12 सालों में बैंकों ने 10 लाख करोड़ के कॉर्पोरेट लोन किए राइट ऑफ
केंद्र सरकार ने संसद में यह जानकारी दी है।
बिजनेस स्टोरी में अक्सर आप Tax Haven की बात पढ़ते होंगे। लेकिन Loan Haven की बात नहीं पढ़ते होंगे। केमैन आइलैंड् (Cayman Islands) स्विट्जरलैंड, सिंगापुर, लक्जमबर्ग, बरमूडा, मॉरीशस और हांगकांग इन देशों को टैक्स हेवन देशों के नाम से जाना जाता है। यहां विदेशी नागरिकों को कोई टैक्स नहीं लगता है। इन देशों में हमारे देश के बड़े-बड़े कारपोरेट और नेता अपना काला धन निवेश करते हैं टैक्स देने से बच जाते हैं। लेकिन अपने ही देश के बैंकों से लोन लेकर लोन नहीं चुकाने और फिर लोन माफ कर दिए जाने को आप क्या कहेंगे। यह भी तो एक तरह से उनके लिए Loan Haven ही हुआ न!
अजीब बात है किसानों को बैंक कर्ज चुकाने के लिए इतना परेशान करते हैं कि उन्हें आत्महत्या तक करने को मजबूर होना पड़ता है और वही बैंक कारपोरेट को दोनों हाथ से लोन भी देती है और फिर माफ भी कर देती है। बेंक ने इसके लिए बड़ा ही कानूनी शब्द बना लिया है- राइट ऑफ। बैंक इस शब्द के आड़ में बड़े ही चालाकी से इस बात को दोहराती है कि राइट ऑफ का मतलब कर्ज माफ करना नहीं है।
The Wire की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 12 वित्तीय वर्षों में बैंकों ने बड़े कॉरपोरेट और सेवा क्षेत्र को दिए गए करीब 10 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को राइट-ऑफ किया है। केंद्र सरकार ने सोमवार (10 अगस्त) को संसद में यह जानकारी दी। एक लिखित जवाब में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़े साझा करते हुए बताया कि बड़े उद्योगों और सेवा क्षेत्र पर बकाया कर्ज वित्त वर्ष 2024-25 में 63,19,057 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 69,21,734 करोड़ रुपये हो गया। आंकड़ों के मुताबिक, कर्ज राइट-ऑफ का आंकड़ा वित्त वर्ष 2018-19 में सबसे अधिक 1,48,753 करोड़ रुपये था। वहीं, 2025-26 में यह घटकर 20,485 करोड़ रुपये रह गया।
पंकज चौधरी ने बताया कि RBI की Resolution of Stressed Assets Directions, 2025 के अनुसार, कमर्शियल बैंकों द्वारा किया जाने वाला राइट-ऑफ एक अकाउंटिंग प्रक्रिया है। इसका इस्तेमाल बैंक अपनी बैलेंस शीट को समायोजित करने के लिए करते हैं। राइट-ऑफ का बड़ा हिस्सा तकनीकी या प्रूडेंशियल राइट-ऑफ तथा वसूली की प्रक्रिया में चल रहे कर्जों से संबंधित होता है।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि,
कर्ज को राइट-ऑफ करने का अर्थ कर्ज माफ करना नहीं है। इससे कर्ज लेने वाले व्यक्ति, किसान या कॉरपोरेट की देनदारी समाप्त नहीं होती और न ही उसे कोई प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। कर्ज लेने वाला व्यक्ति या कंपनी रकम चुकाने के लिए जिम्मेदार बनी रहती है और बैंक ऐसे खातों में पहले से शुरू की गई वसूली की कार्रवाई जारी रखते हैं।
संकट में फंसे कर्जदारों को राहत देने के लिए RBI ने 28 नवंबर 2025 को Master Direction on Resolution of Stressed Assets, 2025 जारी किया था, जिसे 1 जुलाई 2026 तक अपडेट किया गया है। इसके तहत बैंकों और अन्य कर्जदाताओं को अपनी बोर्ड द्वारा अनुमोदित नीतियों और नियामकीय दिशानिर्देशों के आधार पर वित्तीय संकट में फंसे कर्जदारों के कर्ज का पुनर्गठन करने का अधिकार दिया गया है। इससे पहले दिसंबर 2025 में भी पंकज चौधरी ने संसद को बताया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) ने पिछले पांच वित्तीय वर्षों और चालू वित्त वर्ष में 30 सितंबर 2025 तक कुल 6,15,647 करोड़ रुपये के कर्ज को राइट-ऑफ किया था।
एक अन्य सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री ने कहा कि सरकार सतत आर्थिक विकास को समर्थन देने के साथ-साथ राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2020-21 में GDP का 9.2% था, जो 2025-26 में घटकर 4.4% रह गया। इसी अवधि में सरकार की कुल बकाया देनदारियां GDP के 61.5% से घटकर 58.2% हो गईं। वहीं, सरकार का पूंजीगत खर्च 2020-21 के 4.3 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 10.7 लाख करोड़ रुपये हो गया।
घरेलू मांग भी मजबूत बनी रही। वास्तविक निजी अंतिम उपभोग व्यय यानी Real Private Final Consumption Expenditure की वृद्धि दर 2024-25 के 5.8% से बढ़कर 2025-26 में 7.7% हो गई। इसके साथ ही खुदरा महंगाई 2025-26 में औसतन 2.1% रही, जो 2014-15 के बाद सबसे निचला स्तर है।
Periodic Labour Force Survey के आंकड़ों का हवाला देते हुए मंत्री ने बताया कि 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में सामान्य स्थिति के आधार पर बेरोजगारी दर 2017-18 में 6% थी, जो 2025 में घटकर 3.1% हो गई। एक अन्य सवाल के जवाब में चौधरी ने बताया कि पिछले पांच वित्तीय वर्षों में 5,85,751 डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी के मामले सामने आए। इनमें कुल 3,590.70 करोड़ रुपये की रकम शामिल थी।
उन्होंने कहा कि सरकार, RBI और NPCI ने डिजिटल भुगतान प्रणालियों से जुड़े उभरते साइबर खतरों का आकलन करने, साइबर सुरक्षा मजबूत करने, फ्रॉड डिटेक्शन बेहतर बनाने, उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ाने और शिकायतों के समय पर समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं।
भारत का बाहरी कर्ज मार्च 2026 के अंत में 762.8 अरब अमेरिकी डॉलर था। अल्पकालिक विदेशी कर्ज का GDP से अनुपात 4.1% रहा। मार्च 2026 के अंत में भारत का कुल विदेशी कर्ज GDP का 20.8% था। विदेशी मुद्रा भंडार कुल बाहरी कर्ज के 90.6% के बराबर था, जबकि मूल परिपक्वता के आधार पर अल्पकालिक कर्ज कुल विदेशी कर्ज का 19.6% था। देश का Debt Service Ratio मार्च 2025 के अंत में 6.6% था, जो मार्च 2026 में घटकर 5.8% हो गया।