नदियों की पूजा करना नहीं, उन्हें बचाना ज़रूरी है
जहाँ भारत में नदियों को माँ मानकर पूजा होती है, वहीं हमारी नदियाँ सबसे अधिक प्रदूषित हैं
साल 2015 में हॉली जीन बक ने Charming Anthropocene की अवधारणा पर बात की। पर्यावरण के तमाम बदलावों के बीच यह चिंता बनी रही है कि हम कैसे अपने पर्यावरण को बेहतर कर सकते हैं। इस अवधारणा को आगे बढ़ते राजनीतिक चिंतक जेन बेनेट के Enchantment सिद्धांत को पर्यावरणीय विमर्श में लागू करने का प्रयास करती हैं ।
बहुत सरलीकृत रूप में कहें तो बक का यह मानना है कि यदि हम अपने आस-पास के पर्यावरण के सम्मोहन, प्रेम में पड़ जाये तो हमारा उससे के नाता बन जाएगा और हम अपने आस पास की पारिस्थितिकी के बारे में और चिंता करेंगे और उसकी रक्षा करने, उसे बेहतर बनाने के लिए प्रेरित होंगे।
यह बात सुनने पढ़ने में बहुत अच्छी लगती है, किंतु भारत में यह सब हम पहले से करते आए हैं, नदियों को माँ मानना, पेड़ों का हमारे रस्मों रिवाज में व्यक्ति की तरह शामिल होना हमारी सामाजिक दिनचर्या का हिस्सा है। इन सबके बावजूद हमरी नदियाँ विश्व की सबसे प्रदूषित नदियों की सूची में शामिल हैं, विश्व की जनसंख्या में 18 प्रतिशत का योगदान होने ने बाद भी, विश्व के पीने लायक पानी में हमारा योगदान 4 प्रतिशत का हैं ।
हम अपनी आम ज़िंदगी में कितनी बार अपनी पारिस्थितिकी की चिंता करते हैं? क्या कभी ऐसा होता है कि किसी नदी को बचाना हमारे लिए उतना ही बड़ा और ज़रूरी काम बन जाता है जितना अपने परिवार के किसी सदस्य की जान बचाना । राकेश कबीर के कवि कर्म की मूल चिंता ही यही है कि “कुँवरवर्ती कैसे बहे” । राकेश की कविता में जलवायु परिवर्तन और उससे होने वाले दुष्परिणाम ख़बर की तरह नहीं आते जो कल बासी पड़ने पर तहा कर रख दी जाएगी । ये परिवर्तन और उसके परिणाम राकेश की कविता के मूल तंतु हैं । जब वह बहुत रोमानी बात भी कह रहे होते हैं उसकी पृष्ठभूमि में एक नदी है जो बदल रही है या बदल गई है क्योंकि हम मनुष्यों ने उसे बदल दिया है ,
नदियाँ इस क़दर
बौखलायी हुई हैं अबके बरस कि
जाने दिलफेंक आशिक़
समंदर का क्या होगा
इस कविता संग्रह में चंबल है जो डूबते सूरज की ललाई ओढ़े इतरा रही है, आँधियाँ है, बादल है, बाढ़ है और इन सबके बीच कवि वह सूत्र खोज रहा है जो इन सबको एक साथ बांधे हैं । विकास के क्रम में गाँव शहर बन गए या शहरों के सीमांत पर अधबसे टापू से रह गए । इस विकास चक्र में, गाँव में रहने वाले शहर को चलाने की मशीन का ईंधन बनने चले गए, शहर और बड़ा होने चला गया पर उस पानी की चिंता किसे है जो पूछ रहा है कि वह पानी कहाँ जाए,
गाँव का तालाब बेचारा
चारों तरफ़ शहर से घिर जाता है
पहले नदी मरती है
फिर तालाब भी मरता है
बक जिस सुझाव की बात कर रही हैं, राकेश का कवि रूप उससे सहमत होता हुआ भी उसे समाज की आलोचनात्मक परख के पैमाने की तरह इस्तेमाल करता है । हमें क्यों चाहिए नदी, तालाब क्या इसलिए कि वे हमारे परिवार के सदस्य है, हम उन पर निर्भर हैं कि वे हमारी पारिस्थितिकी का अहम हिस्सा है या हम इसे संचित पूँजी की तरह अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाना चाहते हैं । राकेश का कवि मन यह सब कहना चाहता है लेकिन जब वह अपने चारों और देख रहा है तो उसके भीतर का रोष एक गहरे व्यंग्य में बदल जाता है गोकि इस यथार्थ को जिससे हम सब आँखे मूँदे हैं, बताने का और कोई तरीका नहीं रहा जाता,
