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चुनाव आयोग के IT विभाग की हेड सीमा खन्ना के कामकाज पर गैरकानूनी तरीके से हटाई गई थी निगरानी

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 4 min read
चुनाव आयोग के IT विभाग की हेड सीमा खन्ना के कामकाज पर गैरकानूनी तरीके से हटाई गई थी निगरानी

चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की चिट्ठियों में कहा गया कि निगरानी की इस व्यवस्था को हटाकर मनीष गर्ग ने प्रक्रिया को कमजोर किया।

चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को लिखी गई चिट्ठियों में आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) विभाग की निगरानी व्यवस्था हटाए जाने पर गंभीर सवाल उठाए गए थे। Hindustan Times (HT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के अनुचित आचरण से जुड़ी इन शिकायतों का केंद्र आयोग की महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना के कामकाज पर निगरानी की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था समाप्त करने का फैसला था।

चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने जुलाई में अलग-अलग चिट्ठियां लिखी थीं। दोनों पत्रों की भाषा एक जैसी है। इनमें आयोग के भीतर मतभेद का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं है, लेकिन स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महानिदेशक (IT) की फाइलें उप चुनाव आयुक्त के माध्यम से भेजने की व्यवस्था हटाने का गर्ग का फैसला नियमों का उल्लंघन था।


दोनों आयुक्तों ने बताया था कि,

सीमा खन्ना की फाइलें पहले उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार के पास जाती थीं। कुमार एक अनुभवी अधिकारी थे और पूरी चुनावी प्रक्रिया की समझ रखते थे। चिट्ठियों में कहा गया कि निगरानी की इस व्यवस्था को हटाकर गर्ग ने प्रक्रिया को कमजोर किया।

यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयोग ने पिछले सप्ताह स्पष्टीकरण जारी करके कहा था कि सोमनाथन को लिखी गई चिट्ठियां आयोग या उसके IT विभाग के किसी नीतिगत विषय से संबंधित नहीं थीं। आयोग के मुताबिक, ये पत्र केवल भारत निर्वाचन आयोग में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत एक अधिकारी के कामकाज से जुड़े थे।

आयोग ने यह भी कहा था कि,

गर्ग की ओर से जारी कार्य पुनर्वितरण का आदेश दोनों चुनाव आयुक्तों के निर्देशों के बाद वास्तव में लागू नहीं हुआ था। उसके अनुसार, IT विभाग पर उप चुनाव आयुक्त की निगरानी कभी हटाई ही नहीं गई।

हालांकि, संबंधित उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार अगस्त में अपने मूल कैडर लौट गए। वह केंद्रशासित प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं। अब उनकी जिम्मेदारियां गर्ग संभाल रहे हैं।

इसका अर्थ है कि सीमा खन्ना की फाइलें अब गर्ग के माध्यम से चुनाव आयुक्तों तक पहुंच रही हैं। नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बताया कि संजय कुमार दिल्ली सरकार में वापस जाना चाहते थे और इसलिए उन्होंने कार्यमुक्त किए जाने का अनुरोध किया था।

सीमा खन्ना और IT विभाग पहले से ही एक बड़े विवाद के केंद्र में हैं। Indian Express की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, खन्ना की ओर से लागू की गई और चुनाव आयोग द्वारा मंजूर नई IT व्यवस्था ने उन अधिकारियों की डेटाबेस तक पहुंच रोक दी, जो मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए जिम्मेदार हैं। इनमें निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) और उप ERO शामिल हैं।

इसी पृष्ठभूमि में IT विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां अहम हो जाती हैं। HT ने इस मामले में संधू, जोशी और गर्ग से प्रतिक्रिया मांगी, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। चुनाव आयोग ने भी सवालों का जवाब नहीं दिया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के शीर्ष नौकरशाह सोमनाथन इन चिट्ठियों पर कार्रवाई नहीं कर सके, क्योंकि दोनों आयुक्तों ने इन्हें व्यक्तिगत हैसियत से लिखा था। ये पत्र पूरे चुनाव आयोग की ओर से नहीं भेजे गए थे।

माना जा रहा है कि,

सोमनाथन ने हिमाचल प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी गर्ग से संबंधित शिकायतें कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेज दी थीं। सरकार का मानना है कि इन पत्रों का उद्देश्य कार्रवाई की मांग करने से अधिक उसे मामले से अवगत कराना था। सरकार की ओर से कोई कार्रवाई चुनाव आयोग की स्वायत्तता में हस्तक्षेप के समान मानी जा सकती थी।

इस मामले पर DoPT ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

गर्ग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए दोनों चुनाव आयुक्तों से मुलाकात की थी। बताया जाता है कि उन्होंने समझाया कि उनके फैसले का उद्देश्य अधिकारियों की वरिष्ठता से संबंधित समस्या का समाधान करना था, क्योंकि सीमा खन्ना, संजय कुमार से वरिष्ठ थीं।

चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार, सीमा खन्ना को इस वर्ष की शुरुआत में लेवल 14 से लेवल 15 में पदोन्नत किया गया था। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) में उनके पूर्व सहयोगियों का कहना है कि वह एक कुशल पेशेवर हैं और सरकार की अपनी ईमेल प्रणाली शुरू करने वाली टीम का हिस्सा रही हैं।

कुछ सरकारी अधिकारियों की राय है कि गर्ग का अनुचित आचरण दरअसल एक संरचनात्मक समस्या से जुड़ा है। चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तों और आयोग के कामकाज से संबंधित 1991 का कानून स्पष्ट करता है कि आयोग के फैसले बहुमत से लिए जाते हैं। बैठकों में या फाइलों के जरिए विचार-विमर्श के दौरान आयुक्तों के बीच असहमति होने पर प्रत्येक सदस्य की राय दर्ज की जाती है।

रोजमर्रा के मामलों के लिए आयुक्तों के बीच काम बांटा जा सकता है। लेकिन जिस विषय पर असहमति हो, या कोई आयुक्त उसे पूरे आयोग के सामने रखने का अनुरोध करे, उसे तीन सदस्यीय आयोग के पास बहुमत से निर्णय के लिए भेजना अनिवार्य है।