Politics

इतिहास में मनमोहन सिंह के साथ हुई थी नाइंसाफी, देश को अब हो रहा अहसास

Roqaiya Bushri Roqaiya Bushri | 2h ago · 11 min read
इतिहास में मनमोहन सिंह के साथ हुई थी नाइंसाफी, देश को अब हो रहा अहसास

मनमोहन सिंह की कहानी को आज के समय में नए सिरे से पढ़ने की जरूरत है।

डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद छोड़ने से कुछ महीने पहले 3 जनवरी 2014 को अपनी आखिरी बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। सामने देशभर के पत्रकार थे और सवाल भी आसान नहीं थे। उनकी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों, आर्थिक सुस्ती और राजनीतिक संकटों से घिरी हुई थी। उनसे पूछा गया कि क्या वह अपनी सरकार की स्थिति को संभाल नहीं पाए और क्या इतिहास उन्हें एक कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में याद करेगा।

मनमोहन सिंह ने जवाब दिया था,

मैं ईमानदारी से मानता हूं कि इतिहास मेरे प्रति समकालीन मीडिया या संसद में विपक्षी दलों से अधिक दयालु होगा।

उन्होंने यह भी कहा था कि,

गठबंधन की राजनीति की अपनी मजबूरियां होती हैं और परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने जितना संभव था, उतना करने की कोशिश की थी।

उस समय यह बात किसी ऐसे प्रधानमंत्री की सफाई जैसी सुनाई दी थी, जिसकी सरकार अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही थी। लेकिन अब, 2026 में, उनके उस वाक्य को दोबारा पढ़ने की एक वजह है। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल की सबसे विवादित कहानियों में से एक, तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन मामला, अब सर्वोच्च न्यायालय में समाप्त हो चुका है। 29 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने CBI की क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को बंद कर दिया और 2015 में जारी किया गया समन भी रद्द कर दिया।

जिस व्यक्ति को कभी इसी मामले में आरोपी के तौर पर अदालत के सामने बुलाया गया था, उसके खिलाफ वर्षों चली वह आपराधिक कार्यवाही अब खत्म हो चुकी है। मनमोहन सिंह इस फैसले को देखने के लिए इस दुनिया में नहीं थे। दिसंबर 2024 में उनका निधन हो चुका था। यहीं से मनमोहन सिंह की कहानी को फिर से पढ़ने की जरूरत महसूस होती है।

एक ही व्यक्ति की दो तस्वीरें

मनमोहन सिंह की राजनीतिक विरासत पर बात करते समय अक्सर हमारे सामने दो अलग-अलग तस्वीरें आती हैं। पहली तस्वीर उस अर्थशास्त्री की है, जिसने 1991 के आर्थिक संकट के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी तस्वीर उस प्रधानमंत्री की है, जिसकी दूसरी पारी 2G, कोयला आवंटन, कॉमनवेल्थ गेम्स, महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों के शोर में लगभग दब गई।

समस्या शायद यही है कि समय के साथ दूसरी तस्वीर इतनी बड़ी होती गई कि पहली तस्वीर दिखाई देना ही कम हो गई।

1991 में भारत गंभीर भुगतान-संतुलन संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम रह गया था और देश को अपने आयात और बाहरी भुगतान को संभालने में कठिनाई हो रही थी। इसी दौर में पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और उन्होंने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया। इसके बाद आर्थिक उदारीकरण की वह प्रक्रिया शुरू हुई जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था के ढांचे में बड़ा बदलाव किया।

औद्योगिक लाइसेंसिंग में बदलाव, आयात शुल्क में कमी, विदेशी निवेश के लिए रास्ते खोलना और भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार से जोड़ना उस परिवर्तन का हिस्सा थे। लेकिन 1991 के आर्थिक सुधारों को केवल मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत उपलब्धि कहना भी सही नहीं होगा। यह नरसिम्हा राव के राजनीतिक नेतृत्व और मनमोहन सिंह की आर्थिक समझ, दोनों का परिणाम था। इतिहास में दोनों की भूमिकाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

अर्थशास्त्री से प्रधानमंत्री तक

फिर वही अर्थशास्त्री 2004 में देश का प्रधानमंत्री बना। यह भारतीय राजनीति की असामान्य घटनाओं में से एक थी। मनमोहन सिंह पारंपरिक अर्थों में जननेता नहीं थे। उनके पीछे कोई बड़ा जनआंदोलन नहीं था, वे चुनावी भाषणों के आक्रामक वक्ता नहीं थे और उनकी राजनीति का तरीका भी बाकी नेताओं से अलग था। वे अर्थशास्त्र, प्रशासन, संस्थाओं और बातचीत की भाषा में ज्यादा सहज थे।

लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार ने ऐसे कई कानून और नीतियां आगे बढ़ाईं जिनका असर रोजमर्रा के जीवन तक पहुंचा। सूचना का अधिकार कानून ने नागरिकों को सरकार से सूचना मांगने का कानूनी अधिकार दिया। मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार की गारंटी का अधिकार आधारित ढांचा बनाया। शिक्षा के अधिकार और खाद्य सुरक्षा जैसे कानूनों ने कल्याणकारी राज्य की भूमिका को और विस्तार दिया।

भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता भी उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की महत्वपूर्ण पहलों में था। इस समझौते को लेकर उनकी अपनी पार्टी और गठबंधन के भीतर भी काफी राजनीतिक विरोध हुआ। सरकार की स्थिरता तक पर सवाल उठे, लेकिन मनमोहन सिंह इस समझौते के पक्ष में डटे रहे।

यानी उनके दस साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल की कहानी केवल घोटालों की कहानी नहीं थी। लेकिन राजनीति अक्सर पूरी कहानी नहीं सुनाती। उसे एक ऐसी कहानी चाहिए जिसे जनता आसानी से याद रख सके। और UPA-II के समय वह कहानी थी, भ्रष्टाचार।

“साइलेंट प्रधानमंत्री” से “कमजोर प्रधानमंत्री” तक

धीरे-धीरे मनमोहन सिंह के लिए “साइलेंट प्रधानमंत्री” का शब्द इस्तेमाल होने लगा। उसके बाद यही शब्द “कमजोर प्रधानमंत्री” की राजनीतिक धारणा से जुड़ गया। सवाल उठने लगा कि प्रधानमंत्री वास्तव में कौन है और सरकार कौन चला रहा है। विपक्ष ने इसे राजनीतिक हथियार बनाया और मीडिया के एक हिस्से ने भी इस धारणा को लगातार जगह दी।

2G और कोयला आवंटन विवादों ने इस छवि को और मजबूत किया। लेकिन यहीं एक जरूरी अंतर समझना होगा। राजनीतिक जिम्मेदारी और आपराधिक जिम्मेदारी एक ही चीज नहीं होती।

किसी सरकार में गलत नीति बन सकती है। किसी निर्णय में प्रशासनिक चूक हो सकती है। प्रधानमंत्री पर राजनीतिक जिम्मेदारी भी आ सकती है। लेकिन किसी व्यक्ति को आपराधिक रूप से दोषी ठहराने के लिए अदालत में अलग स्तर के प्रमाण की आवश्यकता होती है। मनमोहन सिंह की कहानी में यही अंतर बार-बार दिखाई देता है।

2G और राजनीतिक धारणा

2G स्पेक्ट्रम मामला UPA-II की सबसे बड़ी राजनीतिक परेशानियों में से एक बन गया। CAG की रिपोर्ट में संभावित राजस्व हानि का बड़ा अनुमान सामने आया और यह मामला राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बन गया। लेकिन दिसंबर 2017 में विशेष CBI अदालत ने इस मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत के फैसले ने अभियोजन के मामले और उसके प्रमाणों पर गंभीर सवाल उठाए।

इसका मतलब यह नहीं था कि UPA सरकार की हर नीति सही साबित हो गई या सरकार की राजनीतिक आलोचना समाप्त हो गई। लेकिन यह जरूर स्पष्ट हुआ कि जिस मामले को राजनीतिक विमर्श में एक बड़े घोटाले के रूप में स्थापित किया गया था, उसमें आपराधिक अदालत के सामने आरोप उस रूप में साबित नहीं हो सके। हालांकि तब तक राजनीतिक और सार्वजनिक छवि को काफी नुकसान पहुंच चुका था। मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत छवि भी उस पूरे विवाद से जुड़ चुकी थी।

कोयला मामला और वर्षों बाद आया फैसला

इसके बाद कोयला आवंटन का मामला सामने आया। यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए कुछ समय के लिए कोयला मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाला था। तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक आवंटन मामला 2005 में हिंडाल्को को हुआ था और बाद में इस आवंटन की जांच हुई।

2015 में विशेष अदालत ने मनमोहन सिंह, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, तत्कालीन कोयला सचिव पी.सी. पारख और अन्य लोगों को आरोपी के तौर पर समन किया। उस समय यह सिर्फ अदालत की खबर नहीं थी। यह राजनीतिक खबर थी। एक ऐसे पूर्व प्रधानमंत्री, जिन्हें लंबे समय से व्यक्तिगत ईमानदारी के लिए जाना जाता था, अब उनका नाम कोयला आवंटन मामले के आरोपी के रूप में सामने था।

