सील किए गए सभी मदरसों के खुलेंगे ताले, धामी सरकार को उत्तराखंड HC से बड़ा झटका
उत्तराखंड में बीजेपी सरकार में पिछले 9 सालों में पंजीकृत 452 मदरसों में से 179 बंद हो चुके हैं।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में मक्तब और मदरसों से जुड़े कई मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए सील किए गए परिसरों को डी-सील करने यानी खोलने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित संस्थान मक्तब चला सकते हैं, लेकिन मदरसा चलाने या संस्थान के नाम में ‘मदरसा’ शब्द का इस्तेमाल करने के लिए उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड से पंजीकरण/मान्यता जरूरी होगी।
यह आदेश जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की अदालत ने मदरसा इनाम-उल-उलूम सोसायटी समेत कई याचिकाओं पर सुनाया। अदालत ने समान कानूनी और तथ्यात्मक सवालों के चलते सभी याचिकाओं का निपटारा एक साथ किया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जिन परिसरों में वे मक्तब चला रहे थे, उन्हें जिला स्तरीय अधिकारियों ने बिना पूर्व नोटिस और बिना उचित कारण बताए सील कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने तर्क दिया कि मक्तब में छात्रों को कुरान पढ़ने, व्याकरण और नैतिक शिक्षा जैसी धार्मिक शिक्षा देने का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है।
मामले में कोर्ट के सामने यह भी आया कि उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के अनुसार इस्लामिक शिक्षण संस्थानों की दो श्रेणियां हैं—मक्तब, जहां मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा दी जाती है, और मदरसा, जहां धार्मिक शिक्षा के साथ विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी भी कराई जाती है। 4 मार्च 2025 के एक पत्र के मुताबिक, उस समय उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड में 416 मदरसे पंजीकृत थे और करीब 88 संस्थानों ने पंजीकरण के लिए आवेदन किया था।
राज्य की ओर से अदालत में कहा गया कि केवल मदरसा बोर्ड से पंजीकृत और मान्यता प्राप्त संस्थान ही अपने नाम में ‘मदरसा’ शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं। राज्य का कहना था कि हाल के वर्षों में ऐसे संस्थानों की संख्या बढ़ी है जो बिना बोर्ड से मान्यता लिए खुद को मदरसा बताते हैं। राज्य ने यह भी दलील दी कि ऐसे संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों और उनके अभिभावकों को यह गलत धारणा हो सकती है कि वहां मिलने वाली शिक्षा आगे सरकारी या कॉरपोरेट क्षेत्र में रोजगार के अवसरों के लिए मान्य होगी। सरकार के अनुसार इसी वजह से अधिकारियों को हस्तक्षेप करना पड़ा।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 का उल्लेख किया। कानून के तहत ‘संस्था’ में मुस्लिम अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित और बोर्ड से मान्यता प्राप्त मदरसा या ओरिएंटल कॉलेज शामिल हैं। वहीं ‘मदरसा शिक्षा’ में अरबी, उर्दू, फारसी, इस्लामिक स्टडीज, तिब्ब, तर्कशास्त्र और दर्शन समेत बोर्ड द्वारा निर्धारित अन्य विषय शामिल हैं।
अदालत ने 2019 में अधिसूचित उत्तराखंड नॉन-गवर्नमेंटल अरेबिक एंड पर्शियन मदरसा रिकॉग्निशन रेगुलेशंस का भी उल्लेख किया। इन नियमों में मदरसे की मान्यता, पात्रता, भवन, बुनियादी ढांचे और निरीक्षण समेत मान्यता निलंबित या वापस लेने से जुड़े प्रावधान हैं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि वे संबंधित एसडीएम के सामने शपथपत्र देकर यह वचन देने को तैयार हैं कि जब तक उनके संस्थानों को मदरसा बोर्ड से पंजीकरण/मान्यता नहीं मिलती, तब तक वे न तो मदरसा चलाएंगे और न ही अपने संस्थान के नाम में ‘मदरसा’ शब्द का इस्तेमाल करेंगे।
इसी undertaking को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाओं का निपटारा किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा संचालित शैक्षणिक परिसरों/भवनों को डी-सील किया जाए। इसके लिए संबंधित एसडीएम के सामने शपथपत्र देना होगा कि मदरसा बोर्ड में संस्थान के पंजीकरण तक वे मदरसा नहीं चलाएंगे और संस्थान के नाम में ‘मदरसा’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि,
याचिकाकर्ताओं को संबंधित परिसरों में मक्तब चलाने की अनुमति होगी और मक्तब चलाने के उनके अधिकार में बिना किसी कानूनी अधिकार के हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि कोई याचिकाकर्ता अपने दिए गए वचन का पालन नहीं करता या संस्थान के नाम में अनधिकृत रूप से ‘मदरसा’ शब्द का इस्तेमाल करता पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारी उसके खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट के इस आदेश से पहले ये जानना जरूरी है कि किस तरह इस आदेश के बाद उत्तराखंड की बीजेपी सरकार को झटका लगा है। दरअसल उत्तराखंड में पिछले 9 सालों से भाजपा की सरकार है और इन नौ सालों में एक सुनियोजित योजना के तहत राज्य के 40 प्रतिशत मदरसों को बंद कर दिया गया। The Observer Post की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में पुराने सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करीब चार में से दो मदरसे अब संचालित नहीं हो रहे हैं।
राज्य सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार,
पंजीकृत 452 मदरसों में से 179 बंद हो चुके हैं। यह संख्या कुल पंजीकृत मदरसों का लगभग 39.60 प्रतिशत है। वहीं, नियमों के उल्लंघन के कारण 19 अन्य मदरसों को सील किया गया है।
ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता देने की व्यवस्था में बड़े बदलाव किए हैं। पुरानी व्यवस्था के तहत उत्तराखंड में कुल 452 मदरसे पंजीकृत थे। इनमें से 179 मदरसों के बंद होने के बाद राज्य में मदरसा शिक्षा और इससे जुड़े संस्थानों के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। इसके अतिरिक्त 19 मदरसों को निर्धारित नियमों और मानकों का पालन नहीं करने के कारण प्रशासन ने सील कर दिया है।