हमें नाले भी चाहिए
गंदे पानी को नदी तक जाने के लिए
हम सभ्य लोग हैं
हमें अपनी गंदगी बहाने के लिए
नदी-नाला, तालाब और नदी सब चाहिये
‘पानी की परवाह’ हमें मत सिखाइए
इस कविता संग्रह में कवि कई लोकेशंस से बोलता है क्योंकि उसके बोलने में हमारे पानी पेड़ो की चिंता घुली है और हम उस और देख पाये इसके लिए वह अलग अलग सुरों,स्थानों से हमें पुकारता है । एक ओर पानी के नागरिक की चिंता है कि उसका गणतंत्र नष्ट किया जा रहा है, दूसरी ओर वह मेढकों की ख़बर देता है जो अब बरसात में मौसम में गाने नहीं आते, वे पाताल में कहीं धँस गए हैं । कवि सिर्फ़ इन बदलावों को ही नहीं चीन्हाता बल्कि वह हमारे समय की राजनीति को भी प्रश्नांकित करता है जिनका काम था कि वे पेड़, पानी बचाने,उन्हें स्वस्थ रखने का काम करें पर जो सिर्फ़ बाढ़ में भाषण देकर चली जाती हैं । क्या हो कि कभी नदियाँ हमसे बोल सकें, वे हमसे क्या बातें करेंगी, क्या वे हमें फटकारेगीं हमारे कामों के लिए या हमसे कहेंगी उन्हें भी जीने का हक़ है, या हमारे घर के किसी पुरनिया की तरह एक दिन दुःखी मन से कहीं ओर निकल लेंगी,
गंगा और जमुना के संगम पर.....
सारी नदियों ने महाकुंभ लगाकर
एक प्रस्ताव रखा कि
अब हमें लौट जाना चाहिए अपने घर और
छोड़ देनी चाहिए सारी ज़मीन
‘पक्के विकास’ के वास्ते
.......
यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर
एक दिन सारी नदियाँ
दुःखी मन से वापस चल दीं ।
नदियों के मिथक बनते चले जाने के पीछे कितनी कहानियाँ है, क्या हम कभी जान पायेंगे कि नदियों के मिथक में बदल जाने के पीछे किसके जीवन का सच झिलमला रहा है । जैसा कवि विद्रोही अपनी कविता में मारी गई औरतों के बयान दर्ज करने की बात करते हैं, राकेश अपने संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता में पूछ रहे हैं,
पता नहीं कौन रही होगी
वह कुँवारी लड़की
जिसको देवी बनाने के लिए
गढ़ दी गई थी एक अनोखी कहानी
जब हम नदियों से वह आत्मीय नाता रखना शुरू करते हैं, वे हमारे लिए नानी सी हो जाती हैं जिनसे हम पूछ रहे होते हैं कि उनका नाम कैसे पड़ा । उस नाम के पीछे तालाब में दफ़न हुई कुँवारी लड़की के कुँवरवर्ती देवी के मिथक में बदल जाने यथार्थ की क्या तहें हैं? हम संग्रह से गुज़रते हुए इन सबसे गुज़रते हैं और किताब ख़त्म होते होते मुझे अपने गहर के बाहर के पेड़ को ज़ोर से गले लगाने की इच्छा होती है, पेड़ चुपचाप मुस्कुरा रहा है और मैं राकेश के सवाल को किसी प्रतिज्ञा की तरह बुदबुदा रहा हूँ –
जब नदी बरसाती नाले में बदल जाये
तो निरर्थक हो जाता है
कुँवरवर्तियाँ का बलिदान
फिर पढ़ते रहो मंत्र
करते रहो पूजा
मृत नदियाँ, आत्महंता कुँवरवर्तियाँ
पुनर्जीवित नहीं हुआ करती ।
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राकेश कबीर, ज्ञानगंगा प्रकाशन 2019
Vivek Kumar Shukla
लेखक हिन्दी साहित्य के अध्येता हैं, एक उपन्यास प्रकाशित। फ़िलहाल डेनमार्क की ओर्हुस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं।
