हें खारिज किया गया है। दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची 4 दिसंबर को प्रकाशित होनी है। इसके लिए CEO कार्यालय के पास अभी 50 दिन से अधिक समय है। अंतिम सूची जारी करने की समयसीमा 26 सितंबर को चौथी बार बदली गई थी। नोटिस और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 30 नवंबर तक जारी रह सकती है।
राजधानी में जगह-जगह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया गठबंधन के व्यापक प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट मार्च में उमड़े जलसैलाब के बाद चुनाव आयोग के रूख में नरमी देखी जाने लगी है। यही कारण है कि दिल्ली में चार लाख नोटिसों का निपटारा हुआ।

आंकड़ों के मुताबिक, शुरुआत में मामलों के निपटारे की रफ्तार काफी धीमी थी। 31 अगस्त को मसौदा मतदाता सूची जारी होने के बाद पहले 30 दिनों में, यानी 29 सितंबर तक, केवल चार लाख नोटिसों का निपटारा हुआ। लेकिन इसके बाद के 12 दिनों में लगभग 16 लाख मामले निपटा दिए गए। इस तरह रोजाना औसतन करीब 1.33 लाख नोटिसों का निपटारा हुआ। राजधानी में 20 सितंबर से हर सप्ताहांत विशेष शिविर लगाए जा रहे हैं। बेघर लोगों, तोड़फोड़ के कारण विस्थापित परिवारों, ट्रांसजेंडर समुदाय और यौनकर्मियों जैसे कमजोर समूहों तक पहुंचने के लिए भी शिविर आयोजित किए गए हैं।
चुनाव आयोग जहां विवाद के बीच पुराने फैसलों और नियमों को बदल रही है, वहीं खबर आ रही है कि दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत जारी मसौदा मतदाता सूची के विश्लेषण में मुस्लिम मतदाताओं को अपेक्षाकृत अधिक संख्या में ‘लॉजिकल विसंगतियों’ के आधार पर चिह्नित किए जाने का पैटर्न सामने आया है।
The Hindu की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मसौदा सूची में मुसलमानों की हिस्सेदारी 13.6% है, लेकिन ऐसी विसंगतियों के लिए चिह्नित मतदाताओं में उनका हिस्सा 20.3% है। परिवार के आकार और बच्चों से जुड़े पांच मानदंडों के तहत चिह्नित लोगों में यह हिस्सेदारी 30% है।
रिपोर्ट के अनुसार, किन मतदाताओं को चिह्नित किया जाएगा, इसका निर्णय निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) ने नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के केंद्रीकृत ERONET सॉफ्टवेयर ने किया। ERO मतदाता सूचियों के वैधानिक प्रभारी होते हैं। इस प्रक्रिया ने सॉफ्टवेयर के मानदंडों और उनकी चुनावी पात्रता से प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए हैं।
The Hindu ने दिल्ली की मसौदा SIR सूची को डिजिटल रूप में तैयार करके उसका अध्ययन किया। सूची में 97.54 लाख मतदाता थे, जिनमें से 33.12 लाख को नोटिस के लिए चिह्नित किया गया था। इनमें 11.79 लाख मतदाता पिछली SIR सूची से अपना संबंध स्थापित नहीं कर पाए थे, जबकि 19.33 लाख को आठ अलग-अलग कारणों से ‘लॉजिकल विसंगतियों’ की श्रेणी में रखा गया।

विश्लेषण के मुताबिक, कुल मतदाताओं में लगभग 13.3 लाख मुसलमान थे। उनकी 13.6% हिस्सेदारी, 2011 की जनगणना में दिल्ली की आबादी में दर्ज 12.9% हिस्सेदारी से थोड़ी अधिक है। पिछली SIR सूची से संबंध स्थापित नहीं कर पाने वाले मतदाताओं में मुसलमान केवल 7.6% थे। यानी गैर-मुस्लिम मतदाताओं की तुलना में अधिक अनुपात में मुस्लिम मतदाता पिछली सूची से अपना संबंध स्थापित कर पाए थे। इसके बावजूद ‘लॉजिकल विसंगतियों’ के लिए चिह्नित मतदाताओं में उनकी हिस्सेदारी 20.3% रही। बिहार की मसौदा सूची के इसी तरह के विश्लेषण में हटाए गए मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी 18.4% थी। यह 2011 की जनगणना के अनुसार वयस्क आबादी में उनकी 17.7% हिस्सेदारी के करीब थी। बिहार SIR में ‘लॉजिकल विसंगतियों’ वाली जांच इस्तेमाल नहीं हुई थी।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च में होने की उम्मीद है। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में किसी नाम का गलत तरीके से जुड़ना या हटना राजनीतिक रूप से अहम हो सकता है।
