अमित शाह के लिए हेमंत सोरेन ने संसद का रास्ता खोल दिया है?
झारखंड में छात्रों पर लाठीचार्ज ने अमित शाह को संसद के लिए जवाब मुहैया करवा दिया है
राहुल गांधी पिछले कई दिनों से गृहमंत्री अमित शाह के संसद में न आने का सवाल उठा रहे हैं।
20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज और पैलट गंस के इस्तेमाल को उन्होंने देश भर में मुद्दा बनाया हुआ है और वह यह सवाल पूछ रहे हैं कि इसके इजाज़त किसने दी? 20 तारीख के बाद से ही न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न ही गृहमंत्री अमित शाह संसद में दिखे हैं और किरण रिजिजू सरकार की तरफ़ से मोर्चा संभाल रहे हैं।
आज झारखंड में जिस तरह से छात्रों पर वाटर कैनन, आँसू गैस की गोलाबारी और लाठी चार्ज हुआ है, क्या उसने अमित शाह के संसद में आने का रास्ता दे दिया है? अब वह संसद में आकर कह सकते हैं कि झारखंड में तो आपकी सरकार है, वहाँ भी छात्रों पर वही सब हुआ है। हालाँकि राहुल गांधी ने तुरंत
ट्वीट करके रांची में हुए इस लाठीचार्ज की आलोचना की है, लेकिन संसद में बहुमत के शोर के आगे वह ट्वीट दबाना कोई मुश्किल काम तो नहीं ही है। जिस व्हाटअबाउटरी से अब तक सरकार पंडित नेहरू से लेकर राजीव गांधी और मनोमहन सिंह के समय की सच्ची-झूठी घटनाओं के भरोसे सरकार अब तक संसद में सवालों का सामना करती रही है। झारखंड की घटना ने तो उसे बड़ा सहारा दे दिया है।
झारखंड में आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण रहा था और सरकार की ओर से भी जंतर-मंतर जैसी सख्ती नहीं दिख रही थी। आंदोलन स्थल तक जाने आने में कोई रोक टोक नहीं थी। पुलिस की उपस्थिति न्यूनतम रही और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ कोर्ट केसेज वगैरह भी नहीं बनाए गए। सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल छात्रों से बात कर रहा था और कई मसलों पर सहमति भी बनी थी। ऐसे में आज विधानसभा के भीतर घुसने की कोशिश, पथराव और हिंसा की कोशिशें कहीं और इशारा करती हैं।
असमाजिक तत्वों को लेकर कई खबरें आईं। कई पत्रकारों ने रिपोर्ट किया कि बाहर से बड़े पैमाने पर युवाओं को बुलाया गया है और आंदोलन का राजनीतिकरण किया जा रहा है।
आंदोलनकारियों के एक पक्ष ने ही आरोप लगाया कि बाहरी और असामाजिक तत्त्व आंदोलन में घुसकर माहौल खराब कर रहे हैं।
सवाल तो उठता ही है कि जब सरकार के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत चल ही रही थी तो क्या विधानसभा मार्च को टाला नहीं जा सकता था? यह तो साफ़ है ही कि कोई भी सरकार किसी भीड़ को विधानसभा के भीतर घुसने की इजाज़त नहीं देगी, आज भी विधानसभा तक आने में नहीं रोका गया लेकिन जब भीतर घुसने की कोशिशें हुईं तो पुलिस ने बलप्रयोग किया।
सवाल हेमंत सोरेन द्वारा इस मुद्दे को जिस तरह से डील किया गया, उस पर भी उठता है।
आंदोलन जिन मुद्दों पर शुरू हुआ था, वे गंभीर थे। झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षाओं में धांधली के गंभीर सबूत छात्रों ने पेश किये थे। यह ठीक है कि सख्ती नहीं की गई लेकिन शुरू का लगभग डेढ़-दो हफ्ता सरकार ने बातचीत न शुरू करके खो दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा का आधिकारिक ट्विटर हैंडल और सरकार समर्थक इसे भाजपा की साजिश बताते रहे। भाजपा वहाँ विपक्ष है तो उससे समर्थन की उम्मीद तो नहीं ही कर रहे होंगे सोरेन, और अगर साजिश थी भी तो उसे छात्रों से बात करके सुलझाया जा सकता था।
अगर आरंभिक दौर में ही हेमंत सोरेन अपने कुछ मंत्रियों के साथ धरना स्थल जाते, अनशन खत्म कराने की कोशिश करवाते और बातचीत की प्रक्रिया शुरू करवाते तो एक छवि बनती कि सरकार छात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण है, लेकिन कई दिनों की निष्क्रियता ने आंदोलनकारियों और विरोधियों को यह मौक़ा दिया कि वे कह सकें कि सरकार आंदोलनकारियों के प्रति संवेदनहीन है और जब बातचीत के लिए प्रतिनिधिमंडल चुने गए तो पहले ही देर हो चुकी थी।
जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के बाद बैकफुट पर खड़ी भारतीय जनता पार्टी ने स्वाभाविक रूप से इसे लगातार मुद्दा बनाया और बहुत संभव है कि आंदोलनकारियों की मदद भी की हो। लोकतंत्र में विपक्ष द्वारा ऐसे आंदोलनों का फायदा उठाया जाना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है, सत्ता पक्ष अगर वाकई आंदोलनकारियों के प्रति गंभीर है तो उसे वहाँ जाकर बात करनी थी और चिंगारी को भड़कने से पहले रोकना था, जैसा कर्नाटक में मुख्यमंत्री डी के शिवकुमार और गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने किया। हेमंत यहाँ चूक गए जिसकी परिणिती आज की घटना है।
इस घटना के बाद जे पी नड्डा ने जिस तरह से कांग्रेस और राहुल गांधी को संसद में आने की और अमित शाह का जवाब सुनने की चुनौती दी, उससे तो यही लग रहा है कि झारखंड की घटना ने अमित शाह के संसद में आने का रास्ता खोल दिया है।