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HDFC को नहीं मंजूर सुभाष चंद्रा का हेयरकट, लड़ेगा क़ानूनी लड़ाई

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 6 min read
HDFC को नहीं मंजूर सुभाष चंद्रा का हेयरकट, लड़ेगा क़ानूनी लड़ाई

HDFC बैंक अब सुभाष चंद्रा के लोन सेटलमेंट स्कीम पर फिर से NCLT में अपील करने की तैयारी में है।

HDFC बैंक ने ZEE TV और ESSEL समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा की लोन सेटलमेंट योजना को मंजूरी देने वाले राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के आदेश को चुनौती दी है। HDFC बैंक अब सुभाष चंद्रा के लोन सेटलमेंट स्कीम पर फिर से सुनवाई करने की अपील करेगा। बैंक प्रबंधन ने कहा कि इस लोन सेटलमेंट स्कीम में हेयरकट लेने की मंजूरी के कारण कर्जदाताओं को अपने स्वीकृत दावों की तुलना में बेहद मामूली रकम मिलने वाली है। यानी एक कहावत है न- ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन।

Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, NCLT के फैसले के ख‍िलाफ HDFC बैंक NCLT में ही अपील दायर करने की तैयारी में है। बैंक ने शुरू से ही वोटिंग प्रक्र‍िया और उनमें शामिल कंपन‍ियों का व‍िरोध क‍िया था। HDFC का 688.56 करोड़ रुपए का मामला है और उन्‍हें 19.83 लाख देकर क‍िनारे कर द‍िया गया।

बता दें कि इस लोन सेटलमेंट स्कीम में NCLT ने करीब 22,000 करोड़ रुपये की कुल गारंटी के बदले सुभाष चंद्रा के बस 6.25 करोड़ रुपये चुकाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। NCLT की इस स्कीम पर देशभर में आलोचना हो रही है। आखिर किसके दवाब में NCLT ने बैंकों का इतना नुकसान कराया। बता दें कि सुभाष चंद्रा 2016 में हरियाणा से भाजपा से राज्यसभा के सदस्य भी चुने गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खास लोगों में इनकी भी गिनती होती है।

HDFC बैंक ने बताया कि इस मामले में उसका स्वीकृत दावा कुल दावों का केवल 3.2 प्रतिशत है। यह कर्ज सुविधा तत्कालीन HDFC लिमिटेड ने दी थी, जो दोनों संस्थाओं के विलय के बाद बैंक को मिली।


बैंक ने गुरुवार को जारी बयान में कहा,

NCLT से जुड़े इस मामले में HDFC बैंक का स्वीकृत दावा कुल घोषित राशि का केवल 3.2 प्रतिशत था। यह सुविधा पहले HDFC लिमिटेड ने दी थी, जो बाद में बैंक को मिली। HDFC बैंक ने इस समझौते का विरोध किया था और लोन सेटलमेंट स्कीम के खिलाफ मतदान किया था। हालांकि, बहुमत से इसे मंजूरी मिल गई। बैंक अब NCLAT में अपील करने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है।”

NCLT के फैसले के बाद फिलहाल यह मामला दिवालिया प्रक्रिया में जाने से बच गया है। यह कार्यवाही ESSEL समूह से जुड़ी कंपनियों के कर्ज के लिए सुभाष चंद्रा द्वारा दी गई व्यक्तिगत गारंटियों से संबंधित है। किसी कॉरपोरेट कर्ज के लिए प्रमोटर के व्यक्तिगत गारंटर बनने की स्थिति में मूल कर्जदार के भुगतान में चूक करने पर बैंक कानूनी प्रक्रिया के तहत गारंटर से वसूली कर सकता है। इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की याचिका पर वर्ष 2024 में सुभाष चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू हुई थी। लेकिन कर्जदाताओं ने 99.97 प्रतिशत के इतने बड़े हेयरकट की मंजूरी पर भी सवाल उठाया है। इतना बड़ा हेयरकट कर्ज देने और फिर उसके रीपेमेंट की व्यवस्था की एक कड़वी सच्चाई सामने लाता है। भला इतना बड़ा कर्ज और रीपेमेंट लगभग शून्य। यह कैसे संभव हो सकता है।

बैंकिंग और फाइनेंस की भाषा में 'हेयरकट' (Haircut) का मतलब उस रकम से होता है, जिसे बैंक या कर्जदाता डूबत खाते में मानकर छोड़ने (माफ करने) को तैयार हो जाते हैं ताकि उन्हें कम से कम कुछ पैसा वापस मिल सके। इस मामले में 99.97% के हेयरकट का सीधा मतलब यह है कि जिन वित्तीय संस्थानों या कर्जदाताओं ने सुभाष चंद्रा/एस्सेल ग्रुप को पैसा दिया था, उन्हें अपने हर 100 रुपये के बदले सिर्फ 3 पैसे (0.03%) वापस मिले हैं और बाकी 99.97 रुपये पूरी तरह डूब गए हैं। मतलब Zee TV के मालिक सुभाष चंद्रा के मौज ही मौज और बैंकों को नुकसान ही नुकसान।

