एसआईआर पर यूएन की रिपोर्ट : अल्पसंख्यक वोटर मतदाता सूची से बाहर किए जा रहे हैं
संयुक्त राष्ट्र (UN) के तीन विशेष दूतों ने भारत में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision - SIR) अभियान को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के आरोप सामने आए हैं।
'द हिंदू' की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने कहा है कि SIR प्रक्रिया के कारण अल्पसंख्यक समुदायों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है और इसकी निष्पक्षता व पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
कौन-कौन से विशेष दूत शामिल हैं
चिंता जताने वाले संयुक्त राष्ट्र के तीन विशेष दूत हैं—
निकोलस लेवरात – अल्पसंख्यक मामलों पर विशेष दूत (Special Rapporteur on Minority Issues)
आइरीन खान – विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष दूत (Special Rapporteur on Freedom of Opinion and Expression)
नज़िला घनेया – धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता पर विशेष दूत (Special Rapporteur on Freedom of Religion or Belief)
लाखों नाम हटाने का आरोप
यूएन विशेषज्ञों ने कहा कि चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से लाखों लोगों के नाम हटाए गए। उनका आरोप है कि इसका सबसे अधिक असर मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ा।
पारदर्शिता और AI के इस्तेमाल पर सवाल
रिपोर्ट में कहा गया है कि वोटर लिस्ट की जांच और संशोधन के लिए कथित तौर पर AI आधारित और अपारदर्शी सिस्टम का इस्तेमाल किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया में शिकायत दर्ज कराने या गलती सुधारने की स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि इस प्रक्रिया के पीछे अल्पसंख्यकों को बाहर करने का राजनीतिक उद्देश्य हो सकता है। भारत सरकार को 60 दिनों के भीतर जवाब देने का समय दिया गया था। यह रिपोर्ट 1 मई 2026 को तैयार की गई थी। इसमें भारत सरकार से इन आरोपों और चिंताओं पर 60 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था।
रिपोर्ट में नंदीग्राम का जिक्र
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण दिया गया है। इसमें कहा गया कि हटाए गए मतदाताओं में लगभग 95 प्रतिशत मुस्लिम थे, जबकि उस क्षेत्र की कुल मतदाता आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित लोगों में ऐसे पुरुष, महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल थे जिनके पास वैध पहचान दस्तावेज मौजूद थे।
सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग का रुख
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई लोगों ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट में राहत की मांग की, लेकिन 6 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि सरकारी दस्तावेजों में नाम या स्पेलिंग की मामूली गलतियों को भी वोटर लिस्ट से नाम हटाने का आधार बनाया गया।
पश्चिम बंगाल में 27 लाख नाम हटने का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में करीब 27 लाख लोगों के नाम "लॉजिकल विसंगतियों" (Logical Discrepancies) के आधार पर वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। विशेषज्ञों ने बिहार में पहले हुई इसी तरह की प्रक्रिया का भी जिक्र किया और कहा कि इससे मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के मताधिकार और नागरिकता को लेकर डर पैदा हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का जिक्र
रिपोर्ट के मुताबिक, 16 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत पश्चिम बंगाल के उन मतदाताओं को राहत दी, जिनके नाम वोटर लिस्ट से हट गए थे। कोर्ट ने कहा कि जिनकी अपील विधानसभा चुनाव से पहले मंजूर हो जाएगी, उन्हें वोट देने की अनुमति मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सफल अपीलकर्ताओं के लिए अतिरिक्त मतदाता सूची (Supplementary Voter List) अपडेट करने का निर्देश दिया। हालांकि जिन लोगों की अपील समय पर मंजूर नहीं हो सकी, उन्हें मतदान की अनुमति नहीं मिली। रिपोर्ट में कहा गया कि इस प्रक्रिया में 34 लाख से अधिक अपीलें आईं, जिससे ट्रिब्यूनलों पर कम समय में बड़ी संख्या में मामलों के निपटारे का दबाव पड़ा और कई योग्य मतदाता मतदान से वंचित रह गए।
राजनीतिक बयानबाज़ी पर चिंता
रिपोर्ट में SIR प्रक्रिया के दौरान नेताओं द्वारा दिए गए सार्वजनिक बयानों पर भी चिंता जताई गई है। पत्र के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई सरकारी अधिकारियों ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने की कार्रवाई को "अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों" के खिलाफ अभियान बताया। यूएन विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बयान भारतीय मुस्लिम नागरिकों को विदेशी नागरिकों से जोड़ने का खतरा पैदा करते हैं। रिपोर्ट में चुनावी प्रक्रिया के संदर्भ में "Detect, Delete, Deport" (पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो) जैसे नारों के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया है। यूएन विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह की बयानबाज़ी धार्मिक या राष्ट्रीय आधार पर घृणा को बढ़ावा दे सकती है, जो अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की संधि (ICCPR) के अनुच्छेद 20(2) के तहत प्रतिबंधित है। उनका कहना है कि यदि किसी धार्मिक समुदाय को चुनावी प्रक्रिया के जरिए निशाना बनाया जाता है, तो यह नस्लीय भेदभाव उन्मूलन संधि (ICERD) के तहत भारत की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों से जुड़ा मुद्दा बन सकता है।
भारत सरकार से पूछे गए सवाल
- यूएन विशेषज्ञों ने भारत सरकार से सात प्रमुख बिंदुओं पर जानकारी मांगी है। इनमें यह भी शामिल है कि SIR प्रक्रिया को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप बनाने के लिए क्या कदम उठाए गए।
- उन्होंने यह भी पूछा कि वोटर लिस्ट से हटाए गए या अयोग्य घोषित किए गए लोगों का धर्म और जाति के आधार पर अलग-अलग डेटा उपलब्ध है या नहीं। यदि ऐसा कोई डेटा नहीं है, तो उसका कारण भी बताने को कहा गया है।
- विशेषज्ञों ने ICCPR और 1992 के संयुक्त राष्ट्र अल्पसंख्यक अधिकार घोषणापत्र का हवाला देते हुए कहा कि हर नागरिक को बिना किसी अनुचित रोक-टोक के मतदान करने और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने का अधिकार है। साथ ही धार्मिक, भाषाई और जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना भी जरूरी है।
- उन्होंने कहा कि वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और भेदभाव-रहित होनी चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक, SIR प्रक्रिया में सामने आई प्रक्रियागत कठिनाइयों का सबसे अधिक असर मुस्लिम नागरिकों पर पड़ता दिखाई देता है।
- रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कम समय सीमा, AI प्रणाली की कथित अस्पष्टता और आर्थिक व भाषाई रूप से कमजोर लोगों के लिए अपील प्रक्रिया की कठिनाइयाँ, मतदान के अधिकार पर अनुचित प्रतिबंध के समान हो सकती हैं।
- यूएन विशेषज्ञों ने बताया कि इस सूचना और भारत सरकार के जवाब को 60 दिनों के बाद सार्वजनिक किया जाएगा। इसे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की नियमित रिपोर्टिंग प्रक्रिया में भी शामिल किया जा सकता है।
इस बीच, विशेषज्ञों ने भारत सरकार से आग्रह किया है कि यदि लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो किसी भी संभावित मानवाधिकार उल्लंघन को तुरंत रोका जाए, दोबारा होने से बचाया जाए और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।