UPI पेमेंट पर चार्ज: आत्मनिर्भर भारत में अमेरिकी कंपनियों को फायदा
UPI की जो व्यवस्था है, उसमें दो सबसे बड़ी कंपनी अमेरिकी कंपनियां हैं।
UPI पेमेंट पर अब 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का निर्णय लिया गया है। इसे मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) नाम दिया गया है। क्या यह वाकई कोई डिस्काउंट है? डिस्काउंट का मतलब तो राहत होता है, लेकिन यह कोई राहत नहीं है। वास्तव में यह एक फीस या शुल्क है। और फिर भी इसे डिस्काउंट कहा जा रहा है, यही एक बड़ी धोखाधड़ी है। 15 अक्टूबर से यह शुल्क वसूलना शुरू होगा, ऐसा फिलहाल तय हुआ है।
भारत में UPI से रोजाना लगभग 87 लाख करोड़ रुपये के सौदे होते हैं। यानी एक साल में लगभग 318 लाख करोड़ रुपये के सौदे होते हैं। और देश में UPI का इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग 55 करोड़ है। सरकार का दावा है कि जितने सौदे होते हैं,उनमें 2000 रुपये से कम रकम के पेमेंट वाले सौदे 95 प्रतिशत के करीब हैं।
यानी साल में लगभग 17 लाख करोड़ रुपये के सौदे 2000 रुपये से अधिक रकम के होते हैं। उन पर ही अब 0.4 प्रतिशत शुल्क वसूला जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि हर 100 रुपये पर 40 पैसे और हर 1000 रुपये के सौदे पर चार रुपये का शुल्क वसूला जाएगा।
सवाल यह है कि इस फीस से किसे फायदा होगा। यह फीस हर साल लगभग 2000 करोड़ रुपये होने की उम्मीद है।
दिलचस्प बात यह है कि,
UPI की जो व्यवस्था है, उसमें दो सबसे बड़ी कंपनियां विदेशी कंपनियां हैं। एक है Gpay जिसका कुल सौदों में हिस्सा 33 प्रतिशत के आसपास है और दूसरी है PhonePe जिसका बाजार हिस्सा 46 प्रतिशत के करीब है। GPay की मालिक कंपनी गूगल है और PhonePe की मालिक कंपनी वॉलमार्ट है।

दोनों अमेरिकी कंपनियां हैं और उनका कुल हिस्सा 79 प्रतिशत के करीब है। यानी जो फीस भारत के ग्राहकों द्वारा चुकाई जाएगी, उसमें बड़ा हिस्सा इन कंपनियों को भी मिलेगा।
सरकारी बयान कहता है कि जो फीस चुकाई जाएगी, वह बैंकों, ऐप और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों के बीच बांटी जाएगी। ये पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां यानी क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड और डिजिटल वॉलेट जैसी सेवाएं देने वाली कंपनियां।
सवाल यह है कि इसके परिणामस्वरूप व्यापारी, मॉल या अन्य सेवाएं देने वाली कंपनियां ग्राहकों से ही इसकी वसूली करेंगी और इसलिए वस्तुओं तथा सेवाओं के दाम बढ़ेंगे।
पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया नाम के एक संगठन द्वारा यह शुल्क वसूल किए जाने की मांग की गई थी। इस संगठन में कंपनियां और बैंक शामिल हैं। उनकी दलील यह थी कि डिजिटल पेमेंट मुफ्त है, इसलिए उन्हें डिजिटल नेटवर्क संभालने में जो खर्च होता है, वह वसूल नहीं हो पाता। इसलिए RBI ने उनकी मांग स्वीकार कर ली है।
लेकिन RBI ने या सरकार ने उपभोक्ता संगठनों के साथ या विपक्ष के साथ इस के बारे में कोई विचार-विमर्श नहीं किया है और न ही उन के विचार इस के बारे में क्या है या जानना चाहा है। इस प्रकार यह पूरा फैसला एक तानाशाही फैसला है। एक ओर डिजिटल पेमेंट के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने की बातें होती हैं और दूसरी तरफ लोगों से इसके लिए शुल्क वसूलने की हलचल तेज हो गई है।
जब 2016 में नोटबंदी की गई थी, तब डिजिटल वित्तीय लेन-देन बढ़ें, इसके लिए वह की गई थी, ऐसा दावा भी किया गया था। फिर कोरोना काल में आत्मनिर्भर भारत का नारा दिया गया, लेकिन UPI पेमेंट सिस्टम में तो विदेशी कंपनियों का सबसे ज्यादा योगदान है और इसलिए इस शुल्क में भी वे ही सबसे ज्यादा रकम ले जाएंगी, यह तय है।

जिसने यह शुल्क लगाने का निर्णय लिया है, वह है National Payments Corporation of India (NPCI)। इस कंपनी की स्थापना रिजर्व बैंक द्वारा की गई है और इसके मालिक सरकारी, निजी तथा विदेशी बैंक हैं। इस NPCI द्वारा ग्राहक संगठनों के साथ कोई चर्चा नहीं की गई है। वित्त मंत्रालय ने भी इस मुद्दे पर ग्राहक संगठनों के साथ कोई चर्चा की हो, ऐसा संज्ञान में नहीं है। यह सरकार का टैक्स नहीं है और न ही सरकार का शुल्क है। यह तो कंपनियों का शुल्क या फीस है। लेकिन सच्चाई यह है कि सभी बैंकों का नियमन करने का काम तो RBI ही करती है, ऐसे में सरकार अपनी जिम्मेदारी से कैसे भाग सकती है।
NPCI ने यह बताया ही नहीं है कि इस फीस या शुल्क को वसूलने से कुल कितनी आय कंपनियों या बैंकों को होगी। इसका मतलब यह भी हुआ कि वह एक नियामक संस्था के रूप में पारदर्शी नहीं है और लोगों के प्रति जवाबदेह भी नहीं है।
इसलिए ऐसा लगता है कि बैंकों और ऐप रखने वाली विदेशी कंपनियों के फायदे के लिए ही यह फीस बिना किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के थोपी जा रही है। यह वित्तीय तानाशाही का मामला है।
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।