Economy

क्रेडिट कार्ड बिल और ईएमआई के बीच पिसती महानगरीय ज़िंदगी

Iqbal Ahmad Iqbal Ahmad | 1h ago · 5 min read
क्रेडिट कार्ड बिल और ईएमआई के बीच पिसती महानगरीय ज़िंदगी

एक लोन अभी पूरा चुकता भी नहीं हुआ कि दिमाग़ दूसरे की योजना बनाने लगता है।

ईएमआई पर पलती महानगरीय ज़िंदगी के फायदे और नुक़सान पर चलती बहस का शायद कोई अंत नहीं है। वजह भी साफ़ है। अब सिर्फ़ महानगर ही नहीं, छोटे शहर और क़स्बे भी उस बाज़ार का हिस्सा बन चुके हैं जहाँ ज़िंदगी ज़रूरत से कम और चाहत से ज़्यादा चलती है। सबको वह सब कुछ फटाफट चाहिए, जो विज्ञापनों में दिखाई देता है, और विज्ञापन में दिखाई देने वाले चेहरे ख़ुद एक ब्रांड बन चुके हैं।

आज की दुनिया में मोटे तौर पर दो तरह के जीवन-मॉडल दिखाई देते हैं।

एक मॉडल शाहरुख़ ख़ान वाला है। बड़ा घर लो, बड़ी गाड़ी लो, बड़ा सोचो, बड़ा हासिल करो। संदेश यह कि अगर आपकी ज़िंदगी आपकी मौजूदा औक़ात से बड़ी दिखाई नहीं दे रही तो आप पर्याप्त बड़ा नहीं सोच रहे। आराम-विराम बाद में, पहले दौड़ो। पैसा कमाओ। सफलता हासिल करो। वह सब खरीदो, जो स्क्रीन पर चमकते चेहरों के पास दिखाई देता है।
दूसरा मॉडल इरफ़ान ख़ान जैसे कलाकारों की उस सोच से जुड़ता है जिसमें जीवन का मतलब सिर्फ़ उपलब्धियों की सूची बढ़ाना नहीं है। अपने मन का काम करो। ऐसा काम करो जिसमें मन लगे। उतना कमाओ जितने में ज़िंदगी सुकून से गुज़र जाए। हर वक़्त अगले पायदान पर चढ़ने की बेचैनी में अपना आज मत जला दो। मशीन मत बनो।

पहला मॉडल ज़्यादा ग्लैमरस है, इसलिए ज़्यादा बिकता है। दूसरा मॉडल ज़्यादा मानवीय है, इसलिए ज़्यादा मुश्किल लगता है। उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा कमाल यही है कि उसने ज़रूरत और चाहत के बीच की सीमा लगभग मिटा दी है। अब घर सिर्फ़ रहने की जगह नहीं है, वह स्टेटस है। कार सिर्फ़ आने-जाने का साधन नहीं, पहचान है। फ़ोन सिर्फ़ बातचीत का उपकरण नहीं, सामाजिक हैसियत है। कुर्सी, मेज़, टीवी, फ्रिज, एसी, आरओ—हर चीज़ को जीवन की अनिवार्य ज़रूरत में बदल देने का हुनर बाज़ार ने सीख लिया है।

और अगर जेब इजाज़त नहीं देती तो कोई बात नहीं।

ईएमआई है न!

एकमुश्त पैसा नहीं है? अभी ले जाइए। थोड़ा-थोड़ा करके चुकाइए। आज की खुशी को भविष्य की कमाई के हवाले कर दीजिए। समस्या यहीं से शुरू होती है। ईएमआई ने महँगी चीज़ों को आम आदमी की पहुँच में ज़रूर ला दिया है, लेकिन इसके साथ एक ख़तरनाक आदत भी पैदा की है, भविष्य की आमदनी को आज ही खर्च कर देने की आदत।

एक लोन अभी पूरा चुकता भी नहीं हुआ कि दिमाग़ दूसरे की योजना बनाने लगता है। महँगा फ़ोन जो एक साल पहले सपना था, अब पुराना लगने लगता है। नया मॉडल बाज़ार में आ गया है। विज्ञापन कहता है, पुराना बदल दीजिए। बैंक कहता है, आसान किश्तों पर ले जाइए। ई-कॉमर्स कंपनी कहती है, अभी खरीदिए, बाद में भुगतान कीजिए। और भीतर से कोई लगातार कोंचता रहता है, ले ले… ले ले… दिवाली ऑफ़र भी तो आ रहा है!

