Literature

पितृसत्तात्मक समाज की सभी साजिशों को बेनकाब करती है सुजाता की किताब

Pritika Bara Pritika Bara | 1h ago · 5 min read
पितृसत्तात्मक समाज की सभी साजिशों को बेनकाब करती है सुजाता की किताब

पितृसत्ता, यौनिकता, मातृसत्ता तथा समलैंगिकता के विषय में समझ विकसित करने के लिए यह एक बेहतरीन किताब है।

राहुल गांधी के पुणे में महिला केंद्रित 'छात्रों की गूंज' के बाद अचानक देश में पितृसत्ता पर बहस शुरू हो गई है।

लेकिन ये पितृसत्ता है क्या चीज़? इसका मतलब क्या है?

यह समझने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ सुजाता की हाल में आई किताब पितृसत्ता यौनिकता और समलैंगिकता बेहद मददगार है।


पितृसत्ता और समाज तथा स्त्रियों पर होने वाले प्रभावों के बारे में लेखिका सुजाता अपनी पुस्तक पितृसत्ता यौनिकता और समलैंगिकता में विस्तार से चर्चा करती हैं। इस किताब में लेखिका ने पितृसत्ता के उदय और उसके वर्चस्व के विषय में गंभीरता से लिखा है। साथ ही वह मातृसत्ता की पड़ताल करती हुईं लेखिका मातृसत्ता के पतन तथा पुरुष के लिए पितृसत्ता का होना जो उनके समाज और परिवार में विशेष कर स्त्रियों के शोषण के लिए जिम्मेवार है उनकी वर्चस्ववादी सोच को भी अपनी किताब में गंभीरता से उठाती हैं।
लेखिका पुस्तक में पितृसत्ता के साथ यौनिकता और समलैंगिकता विषय पर बिना किसी हिचकिचाहट के पूरे तफ़सील के साथ चर्चा करती हैं। यौनिकता की भावना कैसे आती है तथा लोगों पर ये किस तरह से हावी हो जाती है साथ ही समलैंगिकता और उससे जुड़े विषय जैसे उनकी पहचान और विशेष कर भारत देश के संदर्भ में लेखिका अपने किताब में कई मनोविश्लेषणात्मक संदर्भों के साथ चर्चा करती हैं।

यह पुस्तक पितृसत्ता को समझने का नजरिया प्रदान करती है। जब हम पितृसत्ता के तह में जाकर इसके विषय में जानते है तब यह मालूम होता है कि लेखिका क्यों यह कहती है कि पितृसत्ता लैंगिक गैरबराबारी पर आधारित एक सामाजिक व्यवस्था है। लेखिका मानव मूल्यों के संदर्भ में लिखती हैं

गैरबराबरी, हिंसा, शोषण को खत्म कर बराबरी, बंधुत्व और लोकतंत्रिक मूल्यों की स्थापना के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी भी पितृसत्ता को पहचानने में असफल रहे क्योंकि इसका प्रशिक्षण हमें जन्म के पहले क्षण से मिलता है”।

लेखिका स्त्रियों के विषय में चर्चा करती हुई समाज में पितृसत्ता के विस्तार के विषय में बात करती हैं। “यह मातृत्व जो पूज्य है, वह पितृसत्तात्मक अवधारणा है। इसे स्त्रीत्व से अनिवार्य रूप से जोड़ देने का मतलब होगा जन्म और पालन पोषण को स्त्रीत्व की पूर्णता से समझना और प्रेम और त्याग को स्त्रीत्व का मुख्य गुण समझना”।

लेखिका मनुस्मृति से लेकर माओवादी चीन क्रांति, ईरान में स्त्रियों की हिजाब क्रांति, हिंदू बिल कोड, नीत्से और उन्नीसवी सदी के समाज सुधारकों की बात कर पितृसत्ता के बारे में एक गहन ऐतिहासिक अध्ययन पाठकों के समक्ष लाती हैं , जिसके कारण यह शोधार्थियों के लिए एक जरूरी किताब बन जाती है।

जब समाज में सब प्राकृतिक रूप से चलता है तब ये पितृसत्ता किसी पर कैसे हावी हो सकती है। लेखिका मातृसत्ता और मातृवंश के विषय में भी बात करती हैं। जहां मातृसत्ता में स्त्रियों को सारे अधिकार मिलते है वो अपने फैसले स्वयं ले सकती हैं वहीं मातृवंश में केवल स्त्री को उसकी मां के वंश से जाना जाता है लेकिन सत्ता पुरुषों के हाथ में ही होती है।

