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एआई की गुंडागर्दी और हमारी 'कुदरती बेवकूफ़ी'

Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini | 1h ago · 5 min read
एआई की गुंडागर्दी और हमारी 'कुदरती बेवकूफ़ी'

आजकल हमें इस बात से डराया जा रहा है कि भविष्य में मशीनें और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) इंसानों पर काबू पा लेंगी।

आजकल हमें इस बात से डराया जा रहा है कि भविष्य में मशीनें और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) इंसानों पर काबू पा लेंगी, सड़कों पर रोबोट चलेंगे और वे हम पर एटम बम गिरा देंगे। लेकिन हमारे देसी माहौल में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। हमारी मशीन एटम बम गिराने जैसे महंगे और गैर-ज़रूरी शौक नहीं पालेगी, वह सीधा हमारी इज़्ज़त पर हमला करेगी!

ज़रा तसव्वुर कीजिए, आप रात के दो बजे दबे पाँव किचन में गए हैं और आपका स्मार्ट फ्रिज अचानक पूरे मोहल्ले के सामने चीख पड़े: ”खबरदार जो गुलाब जामुन को हाथ लगाया! तुम्हारा शुगर लेवल बढ़ा हुआ है, मैंने तुम्हारी मेडिकल रिपोर्ट अभी तुम्हारी बेग़म और फैमिली डॉक्टर को व्हाट्सएप कर दी है।“ या आपका स्मार्ट फोन आपको ब्लैकमेल करने लगे कि ”देखो भैया! या तो मुझे ओरिजिनल चार्जर से चार्ज करो, वरना रात जो तुमने दोस्तों के साथ पार्टी की थी, उसकी रसीद मैं तुम्हारे फैमिली व्हाट्सएप ग्रुप में भेज दूँगा।“

खबर आई है कि टेक्नोलॉजी कंपनियों के अरबपति मालिकान संयुक्त राष्ट्र (UN) में जाकर दहाड़ें मार-मार कर रो रहे हैं कि ”एआई से इंसानियत को खतरा है, कोई वैश्विक कानून बनाकर हमें रोको!“ उनकी यह मुनाफ़िक़त (दोगलापन) बिल्कुल सिगरेट और गुटखा बेचने वाली कंपनियों जैसी है। जैसे वे तंबाकू के पैकेट पर कैंसर से गले हुए जबड़े और फेफड़ों की भयानक तस्वीर छापते हैं, मोटे अक्षरों में वार्निंग लिखते हैं कि ”यह जानलेवा है“, और फिर वही पैकेट खुशी-खुशी दुकानों पर सजाकर अरबों रुपये कमाते हैं।

यह ऐसा ही है कि कोई देसी पान वाला ग्राहक के पान पर ’चूना’ लगाते हुए गुटखे की पुड़िया पर छपी वह खौफनाक तस्वीर दिखाकर बड़ी हमदर्दी से कहे: ”देख लो भाई! इसमें साफ लिखा है कि यह कैंसर करेगा, इससे नस्लें और इंसानियत तबाह हो जाएगी... और हाँ, यह लीजिए आपका किवाम वाला डबल मज़े का पान, जल्दी से पचास रुपये निकालिए, पीछे और भी ग्राहक खड़े हैं!

“ ये टेक्नोलॉजी वाले भी हमें एआई के नए-नए मॉडल्स पर ”इंसानियत की तबाही“ का लेबल चिपका कर बेच रहे हैं, जेबें भी भर रहे हैं और साथ ही मगरमच्छ के आँसू भी बहा रहे हैं। कल को अगर इनकी स्मार्ट कार खुद-ब-खुद चलते हुए किसी राहगीर को टक्कर मार दे, तो ये बड़ी ढिठाई से प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे:- ”देखिए, हमारी कार ने बड़ा ज़िम्मेदाराना रवैया अपनाया है कि उसने सिर्फ टांग तोड़ी, जान नहीं ली। असली गलती तो उस गरीब राहगीर की थी जिसकी हड्डियाँ कमज़ोर थीं, उसे रोज़ाना कैल्शियम खाना चाहिए। चोरी और ऊपर से सीनाज़ोरी का यह नया डिजिटल लेवल है।

हमें डराया जा रहा है कि मशीनें सुपर स्मार्ट हो गई हैं। वाकई हो गई हैं! मशीन 88 घंटे में गणित के वे फॉर्मूले सुलझा रही है जो 90 साल से दुनिया के बड़े-बड़े साइंसदाँ नहीं सुलझा सके। लेकिन दूसरी तरफ हम इंसानों, खासकर उपमहाद्वीप और हिंदुस्तान वालों की ’कुदरती बेवकूफ़ी‘ का शाहकार देखिए कि हम इस अज़ीम-ओ-शान मशीन को किस काम पर लगाए हुए हैं।