यहाँ सवाल सिर्फ़ उपभोक्ता की कमज़ोरी का नहीं है। पूरा आर्थिक तंत्र हमारी इच्छाओं को लगातार बढ़ाने के लिए बना हुआ है। बाज़ार हमें सिर्फ़ सामान नहीं बेचता, वह यह भी बताता है कि हमें किस चीज़ की कमी महसूस करनी चाहिए।

कल तक जो चीज़ हमारे लिए पर्याप्त थी, आज वही बेकार लगने लगती है।

हमारे पास फ़ोन है, लेकिन नया फ़ोन चाहिए। घर है, लेकिन बड़ा घर चाहिए। कार है, लेकिन एसयूवी चाहिए। टीवी चल रहा है, लेकिन स्मार्ट टीवी चाहिए। कपड़े हैं, लेकिन नए ब्रांड चाहिए।

चॉइस अपनी-अपनी है, ऐसा लगता है। मगर सवाल यह है कि हमारी पसंद कितनी हमारी अपनी है?

बाज़ार पहले विकल्प पैदा करता है, फिर उनमें से चुनाव करने की आज़ादी देता है। हम चुन लेते हैं और फिर शिकायत भी करते हैं कि हमें किसी ने मजबूर नहीं किया था। वास्तव में मजबूरी बहुत बार दिखाई नहीं देती। वह विज्ञापन, सामाजिक तुलना, पड़ोसी की नई कार, रिश्तेदार के नए फ़ोन और सोशल मीडिया की चमक के रूप में हमारे भीतर धीरे-धीरे बैठती जाती है।

क्रेडिट कार्ड ने इस खेल को और आसान बना दिया है। एक कार्ड का बिल चुकाना मुश्किल है तो दूसरा कार्ड। दूसरे का भुगतान अटक गया तो तीसरा। कभी-कभी चार-पाँच कार्ड जेब में ऐसे घूमते हैं जैसे ताश के पत्ते हों। हर कार्ड कहता है, अभी खर्च करो, बाद में सोचेंगे। मगर ‘बाद में’ कभी आता ज़रूर है।

क्रेडिट कार्ड का बिल आता है। ईएमआई आती है। किराया आता है। बच्चों की फीस आती है। बिजली का बिल आता है। और फिर तनख़्वाह आती है, और आते ही उसका बड़ा हिस्सा पहले से बुक हो चुका होता है। सबसे मज़ेदार, और शायद सबसे त्रासद, स्थिति तब होती है जब तारीख़ें भी आदमी के ख़िलाफ़ हो जाती हैं।

ई-कॉमर्स कंपनी कहती है, आज खरीदिए, भुगतान महीने की पाँच तारीख़ को कीजिए।

आप सोचते हैं, बहुत बढ़िया!

फिर याद आता है कि तनख़्वाह तो छह तारीख़ को आती है।

अब पाँच और छह के बीच सिर्फ़ एक दिन का फ़ासला है। मगर उस एक दिन को पाटने के लिए शायद एक और क्रेडिट कार्ड चाहिए। यही वह जगह है जहाँ सुविधा धीरे-धीरे जाल बन जाती है।

इसका मतलब यह नहीं कि ईएमआई या क्रेडिट पूरी तरह बुरी चीज़ है। घर खरीदना, शिक्षा, कारोबार या ऐसी बड़ी ज़रूरतें जिन्हें एकमुश्त पूरा करना संभव नहीं, उनके लिए कर्ज़ उपयोगी वित्तीय साधन हो सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब कर्ज़ ज़रूरत पूरी करने के बजाय जीवनशैली बनाए रखने का साधन बन जाए। जब हम कमाई बढ़ाने से पहले ख़र्च बढ़ा लेते हैं, तो अंतर को कर्ज़ भरता है।

और कर्ज़ का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह आज हमें अमीर महसूस कराता है और कल हमारी आमदनी को गरीब बना देता है।

असल सवाल यह नहीं कि ईएमआई पर सामान खरीदना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम अपनी ज़िंदगी का इतना बड़ा हिस्सा आने वाले महीनों और वर्षों के नाम लिख चुके हैं कि आज हमारे पास बचा ही क्या है?

एक तरफ़ वह जीवन है जिसमें हर साल कुछ बड़ा हासिल करने की बेचैनी है। दूसरी तरफ़ वह जीवन है जिसमें आदमी पूछता है—मुझे वास्तव में कितना चाहिए? शायद आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी बहस यही होनी चाहिए ।क्योंकि सफलता का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि आपके पास क्या-क्या है। सफलता का एक दूसरा पैमाना यह भी है कि आपके पास कितना अपना समय, कितना अपना सुकून और कितनी अपनी आज़ादी बची हुई है।

बाज़ार आपको लगातार समझाएगा कि आपकी ज़िंदगी में कुछ न कुछ कम है। समझदार आदमी शायद पहली बार वहीं रुककर पूछेगा-

वास्तव में कमी मेरी ज़िंदगी में है, या बाज़ार की बिक्री में?
Iqbal Ahmad

Iqbal Ahmad

इक़बाल अहमद पेशे से फ्रीलांस लेखक हैं और यू ट्यूब पर पाँच साल से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। द क्रेडिबल हिस्ट्री पर इनका साप्ताहिक शो ‘द मुस्लिम एंगल’ दर्शकों में लोकप्रिय है।