पंजाब में परगट सिंह को अध्यक्ष बनाने के मतलब
राजा वड़िंग का इस्तीफा और परगट सिंह की नियुक्ति पंजाब कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक प्रयोग के साथ-साथ संगठनात्मक पुनर्संतुलन भी है।
ताजा घटनाक्रम में कांग्रेस के एक और निर्णय ने पंजाब की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। राजा अमरिंदर सिंह वड़िंग के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे और उनके स्थान पर परगट सिंह की नियुक्ति के साथ कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पंजाब संगठन की कमान बदल दी है। कांग्रेस ने 2 अक्टूबर को परगट सिंह को तत्काल प्रभाव से पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया। सियासी तौर पर इस फैसले को पंजाब कांग्रेस के लिए नयी सकारात्मकता के रूप में देखा जाने लगा है।
यह बदलाव केवल प्रदेश अध्यक्ष बदलने का फैसला नहीं है। इसके पीछे पिछले कई महीनों से चल रहे संगठनात्मक मतभेद, नेतृत्व को लेकर खींचतान और कांग्रेस के भीतर विभिन्न राजनीतिक धाराओं के बीच संतुलन का सवाल भी जुड़ा हुआ है। सचिन पायलट द्वारा पंजाब का प्रभार संभालने के बाद राज्य के नेताओं और संगठन से मिले फीडबैक के आधार पर नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया आगे बढ़ी हैं। परगट सिंह को अध्यक्ष बनाकर हाईकमान ने यह संकेत दिया है कि वह प्रदेश संगठन की कमान सीधे किसी एक प्रमुख मुख्यमंत्री दावेदार को देने के बजाय अलग व्यक्ति के हाथ में रखना चाहता है।

कुछ समय से अनुमान लगाए जा रहे थे कि पंजाब में सचिन पायलट ने अपना प्रभार ग्रहण करने के बाद एक रिपोर्ट पंजाब के बारे बनाई है और वो हाईकमान को दी गई है। उसके आधार पर अनुमान लगाए जा रहे थे कि पंजाब में प्रदेश अध्यक्ष का बदलाव होगा। भूपेश बघेल पर राजा वड़िंग को सपोर्ट करने के आरोप लगाते रहे और चन्नी धड़ा राजा वडिंग के विपरीत चल रहा था। पंजाब में चुनाव में अब कुछ ही महीनो का समय बचा है। ऐसे में कांग्रेस का कोई नया प्रयोग जमीनी समीकरणों पर प्रभाव डाल सकता है।
वड़िंग का इस्तीफा—हार, त्याग या संगठनात्मक पुनर्संरचना?
राजा वड़िंग का इस्तीफा इस पूरे घटनाक्रम का पहला महत्वपूर्ण पहलू है। उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात के बाद औपचारिक रूप से अपना इस्तीफा सौंपा। वड़िंग ने पंजाब की राजनीतिक स्थिति, संगठन में अपने लगभग साढ़े चार वर्ष के अनुभव और सामने मौजूद चुनौतियों पर नेतृत्व के साथ चर्चा की। बाद में उन्होंने परगट सिंह को नए प्रदेश अध्यक्ष बनने पर शुभकामनाएं भी दीं।
यहां कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न है—क्या वड़िंग के जाने से गुटबाजी कम होगी या नेतृत्व परिवर्तन स्वयं गुटीय राजनीति का नया अध्याय बनेगा? क्योंकि जुलाई में ही कांग्रेस ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बनाए रखने का निर्णय लिया था। कुछ ही महीनों बाद उसी नेतृत्व को बदलने का फैसला बताता है कि जुलाई का संतुलन स्थायी समाधान नहीं बन सका। इस बदलाव का राजनीतिक अर्थ केवल व्यक्ति परिवर्तन से अधिक व्यापक है। क्योंकि परगट सिंह के बारे में यह माना जाता है के वो हमेशा किसी भी प्रकार की गुटबाजी से अलग ही रहे है।
परगट सिंह का चयन क्यों महत्वपूर्ण है?
