एथेनॉल ने छीनी रसोई की मिठास, चीनी 64 रुपये किलो के पार
गाड़ियों को एथेनॉल मिश्रित इंधन से चलाने की जिद और होड़ ने सीधे रसोई पर असर डाला है।
जिन्हें डायबिटीज नहीं है वो भी अब फीकी चाय पीने लगे हैं। दरअसल चीनी की मिठास इन दिनों आसमान छू रही है। पिछले 17 दिनों में चीनी की कीमत 19 रुपये बढ़ गई है। 45 से सीधे 65 रुपये प्रति किलो हो गई है खुदरा बाजार में चीनी की कीमत। अगर कीमत बढ़ने की रफ्तार यही रही तो कुछ दिनों में चीनी की कीमत 100 रुपये प्रति किलो के आंकड़े को भी पार कर सकती है।
Chini Mandi की एक रिपोर्ट के अनुसार, 18 अगस्त को उत्तर प्रदेश में एम-ग्रेड चीनी का एक्स-फैक्ट्री भाव 5,400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। एक्स-फैक्ट्री कीमत के ऊपर 5 प्रतिशत जीएसटी भी लागू होता है। आने वाले दिनों में कीमतों में और तेजी जारी रहने की आशंका है, जिससे घरेलू चीनी की उपलब्धता और कीमतों को लेकर केंद्र सरकार की चिंता बढ़ सकती है।
उत्पादन कम रहने के बावजूद चीनी का निर्यात और गन्ने से बनने वाले फीड स्टॉक का एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल बढ़ने के कारण मौजूदा चीनी सीजन के अंत तक क्लोजिंग स्टॉक रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने की आशंका है। गाड़ियों को एथेनॉल मिश्रित इंधन से चलाने की जिद और होड़ ने सीधे रसोई पर असर डाला है।
आपूर्ति में बढ़ती कमी का असर घरेलू कीमतों पर पहले से दिखाई देने लगा है। इसको लेकर भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने सोमवार को प्रकाशित एक लेख में अपनी चिंता जताते कहा था कि गन्ने से बनने वाले फीड स्टॉक का एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल बढ़ने के कारण घरेलू बाजार में महंगाई की आशंका बढ़ते जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, उत्पादन में कमी, निर्यात और एथेनॉल उत्पादन के कारण सीजन के अंत में चीनी का स्टॉक रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने की संभावना है। त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने से कीमतें और बढ़ सकती हैं। केंद्र सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर तक भंडारण सीमा तय की है और मिलों का भौतिक सत्यापन कराया है, लेकिन इन उपायों से अभी तक कीमतें नहीं रुकीं।
महाराष्ट्र में चीनी की एक्स-फैक्ट्री कीमत करीब 5,300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। जीएसटी जोड़ने के बाद यह कीमत करीब 5,550 से 5,600 रुपये प्रति क्विंटल बैठ रही है। स्पॉट मार्केट में भी कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। दिल्ली में चीनी करीब 5,775 रुपये प्रति क्विंटल और मुजफ्फरनगर में करीब 5,754 रुपये प्रति क्विंटल पर बिक रही है। एक्स-फैक्ट्री कीमतें बढ़ने का असर थोक बाजार पर भी पड़ा है और दिल्ली में थोक चीनी का भाव करीब 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है।
थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर खुदरा बाजार पर भी पड़ने की संभावना है। कुछ बाजारों में चीनी पहले ही 60 से 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। त्योहारी सीजन के दौरान इसमें और बढ़ोतरी हुई तो खाद्य महंगाई को लेकर सरकार की चिंता बढ़ सकती है। हालांकि बाजार भाव और सरकार के आधिकारिक खुदरा मूल्य के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। दो महीने पहले थोक बाजार में चीनी की कीमत करीब 4,400 रुपये प्रति क्विंटल थी, जो अब बढ़कर लगभग 5,800 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। यानी सिर्फ दो महीनों में करीब 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हाल के वर्षों में इतनी तेज वृद्धि असामान्य है और यह बाजार में चीनी की उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंता को दर्शाती है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगर कीमतों में मौजूदा तेजी जारी रही तो घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार को आखिरकार चीनी आयात करने पर विचार करना पड़ सकता है। फिलहाल केंद्र सरकार चीनी के आयात पर 100 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंदन व्हाइट शुगर का भारत के लिए एफओबी के बराबर भाव करीब 523 डॉलर प्रति टन यानी लगभग 4,765 रुपये प्रति क्विंटल है। वहीं न्यूयॉर्क रॉ शुगर कॉन्ट्रैक्ट 16.87 सेंट पर कारोबार कर रहा है, जिसके हिसाब से भारत के लिए एफओबी के बराबर कीमत करीब 3,700 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों ने रूरल वॉयस को बताया कि कीमतों में अप्रत्याशित उछाल की एक बड़ी वजह उत्पादन सीजन की शुरुआत में लगाए गए अनुमानों और वास्तविक चीनी उत्पादन के बीच बड़ा अंतर है। यदि आपूर्ति को लेकर चिंता बनी रहती है तो कीमतों में तेजी आगे भी जारी रह सकती है।
त्योहारी सीजन शुरू हो चुका है और चीनी की कीमतों में फिलहाल राहत के संकेत नहीं हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती बढ़ सकती है। यदि घरेलू आपूर्ति सुधारने के लिए सरकार को शुल्क-मुक्त चीनी आयात की अनुमति देनी पड़ती है, तो इसका घरेलू चीनी उद्योग और गन्ना किसानों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए उद्योग की नजर अब केंद्र सरकार के अगले नीतिगत कदम पर है। घरेलू चीनी की कीमतों में हालिया तेजी के बीच केंद्र सरकार ने जमाखोरी और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर तक पूरे देश में चीनी पर स्टॉक लिमिट लागू की है। सरकार ने मिलों के पास मौजूद चीनी के स्टॉक का भौतिक सत्यापन करने का भी आदेश दिया था। हालांकि कीमतों को नियंत्रित करने के लिए अब तक उठाए गए कदमों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं।
भारत में चीनी की खपत आमतौर पर अगस्त के अंत से जनवरी के बीच सबसे ज्यादा रहती है। इस दौरान त्योहारी सीजन में पारंपरिक मिठाइयों, प्रोसेस्ड फूड और पेय पदार्थों की मांग बढ़ने से चीनी की खपत भी बढ़ जाती है।
देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की चीनी मिलें खाद्य मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श के बाद सामान्यतः नवंबर की शुरुआत में शुरू होने वाली पेराई को 10 से 15 दिन पहले शुरू करने की योजना बना रही हैं। इसका मकसद बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ाना है। सरकार ने हाल में व्यापारियों पर स्टॉक लिमिट भी लगाई है ताकि जमाखोरी रोकी जा सके और महंगाई के जोखिम को नियंत्रित किया जा सके।