यह मामला केवल जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज तक सीमित नहीं है। इसका संबंध ESSEL समूह की कंपनियों से जुड़े कॉरपोरेट कर्जों पर दी गई गारंटियों के कारण उत्पन्न सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत देनदारी से भी है। ESSEL समूह से जुड़ी कंपनियों की कॉरपोरेट दिवालिया कार्यवाहियां और जी एंटरटेनमेंट तथा उसके अधिकारियों से संबंधित नियामकीय मामले इससे अलग हैं।

सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने गुरुवार को जारी बयान में 22,000 करोड़ रुपये के दावे पर सवाल उठाया। बयान में कहा गया, “व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में योजना का विरोध करने वाले कर्जदाताओं का सुभाष चंद्रा के खिलाफ कुल दावा केवल 3,992 करोड़ रुपये है, न कि 22,000 करोड़ रुपये।” बयान के अनुसार, इसमें से 620 करोड़ रुपये के दावे का निपटारा हो चुका है, जबकि कर्ज लेने वाली कंपनियों ने अतिरिक्त 1,063 करोड़ रुपये चुकाने की पेशकश की है। जिन कंपनियों के लिए सुभाष चंद्र ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी, वे अब तक 43,000 करोड़ रुपये चुका चुकी हैं। संबंधित कंपनियों ने बाकी बची किसी भी राशि का भुगतान करने का भरोसा भी दिया है।

सुभाष चंद्रा के कार्यालय ने बैंकों द्वारा आंकी गई उनकी संपत्ति पर भी सवाल उठाया। बयान में कहा गया,

“सुभाष चंद्रा ने 2016 में संसद में अपनी कुल संपत्ति 39.08 करोड़ रुपये घोषित की थी और यह जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध है। ऐसे में कोई बैंक वर्ष 2017 में उनकी कुल संपत्ति 45,888 करोड़ रुपये कैसे मान सकता है?” बयान के मुताबिक, वर्ष 2016 में 39.08 करोड़ रुपये रही उनकी व्यक्तिगत संपत्ति वर्ष 2024 में घटकर 31.79 करोड़ रुपये रह गई।

25 अगस्त का यह आदेश किसी सीधे और सर्वसम्मत निर्णय का परिणाम नहीं था। इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय पीठ ने पुनर्भुगतान योजना पर अलग-अलग राय दी थी। मतभेद दूर करने के लिए NCLT के न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा को तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने अंततः योजना को मंजूरी देने के पक्ष में फैसला सुनाया।

कर्जदाताओं ने बेहद कम वसूली का हवाला देते हुए योजना का कड़ा विरोध किया था। इसके बावजूद न्यायाधिकरण ने माना कि उनकी आपत्तियां योजना को खारिज करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं करतीं। न्यायाधिकरण ने उपलब्ध वित्तीय जानकारियों का अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि स्वीकृत पुनर्भुगतान योजना से दिवालिया प्रक्रिया की तुलना में बेहतर वसूली हो सकती है।

कर्जदाताओं की प्रमुख आपत्ति वसूली की अत्यंत कम राशि को लेकर थी। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या सुभाष चंद्रा की संपत्तियों और वित्तीय लेन-देन की पर्याप्त गहराई से जांच की गई। कुछ कर्जदाताओं ने फॉरेंसिक जांच कराने की आवश्यकता भी बताई थी।

NCLT ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि योजना की मंजूरी से पहले फॉरेंसिक जांच कराना अनिवार्य है। न्यायाधिकरण ने कर्जदाताओं के व्यावसायिक निर्णय के महत्व पर भी जोर दिया। उसका कहना था कि जब कर्जदाता दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत किसी योजना पर मतदान कर चुके हों, तो न्यायाधिकरण आमतौर पर उस व्यावसायिक निर्णय की जगह अपना आकलन लागू नहीं करता। इस पुनर्भुगतान योजना को लगभग 80.81 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी का समर्थन मिला था, जो मंजूरी के लिए आवश्यक सीमा से अधिक था। ऐसे में योजना का विरोध करने वाले कुछ कर्जदाता अकेले इस प्रक्रिया से बाहर निकलकर अलग समझौते की मांग नहीं कर सकते।

यह मामला प्रमोटरों को कर्ज देने की व्यवस्था की एक कड़वी सच्चाई सामने लाता है। किसी बैंक का दावा हजारों करोड़ रुपये का हो सकता है, लेकिन यदि कर्ज के पीछे पर्याप्त संपत्ति या प्रभावी तरीके से लागू की जा सकने वाली गारंटी उपलब्ध नहीं है, तो वास्तविक वसूली लगभग शून्य तक कैसे सिमट सकती है।

व्यक्तिगत गारंटी बैंक की स्थिति को मजबूत जरूर करती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गारंटी की पूरी राशि नकद रूप में उपलब्ध है। उसकी वास्तविक कीमत गारंटर की कानूनी रूप से उपलब्ध संपत्तियों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया के परिणाम पर निर्भर करती है।

इस लिहाज से यह मामला बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। कर्ज देते समय प्रमोटर की व्यक्तिगत गारंटी का होना ही पर्याप्त नहीं है; उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उस गारंटी की गुणवत्ता, वास्तविक संपत्ति और वसूली की व्यावहारिक क्षमता है।