विभिन्न विचारकों का उद्धरण देकर लेखिका विषय की गंभीरता और मूल सवाल पर जोर देती हैं और पितृसत्ता के मुख्य कारणों पर बात करती हैं। “पितृसत्ता कैसे आई इसका जवाब खोजते हुए अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के विद्वान मातृसत्ता की खोज तक गए। मजेदार बात ये है कि कुछ विद्वानों ने माना कि मनुष्य सभ्यता के विकास के शुरुआती जंगली युग के बाद मातृसत्ता आई और उसके बाद पितृसत्ता ने आकर मनुष्य को सभ्य और विकसित बनाया। मातृसत्ता (मैट्रिआर्की) सभ्यता की बेहद आरंभिक स्थिति थी”।

यौनिकता के संदर्भ में बात करते हुए लेखिका मनोविश्लेषणवाद के विषय में भी बात करती है साथ ही यौनिकता के संदर्भ में बात करते हुए स्त्रीवाद को लेखिका केंद्र में रखती हैं । लेखिका दैहिक स्वायत्ता के संदर्भ में स्त्री की गुलामी की जड़ गर्भ धारण और प्रजनन की क्षमता को मानती हैं। “स्त्री की गुलामी की जड़ उसके गर्भ धारण करने और प्रजनन की क्षमता में है। यौनिकता का नियंत्रण इसी वजह से है”।

लेखिका मणिपुर में हुए स्त्री हिंसा के विषय में भी बात करती हैं और सैनिकों द्वारा बलात्कार के बारे में भी लिखती हैं। यौन के संबंध में चर्चा करते हुए पुस्तक में लेखिका धर्म और स्त्री के आमने-सामने होने की भी बात करती हैं। लेखिका बताती है कि “कभी धर्म और स्त्री आमने-सामने होते हैं जब कभी औरत को राजनीतिक या सामाजिक मुद्दों पर बयानबाजी के लिए मौलवी फतवे जारी करते हैं या कोई धार्मिक गुरु यह आह्वान करता है कि ज्यादा बच्चे पैदा करो।

लेखिका राज्य और धर्म को पितृसत्तात्मक संरचनाए कहती हैं और धर्म की पितृसत्तात्मक संरचना पर करारा प्रहार करती हैं।

लेखिका सुजाता समलैंगिकता को विमर्श की दृष्टि से देखती हैं। इस विषय में बात करते हुए लेखिका लिखती हैं कि “विमर्श की दृष्टि से समलैंगिकता विषमलैंगिकता का दूसरा ध्रुव है”। लेखिका समलैंगिक और क्वीयर अस्मिता के बारे में शब्दों के अर्थसंकोच और अर्थविस्तार के विषय में कहती हैं कि “क्वीयर का इस्तेमाल बुरा, घृणित, बदनाम, विश्वास के योग्य न हो ऐसे ही अर्थों में होता रहा” साथ ही जेन्डर और सेक्स, लैंगिक भेदभाव, स्त्री-द्वेष, रूढ छवि के बारे में महत्वपूर्ण रूप से बात करती हैं ।

पितृसत्ता, यौनिकता, मातृसत्ता तथा समलैंगिकता के विषय में समझ विकसित करने के लिए यह एक बेहतरीन किताब है। यह पुस्तक विषय की गंभीरता की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती है और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर जोर देती है। इतिहास की पड़ताल के साथ-साथ वर्तमान दौर में पितृसत्तात्मक समाज की उन सभी साजिशों को बेनकाब करती है जिसका इस्तेमाल सत्ता और धर्म व्यवस्था समय-समय पर अपने फायदे के लिए करते आ रही है।


किताब का नाम- पितृसत्ता यौनिकता और समलैंगिकता; अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध

विधा- स्त्री विमर्श/आलोचना

लेखिका का नाम- सुजाता

प्रकाशक का नाम- सेतु प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष-2025

मूल्य- 225 रुपये

Pritika Bara

Pritika Bara

प्रीतिका बड़ा दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विषय में आदिवासी साहित्य पर शोध कर रही हैं।