किताबी संडे- बंटवारा और वजीर हुसैन की उलझी मज़ार
अखिलेश की किताब 'अक्स' और राही मासूम रज़ा का उपन्यास 'ओस की बूंद'
आज से हम एक नया कॉलम शुरू कर रहे हैं, किताबी संडे, जहाँ विवेक कुमार शुक्ल नई पुरानी किताबों पर लगातार बात करेंगे। पहली क़िस्त में बात अखिलेश के संस्मरण 'अक्स' और राही मासूम रज़ा का उपन्यास 'ओस की बूंद' पर
स्मृति के आँगन में मृत्यु के साथ आँख मिचौली
अक्स – अखिलेश
हम जिस समय में रहते हैं उस समय की नींव में कितनी स्मृतियाँ सोती रहती है। अखिलेश जी की किताब 'अक्स' उन स्मृतियों की यात्रा है जो हैं तो उनकी निजी लेकिन अपनी निजता में भी वे हमारी सामूहिकता से जुड़ी है । अखिलेश जी की किताब अक्स इन्ही स्मृतियों का आख्यान है जो अपने होने में तो उनकी निजी है लेकिन वे जिन संवेदनाओं को छूती है वे हमारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा है । मृत्यु की अनिवार्य उपस्थिति के गिर्द मंडराती ये स्मृतियाँ उस सत्य की धूप को ठीक हमारी आखों के आगे लाती हैं जिनसे हम यक्षप्रश्न के मनुष्य की तरह आँखें चुराये बैठे थे ।
यह किताब ग्यारह अध्यायों में बँटी है । मृत्यु की अनिवार्यता से शुरू होकर ये किताब अखिलेश की जीवन यात्रा पर निकल जाती है जहाँ कभी वह अपने बचपने में अपने माँ पिता को को याद करते हैं तो कभी इलाहाबाद में अपने प्रिय लेखकों को सामने बैठा पा इतराने और सकुचाने के बीच कहीं झूल रहे होते हैं । यह लेखक की अपनी जीवन यात्रा भर की कहानी नहीं है बल्कि उन तमाम लोगों की कहानी है जो उनके जीवन के विरामों में अपनी पूरी इयत्ता के साथ बैठे हैं । “स्मृतियाँ काल के घमण्ड को तोड़ती है” अध्याय से शुरू होती यह यात्रा समय ही दूसरे समय को मृत्यु देता है पर ख़त्म होती है । पहले ही अध्याय में पिता की मृत्यु से उपजा पछतावा,कि काश उन्होंने पिता से और बातचीत की होती, उस यात्रा पर निकलता है जहाँ वे लोग स्मृति की आभा में जगमगाते हैं जो अब नहीं है ।
दूसरे अध्याय पिता माँ और मृत्यु में अपने पिता की बात करते हुए अखिलेश जाने अनजाने उस समय का भी चित्र खींच रहे होते हैं जो अब हमारे इतिहास का हिस्सा है, “ पिता हाईस्कूल पास थे, हमेशा कमीज़ और चौड़ी मोहरी का पजामा पहनते थे, पैदल चलते थे और क्रोध करते थे” । इन पंक्तियों से गुज़रते हुए लगता है कि यह सिर्फ़ उनके पिता का चित्रण नहीं है, हिंदी जगत के पिताओं की एक सामूहिक छवि है । वह अपने पिता के बारे में लिखते हुए मितकथन का सहारा लेते हैं पर हमारे मन में उनके पिता की एक छवि उभरती है जो कुछ कुछ ज्ञानरंजन की कहानी पिता की तरह होती है । पिता की सांद्र अनुपस्थिति में माँ हैं जिनसे वे ज़्यादा हिले मिले थे ।
माँ अब बातें भूलने लगी है, उनकी बातों में पिता की शिकायतें पृष्ठभूमि की तरह आती हैं । इनके बीच लेखक को एक दिन आता है कि उनके होने में पिता का कितना बड़ा हिस्सा है, कहानियाँ गढ़ना उन्हें पिता से विरासत में मिला था जिससे वे अनजान थे । हम इस यात्रा में उनके माता पिता के बारे में और जानने को उत्सुक होते हैं कि पता चलता है कि वे नहीं है और जो अनुपस्थिति अखिलेश जी के भेतर थी अब वह हमारे भीतर बस चुकी है ।