लेकिन कानूनी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। CBI ने मामले में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की। मामला अदालतों में चलता रहा और अंततः जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने CBI की क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार कर ली। अदालत ने 2015 के समन आदेश को रद्द कर दिया और उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी। यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम है। लेकिन इसे समझने में सावधानी भी जरूरी है। राजनीतिक बहस में मनमोहन सिंह पर लगाए गए कई आरोपों को जिस व्यापक तरीके से उनके व्यक्तिगत चरित्र और ईमानदारी से जोड़ दिया गया था, तालाबीरा-II का घटनाक्रम उस तस्वीर को दोबारा देखने के लिए मजबूर करता है। जिस मामले का इस्तेमाल उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी और ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए किया गया, उसी मामले में अंततः उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई।

यह फैसला मीडिया और आम जनता दोनों के लिए एक सबक है कि राजनीति को केवल आरोपों और नैरेटिव के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर भी देखा जाना चाहिए।

देर से मिला न्याय और उसका मानवीय पक्ष

इस फैसले का एक मानवीय पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देर से मिला न्याय, दरअसल बहुत न्यायपूर्ण नहीं होता। पूर्व प्रधानमंत्री के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 26 दिसंबर 2024 को मनमोहन सिंह इस दुनिया से चले गए और जिस व्यक्ति ने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के सबसे कठिन वर्षों में लगातार आलोचना झेली, वह अपने खिलाफ चले इस मामले के अंतिम न्यायिक परिणाम को खुद नहीं देख सका। शायद यही उनकी कहानी का सबसे दुखद हिस्सा है।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि उनके खिलाफ लगाए गए सारे आरोप झूठे साबित हो गए? नहीं। इतिहास को इतना सरल बना देना भी मनमोहन सिंह के साथ न्याय नहीं होगा।

UPA-II के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों ने वास्तविक राजनीतिक नुकसान किया। सरकार को आर्थिक और प्रशासनिक मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। नीतिगत फैसलों में देरी को लेकर आलोचना हुई। गठबंधन की राजनीति ने निर्णय लेने की प्रक्रिया को जटिल बनाया। इन सवालों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि बाद में कुछ मामलों में अदालतों का फैसला अलग रहा। लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक आरोपों को न्यायिक दोषसिद्धि मान लेना भी उतना ही गलत होगा। यही वह जगह है जहां मनमोहन सिंह की कहानी को आज के समय में नए सिरे से पढ़ने की जरूरत है।

राजनीति में छवि कभी-कभी तथ्य से ज्यादा तेज चलती है

उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक त्रासदी शायद यह थी कि उन्होंने राजनीति को उसी भाषा में नहीं खेला, जिसमें उनके विरोधी खेल रहे थे। वे हर आरोप का जवाब आक्रामक भाषण से नहीं देते थे। वे हर दिन कैमरे के सामने नहीं आते थे। वे राजनीतिक शोर को राजनीतिक शोर से जवाब देने वाले नेता नहीं थे। इसलिए शायद उनकी चुप्पी को धीरे-धीरे उनकी कमजोरी समझ लिया गया।

लेकिन चुप रहना और निष्क्रिय होना एक ही बात नहीं है।

मनमोहन सिंह की सार्वजनिक शैली में एक तरह की संकोची विनम्रता थी। वे अपने काम के बारे में ज्यादा बोलने के बजाय उसे अपने रिकॉर्ड पर छोड़ देने वाले व्यक्ति थे। शायद आज के राजनीतिक माहौल में यह तरीका असामान्य लगता है, लेकिन उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा को देखें तो यह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था।

जब सरकार पर आरोप लग रहे थे, तब मनमोहन सिंह एक व्यक्ति से ज्यादा एक राजनीतिक प्रतीक बन गए थे। विपक्ष के लिए वे UPA की विफलताओं का चेहरा थे। मीडिया के एक हिस्से के लिए वे एक कमजोर और नियंत्रित प्रधानमंत्री की छवि बन चुके थे। कांग्रेस के लिए वे गठबंधन की जटिल राजनीति के बीच सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री थे। लेकिन सच शायद इन तीनों तस्वीरों से कहीं ज्यादा जटिल था।