परगट सिंह का चयन कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। वह जालंधर कैंट से विधायक हैं, पूर्व भारतीय हॉकी टीम के कप्तान रहे हैं और पंजाब सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। वह 2012 से जालंधर कैंट विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और 2017 तथा 2022 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते। इसलिए उनकी नियुक्ति को केवल 'वड़िंग की जगह कौन?' के सवाल से देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि कांग्रेस ने ऐसे नेता को क्यों चुना जो संगठन के भीतर किसी एक पुराने शक्ति-केंद्र के सीधे प्रतिनिधि के रूप में स्थापित नहीं हैं।

परगट सिंह की राजनीति हमेशा मुद्दा आधारित रही है, सब्से अच्छी बात प्रगट में यह है कि वो कभी किसी राजनीतिक स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा में नहीं रहे और कभी व्यक्तिगत तौर पर महत्वकांक्षी नहीं रहे। उनको उद्देश्यों हमेशा पंजाब की समस्याओं पर केंद्रित रहे. उनके बहुत से बयान सदन में भी इसके स्पष्ट प्रमाण है। परगट सिंह के बारेमें यह भी विदित ही कि उनकी राजनितिक समझ और परिपक्वता बहुत अच्छे स्तर की है और वह समाधान की ओर अग्रसर रहते है। पंजाब में कांग्रेस को अब बढ़त निश्चित ही मिलने के आसार बन गए हैं। परगट सिंह ने स्वयं कहा है कि वह टीम को साथ लेकर चलने और संगठन को मजबूत करने पर ध्यान देंगे। हॉकी कप्तानी के अपने अनुभव को उन्होंने टीमवर्क और नेतृत्व से जोड़ा है।

चन्नी खेमे की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण
इस बदलाव के बाद पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने परगट सिंह की नियुक्ति का स्वागत किया है। प्रताप सिंह बाजवा और स्वयं राजा वड़िंग ने भी उन्हें बधाई दी। यह तत्काल प्रतिक्रियाओं का एक महत्वपूर्ण संकेत है। कम से कम सार्वजनिक स्तर पर कांग्रेस के प्रमुख धड़े नए प्रदेश अध्यक्ष के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। लेकिन सार्वजनिक बधाई और वास्तविक संगठनात्मक सहयोग दो अलग-अलग चीजें हैं।
परगट सिंह के सामने असली परीक्षा अब शुरू होगी कि क्या वह वड़िंग, चन्नी, बाजवा, रंधावा और अन्य नेताओं के बीच मौजूद राजनीतिक दूरी को संगठनात्मक सहयोग में बदल पाते हैं?
प्रदेश अध्यक्ष बनते ही उनक पहला बयान ,मीडिया को मुखातिब हुए आया है-
आप तो जानते हो मैं एक खिलाड़ी हूं और सबको टीम में साथ ले के चलना है।
परगट सिंह की सहजता का अंदाज़ भी उनके लिए राजनीतिज्ञ के तौर पर पुरे प्रदेश में एक अलग पहचान देता है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या चेहरा बदला है या रणनीति भी?
यदि केवल प्रदेश अध्यक्ष बदला है और कांग्रेस की चुनावी रणनीति, संदेश, टिकट वितरण की प्रक्रिया, गुटीय संतुलन तथा जमीनी संगठन उसी पुराने ढर्रे पर चलते हैं, तो बदलाव का प्रभाव सीमित रह सकता है। लेकिन अगर परगट सिंह की नियुक्ति के साथ कांग्रेस बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करती है और वरिष्ठ नेताओं को एक साझा चुनावी ढांचे में लाती है तो यह दांव राजनितिक सफलता को आसान कर सकता है जिसकी संभावनाएं अब प्रबल हो गई हैं । यह नियुक्ति एक व्यापक संगठनात्मक पुनर्संरचना का हिस्सा माना जा सकता है।