“ माँ और पिता के न रहने के उपरान्त निश्चय ही मैं जैसा था, ठीक वैसा न रहा । जब तक वे दोनों थे, मैं उनकी मृत्यु को लेकर भयाक्रांत रहता था । उनके चले जाने के बाद मैं अपनी मृत्यु के बोध से विचलित होने लगता हूँ । लगता है, माँ और पिता हमें जीवन ही नहीं सौंपते, वे मृत्यु से भिड़ने के लिए हमें अकेला छोड़ जाते हैं । उनके जीवित रहते नहीं, बाद में हमे अहसास होता है कि हम मृत्यु के अधिक निकट आ गए हैं ।”
अक्स पढ़ते हुए ये बार बार लगता है अखिलेश जी मृत्यु की सच्चाई के साथ आँख मिचौली खेल रहे हैं । रवींद्र कालिया के साथ उनके संस्मरणों को पढ़ते हुए, कालिया जी की हँसी और जीवन जीने का अंदाज़ पाठक के मन में घर कर जाता है, और वे लोग भी जो उनसे कभी नहीं मिले उन्हें बेहद गहरे से जानने लगते हैं । हम उनके जीवन में और धँसने को होते ही है अखिलेश हमें उनकी मृत्यु के सम्मुख ला खड़ा कर देते हैं और जो हमारे भीतर कालिया जी की जगह खाली रह जाती है जिनमें उनके भाषा के अभिजात्य होने पर लगाये गए ठहाके रहते है । ऐसा ही कवि मानबहादुर सिंह, देवी प्रसाद त्रिपाठी के संस्मरणों में होता है ।
लगता है हम एक ऐसी स्मृति यात्रा पर है, हर बार जिसका अंत एक मृत्यु में, एक अनुपस्थिति में होता है । कई बार ऐसा लगता है कि अखिलेश जी अपने माता – पिता की अनुपस्थिति से जूझते हुए उस स्मृति यात्रा पर निकलते है जहाँ “चाहे जितना हम कहें काल तुझसे होड़ मेरी, किंतु एक रोज़ यह काव्यात्मक पद कमज़ोर पड़ता है” ।
यह किताब पढ़ने की ढेरों वज़हें हैं, जहाँ एक ओर शहर जीते जागते लोगों की तरह हैं तो वहीं दूसरी ओर हिंदी स्मृति लोक का हिस्सा बन चुके लोग हमारे जीवन का हिस्सा बनने को हैं। अक्स पढ़कर लगता है कि हमारे वरिष्ठों के पास बताने को कितनी बातें, सुनाने को कितनी कहानियाँ है और हम समय के फेर में फँसे उन्हें सुनना मुल्तवी किए रहते हैं । “ वे हमारे बचपन और माँ के यौवन का दौर था” यह वाक्य शायद हिंदी में माँ पर लिखे गए सुंदरतम वाक्यों में से एक है और यह किताब सिर्फ़ इस एक वाक्य के लिए भी बार बार पढ़ी जा सकती है ।
--------------
सेतु प्रकाशन 2022
इतिहास की स्याही पर गिरती ओस की एक बूँद
ओस की बूँद – राही मासूम रज़ा
“मेरे घर पर तिरंगा लहरा रहा है, और घर में सबको फ़िक्र है कि बड़े भाई दिल्ली में हैं कहा जाय या दिल्ली में थे कहा जाय? क्या यह प्रश्न भी उतना ही बड़ा सत्य नहीं हैं, जितना बड़ा सत्य यह है कि कल पाकिस्तान बन गया है और आज भारत स्वतंत्र हो गया है?”
वहशत अंसारी की डायरी के पन्ने पर लिखा यह सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा होता है जब हम राही मासूम रज़ा की किताब ओस की बूँद से गुज़र रहे होते हैं । हिंदुस्तान का बँटवारा हमारा साझा इतिहास है लेकिन क्या वह सिर्फ़ इतहास की चीज़ है, ओस की बूँद बंटवारे की दहलीज़ से हुरू होकर, बाद के वक़्त के उन प्रश्नों को टटोलती है जो आज भी वर्तमान है । हिंदुस्तान के बँटवारे के बाद यहाँ रह रहे मुसलमान जिन्होंने हिजरत को फलसफ़ा नहीं बनाया, उनके सवाल क्या थे? आज़ाद हिंदुस्तान में जो कह रहे थे कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों को भी जीने का हक़ मिले । बँटवारा जो सरहदों का हुआ था वो घरों का न हो, रिश्तों का न हो ।
ओस की बूँद उसी बँटवारे की कहानी है जो शुरू तो सरहदों से हुआ था लेकिन वहीं तक नहीं रुका, जो शहरों, मुहल्लों को पार करता घरों तक आ पहुँचा । कहने को तो यह कहानी वज़ीर हुसैन की भी हो सकती है जिनके दो बेटे थे । एक वो स्कूल जो उन्होंने प्यार और जतन से बनवाया था जिसने अपान नाम मुस्लिम एंग्लो वर्नाक्युलर हाई स्कूल से बदलकर मुस्लिम एंग्लो हिंदुस्तानी हायर सेकेंड्री स्कूल कर लिया ।