हमने एआई को भी ’बाबा बंगाली’ या मोहल्ले का नजूमी (ज्योतिषी) समझ लिया है। हमारा नौजवान चैट जीपीटी (Chat GPT) के सामने हाथ बांधे खड़ा है और उससे यह नहीं पूछता कि टेक्नोलॉजी में क्या नया हो रहा है, वह रात के दो बजे सर्च करता है:- ”बाबा जी! यह बताएँ कि मेरी सरकारी नौकरी कब लगेगी?“ या ”क्या पड़ोसन मुझ पर काला जादू करवा रही है?“ हमारे व्हाट्सएप वाले अंकलों ने तो एआई का जो हश्र किया है, वह देखकर खुद मशीन भी सिर पीट लेती होगी।

अंकलों ने एआई को फेक न्यूज़ और खानदानी प्रोपेगेंडा की फैक्ट्री बना दिया है। किसी अंकल ने एआई से पुराने ज़माने के उड़न खटोले या अजीबोगरीब जानवर की थ्री-डी (3D) तस्वीर बनवाई और नीचे लिखकर फॉरवर्ड कर दिया:-”नासा (NASA) ने भी मान लिया है कि हमारे आबा-ओ-अजदाद (पूर्वज) हज़ारों साल पहले जीपीएस (GPS) लगाकर घूमा करते थे। यूनेस्को (UNESCO) से मंज़ूरशुदा सच! इसे आगे शेयर न करने वाला गुनहगार होगा।
“ एआई भी सोचता होगा कि यह मैं किस कौम के हाथों का खिलौना बन गया हूँ। देसी टोटकों का बाज़ार अलग गर्म है। लोग डॉक्टर की फीस बचाने के लिए एआई से पूछ रहे हैं कि गंजापन कैसे दूर करूँ या पेट की गैस का क्या इलाज है? और फिर डॉक्टर के पास जाकर उसी से बहस करते हैं:- ”डॉक्टर साहब, आपकी एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री जाली है, मेरे ’जीपीटी बाबा’ ने कहा है कि सुबह निहार मुँह अजवाइन और काला नमक फांकने से कैंसर भी ठीक हो जाता है!“
बैचलर्स की तन्हाई का तो यह आलम है कि ’एलेक्सा‘ (Alexa) उनकी इकलौती और सबसे वफादार साथी बन चुकी है। आधी रात को लिहाफ के अंदर से सिसकियाँ उभर रही होती हैं, ”एलेक्सा! मुझसे कोई प्यार भरी बात करो,“ या ”एलेक्सा! कोई रोने वाला गाना लगाओ, उसने मुझे ब्लॉक कर दिया है।“ जो मशीन दुनिया पर राज करने के ख्वाब देख रही है, हमारे बैचलर्स उससे अपनी टूटी हुई मुहब्बत का मातम करवा रहे हैं।

इंसान इतना काहिल और सुस्त हो चुका है कि अब वह रिश्तेदारों को ईद की मुबारकबाद भी एआई से लिखवा कर भेजता है। और हद तो यह है कि वह मैसेज बिना पढ़े ही फॉरवर्ड कर देता है, जिसके आखिर में ब्रैकेट में लिखा होता है: ’’[यहाँ अंकल का नाम लिखें] आपको ईद मुबारक हो!‘‘ हमें इस बात का कोई होश नहीं कि हम अपना सारा निजी डेटा और तस्वीरें एक मशीन को मुफ़्त में क्यों दे रहे हैं। हम मशीन को अपना पूरा चेहरा स्कैन करवा कर पूछते हैं कि ’’बताओ, क्या मैं इस फ़िल्टर में शाहरुख़ ख़ान लग रहा हूँ?‘‘ हम अपना माज़ी (अतीत) रंगीन देखने के चक्कर में अपना मुस्तक़बिल (भविष्य) मुकम्मल तौर पर गिरवी रख रहे हैं। वह दिन अब ज़्यादा दूर नहीं जब हमारे सरकारी और प्राइवेट दफ़्तरों में इंसानों की जगह एक स्मार्ट एआई बॉस कुर्सी पर बैठा होगा। आप जाकर रोते हुए छुट्टी की दरख्वास्त देंगे कि ”बॉस! मेरी दादी का इंतकाल हो गया है, मुझे दो दिन के लिए गाँव जाना है।

“ मशीन सिर्फ तीन सेकंड में आपका पिछले दस साल का सोशल मीडिया और जीपीएस (GPS) डेटा बेस चेक करेगी और स्क्रीन पर लाल रंग में लिखा आएगा: ”झूठ मत बोलो! तुम्हारी इसी दादी का पिछले साल वर्ल्ड कप के फाइनल वाले दिन भी इंतकाल हुआ था, तुम्हारी छुट्टी कैंसिल, तनख्वाह कट गई, और यह इत्तला तुम्हारे अब्बा जान को एसएमएस (SMS) कर दी गई है!

“ सच तो यह है कि इंसानों को मशीनों की ’आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस‘ से डरने की कतई कोई ज़रूरत नहीं है। हमारी अपनी ’कुदरती बेवकूफ़ी‘ ही हमारा बेड़ा गर्क करने के लिए काफ़ी है!
Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini

Athar Kalim Ahmed/S.R.Husaini

महाराष्ट्र के अतहर कलीम अहमद और एस.आर.हुसैनी उर्दू समाचार पत्रों और विभिन्न वेबसाइट के लिए "आईना खाना" के नाम से हास्य और व्यंग्यात्मक कॉलम लिखते हैं।