राजा वड़िंग को हटाने के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अब 'कौन अध्यक्ष?' नहीं बल्कि 'किस दिशा में कांग्रेस?' है। पंजाब में कांग्रेस के सामने एक साथ कई राजनीतिक मुद्दे हैं जिनमें नशा, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी, कृषि, उद्योग, राज्य की वित्तीय स्थिति, युवाओं का भविष्य और केंद्र-पंजाब संबंध। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी सत्ता के अपने रिकॉर्ड के साथ मैदान में होगी, भारतीय जनता पार्टी नशे और कानून-व्यवस्था को प्रमुख मुद्दा बना रही है और शिरोमणि अकाली दलअपनी पारंपरिक पंथक एवं पंजाब-केंद्रित राजनीति को पुनर्गठित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए संगठनात्मक बदलाव तभी अर्थपूर्ण होगा जब वह व्यक्ति परिवर्तन को राजनीतिक संदेश में बदल सके।
गौरतलब है कि परगट सिंह को लगभग चुनावी तैयारी के अंतिम चरण में कमान मिली है। इसलिए उनके सामने समय बहुत सीमित है। उनकी पहली परीक्षा पांच मोर्चों पर होगी। पहला संगठन कि क्या जिला, ब्लॉक और बूथ स्तर पर कांग्रेस कितनी सक्रिय होती है। दूसरा एकजुटता का मुद्दा है कि क्या सभी प्रमुख नेता नए अध्यक्ष के पीछे वास्तविक रूप से खड़े होते हैं। तीसरा पाहि राजनितिक संदेश का है कि कांग्रेस केवल सरकार विरोधी राजनीति करेगी या पंजाब के लिए अपना स्पष्ट वैकल्पिक कार्यक्रम भी देगी। चौथा बिंदु नेतृत्व संतुलनसे जुड़ा है।
प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद परगट सिंह की भूमिका को मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से कैसे अलग रखा जाता है। पांचवां महत्वपूर्ण पक्ष उम्मीदवार चयन का है। पंजाब में टिकट वितरण के समय गुटीय समीकरण फिर से हावी होते हैं या संगठनात्मक तौर पर जीतने की क्षमता और स्थानीय स्वीकार्यता को प्राथमिकता मिलती है। ऐसी खबरें भी चर्चा में है कि पंजाब के 29 जिला अध्यक्षों में से लगभग 20 अध्यक्ष परगट सिंह के नेतृत्व के समर्थन में है।
राजा वड़िंग का इस्तीफा और परगट सिंह की नियुक्ति पंजाब कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक प्रयोग के साथ-साथ संगठनात्मक पुनर्संतुलन भी है। वड़िंग के जाने से कांग्रेस का एक अध्याय समाप्त हुआ है, लेकिन इससे कांग्रेस की पुरानी समस्याएं अपने आप समाप्त नहीं होतीं। दूसरी ओर परगट सिंह को मौका देकर कांग्रेस ने नेतृत्व परिवर्तन को केवल किसी एक गुट की मांग तक सीमित रखने के बजाय एक नए चेहरे के माध्यम से संगठन को पुनर्गठित करने का रास्ता चुना है। उनकी नियुक्ति का एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि हाईकमान ने किसी एक पुराने गुट को सीधी कमान देने के बजाय नया संतुलन बनाने की कोशिश की है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है—यदि किसी गुट को लगता है कि उसकी पसंद का व्यक्ति अध्यक्ष नहीं बना, तो अंदरूनी असंतोष समाप्त होने के बजाय नए रूप में सामने आ सकता है। कुछ रिपोर्टों में चन्नी खेमे से ऐसी असहमति की संभावना का उल्लेख किया गया है। लेकिन वर्तमान परिस्थियों में यह कारक गौण होने की और अग्रसर है कियुंकी प्रदेश के आम मतदाता में परगट सिंह के प्रति एक झुकाव के संकेत हमेशा से रहे हैं।
अब सवाल यह हो जाता है कि क्या परगट सिंह केवल कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष होंगे, या पंजाब कांग्रेस के विभिन्न राजनीतिक धड़ों को एक चुनावी टीम में बदलने वाले संगठनात्मक केंद्र बन कर अपेक्षित सफलता 2027 में हासिल कर पाएंगे। क्योंकि 2027 की लड़ाई में कांग्रेस के लिए असली चुनौती अध्यक्ष का नाम नहीं, बल्कि अध्यक्ष के पीछे खड़ी पूरी कांग्रेस की एकजुटता, संगठन और राजनीतिक दिशा होगी।
Jagdeep Singh Sindhu
वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विवेचक जगदीप सिंह सिंधू राष्ट्रीय हिंदी दैनिक हरिभूमि,पीपल्स समाचार,महाकौशल आदि में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं। वह एफ एम रेडियो तरंग 104 के पूर्व स्टेशन हेड तथा पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं।