ZEE TV के मालिक सुभाष चंद्रा को 22 हजार करोड़ के बदले बैंकों को देना होगा सिर्फ 6.5 करोड़
22 हजार करोड़ का लोन और सेटलमेंट सिर्फ 6.5 करोड़ में।
22 हजार करोड़ का लोन और सेटलमेंट सिर्फ 6.5 करोड़ में। जी हां, सही सुन रहे हैं आप। दिवालिया घोषित हो चुके ZEE टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा को लोन देने वाले बैंकों को राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने 99.97 प्रतिशत का हेयरकट दिया है। हां हेयरकट मतलब लोन की राशि वसूली में कटौती। बैंकिंग प्रणाली और दिवालियापन (Insolvency) कानून के भी बड़े अजीबोगरीब नियम हैं। इस देश में पता नहीं उद्योगपतियों, कारोबारियों और सुपर रीच के लिए बैंकों ने अलग नियम बना रखे हैं और किसानों के लिए अलग। दिवालिया घोषित उद्योगपतियों के लिए 99 प्रतिशत का हेयरकट और किसानों से लोन की पूरी रकम की वसूली।
अब सवाल है ये हेयरकट आखिर क्या बला है। इसका अभिप्राय बाल काटने से नहीं है। इसका अभिप्राय लोन राशि की वसूली में सरकार की तरफ से मिली कटौती की सुविधा है। जब कोई बैंक कर्जदारों को 'हेयरकट' देता है,तो इसका मतलब है कि बैंक किसी विशेष ऋण खाते में देय राशि से कम स्वीकार करता है। उदाहरण के लिए- यदि किसी उधारकर्ता पर बैंक का 10,000 रुपये बकाया है और बैंक केवल 8,000 रुपये वापस लेने के लिए सहमत होता है, तो वह 20% हेयरकट लेता है। बैंक ऐसा उन खातों के लिए करते हैं जहां पूरी वसूली की संभावना बहुत कम होती है। सारा पैसा खोने या समय के साथ संपत्ति का मूल्य घटने देने के बजाय, बैंक कभी-कभी कम राशि पर समझौता करना चुनते हैं।
हाल ही में, भारत के दिवालियापन कानून की आलोचना हुई है क्योंकि बैंकों ने कुछ बड़े खातों में भारी हेयरकट लिया है। आलोचकों का तर्क है कि बैंकों द्वारा ऋण राशि पर 90-95% तक हेयरकट स्वीकार करने के कारण, भारत के दिवालियापन कानून ऋण वसूली के मामले में अप्रभावी साबित हो रहे हैं।
CNBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, NCLT ने डॉ. सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में पेश की गई पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी है। इसके तहत लेनदारों को 22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों (लोन) के बदले केवल 6.5 करोड़ रुपये मिलेंगे। यानी करीब 99.97 प्रतिशत की भारी कटौती स्वीकार की गई है। यह आदेश न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा ने तीसरे सदस्य के रूप में सुनाया। इससे पहले 3 सितंबर 2025 को NCLT की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले में अलग-अलग राय दी थी। मतभेद दूर करने के लिए फरवरी 2026 में NCLT अध्यक्ष ने मामला शर्मा के पास भेजा था। उनके फैसले से पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी देने के पक्ष में बहुमत बन गया।
मामले की गंभीरता का अंदाजा LIC Housing Finance के आंकड़े से लगाया जा सकता है। उसका दावा करीब 1,322.39 करोड़ का है, जबकि रीपेमेंट प्लान में उसे लगभग 38.09 लाख रुपये मिलने की बात है। यानी करीब 0.028% की रिकवरी। कुछ बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने इस रीपेमेंट प्लान का विरोध किया था। लेकिन योजना को कर्जदार के 80.81% वोटिंग शेयर का समर्थन मिला।
बता दें कि नवंबर 2024 में हुई लेनदारों की बैठक में इस योजना को 80.814 प्रतिशत मतों से मंजूरी मिली थी, जो दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत आवश्यक 75 प्रतिशत सीमा से अधिक है।
LIC Housing Finance , HDFC बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, RBL बैंक, IDBI ट्रस्टीशिप (फ्रैंकलिन टेम्पलटन फंड) और यूनियन बैंक समेत योजना का विरोध करने वाले लेनदारों की कुल वोटिंग हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से कम थी।
IBC की धारा 115 के तहत अब यह योजना उन सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिन्होंने इसके विरोध में मतदान किया था। न्यायाधिकरण ने कहा कि योजना खारिज होने पर भी असहमत लेनदारों को इससे अधिक रकम मिलने की संभावना नहीं थी। रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के मूल्यांकन के अनुसार, चंद्र की संपत्तियों का मूल्य प्रस्तावित भुगतान से भी काफी कम है।
न्यायाधिकरण ने विरोध करने वाले लेनदारों की कई आपत्तियां खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि योजना को मंजूरी देने की प्रक्रिया में कोई गंभीर कानूनी उल्लंघन नहीं हुआ। यह दलील भी स्वीकार नहीं की गई कि सुभाष चंद्रा से जुड़ी संस्थाओं के कारण मतदान प्रभावित हुआ। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, विवादित संस्थाएं IBC की धारा 79(2)(g) के तहत ‘सहयोगी’ की वैधानिक परिभाषा में नहीं आतीं और इस परिभाषा का मनमाना विस्तार नहीं किया जा सकता।
लेनदारों ने चंद्रा की पुरानी और मौजूदा कुल संपत्ति के बीच भारी अंतर का मुद्दा भी उठाया था। पहले जमा किए गए प्रमाणपत्रों में उनकी कुल संपत्ति 2017 में करीब 45,888 करोड़ और 2018 में 40,562 करोड़ रुपये बताई गई थी। इसके विपरीत, वर्तमान में उनकी घोषित कुल संपत्ति लगभग 31.79 करोड़ रुपये है।
न्यायाधिकरण ने कहा कि केवल इस अंतर के आधार पर संपत्ति छिपाने या धन के हस्तांतरण का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। साथ ही, किसी पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी देने से पहले फॉरेंसिक ऑडिटर की नियुक्ति करना IBC के तहत अनिवार्य नहीं है। हालांकि, योजना को एक संशोधन के साथ मंजूरी दी गई है। अनिल कुमार और सुनील जैन द्वारा 1,260 लोगों की ओर से दाखिल किए गए दावों को लेनदारों की अंतिम सूची से बाहर रखा जाएगा। रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को शेष पात्र लेनदारों के बीच पुनर्भुगतान राशि दोबारा बांटने का निर्देश दिया गया है।
अब यह मामला कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत बहुमत की राय के अनुरूप औपचारिक आदेश पारित करने के लिए मूल दो सदस्यीय पीठ के पास वापस जाएगा।
इस मामले की शुरुआत 2022 में हुई थी, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड ने व्यक्तिगत गारंटर के रूप में चंद्र के खिलाफ दिवाला कार्यवाही शुरू करने के लिए IBC की धारा 95 के तहत आवेदन किया था। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के कारण कुछ समय तक कार्यवाही स्थगित रही। रोक हटने के बाद अप्रैल 2024 में NCLT ने चंद्रा को व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में शामिल कर लिया।
इस घटनाक्रम पर भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि,
अगर यह सच है तो मेरे मित्र सुभाष को बहुत-बहुत बधाई। बैंकों और सरकार ने स्वीकार किया है कि मुझसे 6,203 करोड़ रुपये के न्यायिक कर्ज के मुकाबले 14,100 करोड़ वसूले जा चुके हैं। कई अन्य कर्जदारों ने बहुत कम रकम में समझौता किया है। शायद यही भारतीय ऋण समाधान न्याय है। मीडिया की ओर से कोई सवाल नहीं।
विजय माल्या 2 मार्च 2016 को भारत छोड़कर ब्रिटेन चले गए थे। उस समय कई सरकारी बैंकों समेत भारतीय बैंकों का एक समूह किंगफिशर एयरलाइंस से जुड़े बकाया कर्ज की वसूली के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहा था।