इतिहास का काम राजनीतिक नारे दोहराना नहीं है

किसी प्रधानमंत्री की विरासत को केवल उसके कार्यकाल के आखिरी वर्षों के राजनीतिक शोर से नहीं समझा जा सकता। मनमोहन सिंह को समझने के लिए 1991 को भी देखना होगा, 2004 को भी, UPA-I की उपलब्धियों को भी और UPA-II की विफलताओं को भी। हमें RTI और मनरेगा को भी देखना होगा और 2G तथा कोयला विवाद को भी। परमाणु समझौते को भी समझना होगा और गठबंधन सरकार की सीमाओं को भी। और अब हमें उन आरोपों के न्यायिक परिणामों को भी देखना होगा, जिन्होंने उनकी सार्वजनिक छवि को प्रभावित किया।

जब इन सभी बातों को एक साथ जोड़ते हैं, तब जाकर मनमोहन सिंह की तस्वीर पूरी होती है। एक तरफ वह अर्थशास्त्री हैं, जिन्होंने 1991 के संकट में देश की आर्थिक दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी तरफ वह प्रधानमंत्री हैं, जिनके कार्यकाल में अधिकार आधारित कई कानून आए। वही प्रधानमंत्री UPA-II के दौरान गंभीर राजनीतिक संकटों से भी घिरे। और वही व्यक्ति जीवन के अंतिम वर्षों में यह कहकर चले गए कि इतिहास उनके बारे में शायद अपने समय के राजनीतिक शोर से अलग फैसला करेगा।

आज, समय बीतने के साथ उनकी कही वह बात काफी हद तक सही साबित होती दिखाई देती है। बेशक उनकी सरकार में गलतियां थीं। राजनीतिक सीमाएं थीं। प्रशासनिक कमियां थीं। लेकिन उनके खिलाफ लगे हर राजनीतिक आरोप को व्यक्तिगत आपराधिक दोष के बराबर मान लेना भी तथ्य और कानून, दोनों के साथ न्याय नहीं करता।

मनमोहन सिंह की विरासत

तमाम आरोपों और विवादों के बावजूद मनमोहन सिंह की विरासत को कुछ शब्दों में समेटना आसान नहीं है। वे “मौन” थे, लेकिन उनके काम ने भारत की अर्थव्यवस्था और दुनिया के सामने उसकी भूमिका पर गहरा असर डाला। उनके रणनीतिक फैसलों, तार्किक सोच और दूरदर्शिता ने ऐसे कई बदलावों की नींव रखी, जिनका प्रभाव उनके प्रधानमंत्री पद से आगे तक गया।

डॉ. सिंह ऐसे राजनेता थे जिनकी सबसे बड़ी ताकत शायद वही चीज बन गई, जिसे उनके विरोधियों ने उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बताया था: उनका संयम।

तत्कालीन विपक्ष ने उन पर तमाम आरोप लगाए और मीडिया के एक हिस्से ने उन आरोपों को लगातार इतना दोहराया कि वे सार्वजनिक धारणा का हिस्सा बन गए। लेकिन वक्त की अपनी एक आदत होती है। वह शोर के ऊपर जमी धूल को धीरे-धीरे हटा देता है। अदालतें सबूत देखती हैं, रिकॉर्ड सामने आते हैं और फिर समय उन बातों को अलग करने लगता है, जिन्हें कभी एक ही रंग में रंग दिया गया था।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ भी शायद यही हो रहा है। जिन वर्षों में उन्हें लगातार कठघरे में खड़ा किया गया, आज उन्हीं वर्षों को दोबारा पढ़ने की जरूरत महसूस हो रही है। उनकी सरकार की कमियों को नकारे बिना, उनके योगदान को स्वीकार करना और राजनीतिक आरोपों तथा न्यायिक निष्कर्षों के बीच अंतर समझना ही उनके प्रति सबसे ईमानदार दृष्टिकोण होगा। मनमोहन सिंह ने कहा था कि इतिहास उनके प्रति दयालु होगा। हो सकता है इतिहास दयालु न हो। लेकिन अब उसके पास राजनीतिक नारों से अलग एक लंबा रिकॉर्ड है। राजनीति तत्काल फैसला सुनाती है। अदालतें सबूत देखती हैं। और अंत में समय उन दोनों के बीच का फर्क सामने ले आता है।

शायद मनमोहन सिंह की विरासत को समझने की शुरुआत भी यहीं से होती है- एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में, जिसे उसकी राजनीति ने हरा दिया था, लेकिन जिसे इतिहास अभी पूरी तरह पढ़ना बाकी है।
Roqaiya Bushri

Roqaiya Bushri

शोधार्थी रौकेया बसरी को सामाजिक,राजनीतिक और महिलाओं के मुद्दे पर लिखने में रुचि है।