दूसरा बेटा था अली बाक़र ख़ाँ जो पाकिस्तान बनवाने के ख़िलाफ़ था लेकिन पाकिस्तान चला गया । इस कहानी में वह मंदिर भी है जो वज़ीर हसन की हवेली के अहाते में है जिसके पुजारी की तनख़्वाह उनके घर से जाती रही । मंदिर में पूजा एक दिन बंद हो जाती है कि राम अवतार नहीं चाहता कि पूजा करने से वो बँटवारा और तीखा हो जिसके निशान अभी ताज़े हैं । वज़ीर हुसैन राम अवतार के कुँये में फेंके शंख को निकलते हैं और पूजा शुरू करने में पुलिस के हाथों मारे जाते हैं । राही जो सवाल 1988 में पूछ रहे थे क्या वह आज भी हमारे समय का सच नहीं है? तब वज़ीर हुसैन मारे जा रहे थे आज कोई इख़लाक़ या गुमशुदा होता नज़ीब ।
यह कहानी जितनी वज़ीर हुसैन की है उतनी ही दीनदयाल की भी है । दीनदयाल जो जानते हैं कि चचा को चाचा में बदल देना सिर्फ़ भाषा का मसला नहीं है बल्कि पहचान को बदल देने का भी सवाल है । दीनदयाल जो वज़ीर हुसैन के साथ पले, बढ़े पर उन दिनों मुसलमानों से झल्लाए थे। उनकी झल्लाहट का रंग गेरुआ था और वज़ीर हुसैन के डर का रंग सब्ज़ । दोनों दोस्त थे पर आमने सामने थे, दीनदयाल के लिए धर्म सबसे बड़ा था पर दोस्ती उतनी ही अहम की वज़ीर हुसैन की मौत के दिन आधे वह भी मर गए थे । इन सबके बीच शहला है, वज़ीर हुसैन की पोती जो अपने दादा की मज़ार बनवाने के लिए हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था से पूछ रही है कि उसे उसकी ज़मीन में अपने दादा की मज़ार बनवाने का हक़ है या नहीं? किसे पता था कि सालों बाद ये सवाल फिर आयेगा पर इस बार बाबरी की शक़ल में, आज भी सवाल यही है कि क्या किसी शहला को बाबरी बनवाने का हक़ है या नहीं ।
शहला जिसे वहशत ने मना कर दिया कि वो किसी हिंदू वक़ील के पास जाये, बँटवारा न्याय तक आ पहुँचा, शहला उस रोज़ वहशत अंसारी को कुर्ते देने गई थी पर वहशत अंसारी वकील को उनके मशवरे के लिए दस का नोट दे कर आई ।उसकी आत्मा पर एक दस के नोट का इतना वज़न है कि वह खुल कर साँस भी नहीं ले पाती । आज़ाद हिंदुस्तान की अदालत से वह बार -बार पूछ रही है क्या उसके उसके दादा मरहूम वज़ीर हुसैन की मज़ार बनवाने का भी हक़ नहीं ।
इस किताब में एक शहरनाज़ है । शहरनाज़ जो एक दुपहर गाज़ीपुर से निकली और बंबई में फ़िल्म फ़ाइनेंसरो और सेठों को मक्खन की तरह लगाई गई । उसकी कहानी ग़ाज़ीपुर की दुपहर में ख़त्म हो गई होती अगर हिम्मत जौनपुरी ने अपनी माँ को लिखे ख़त में उसकी दास्तान न दर्ज़ की होती । ओस की बूँद हिदुस्तान की कहानी है, हिंदुस्तान जिसका बँटवारा 1947 में हुआ था और आज 2026 तक वो बँटवारा रुका नहीं है। शहर, मोहल्ले, जानवर, न्याय सब बँटे और नहीं बदला तो वह सवाल जो वहशत अंसारी ने एक दुपहर अपनी डायरी में लिखा था -
“ ... गाय और आदमी । कौन बड़ा है? तो आख़िर जब बलवे होते हैं, तो पूरी के शंकराचार्य बोलते क्यों नहीं कि मनुष्य को काटना बंद करो । यहीं से यह सवाल पैदा होता है कि शुद्र ब्रह्मा के पाँव से निकले ।ब्रह्मा का बदन ख़त्म हो गया । तो फिर मैं वहशत अंसारी कहाँ से निकला हूँ? क्या कोई और ब्रह्मा है?
-----------------------------
राजकमल प्रकाशन 1988
Vivek Kumar Shukla
लेखक हिन्दी साहित्य के अध्येता हैं, एक उपन्यास प्रकाशित। फ़िलहाल डेनमार्क की ओर्हुस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं।