भारत को अमेरिका के साथ संबंधों की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है: मुख्य आर्थिक सलाहकार
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि देश के पास छह से नौ महीने की जरूरत पूरी करने लायक तेल भंडार होना चाहिए।
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका के साथ अनिश्चित रिश्ते, वैश्विक ऊर्जा कीमतें और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में भारत की कमजोर मौजूदगी अर्थव्यवस्था के सामने निकट भविष्य की चुनौतियां हैं।
Ecomomic Times की रिपोर्ट के अनुसार, संभवत: यह पहली बार है जब किसी भारतीय सरकारी अधिकारी ने अमेरिका के साथ रिश्तों में आई खटास को सार्वजनिक रूप से आर्थिक चुनौती माना है।
नागेश्वरन की टिप्पणी वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के उस बयान के एक दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर काम लगभग पूरा हो चुका है। गोयल के मुताबिक, समझौता तब लागू होगा जब अमेरिका भारतीय निर्यातकों को अपने प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले उचित लाभ देगा।
CEA नागेश्वरन ने कहा कि,
अमेरिका के ग्राहम एक्ट, टैरिफ और अन्य व्यापारिक पाबंदियों को देशों पर प्रतिद्वंद्वी भू-राजनीतिक गुटों में से एक को चुनने के लिए डाले जा रहे ‘लगातार दबाव’ के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि भारत की अलग-अलग गुटों के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीति की भी ‘बड़ी कीमत’ चुकानी पड़ सकती है।
नई दिल्ली में 13वें PAFI वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए नागेश्वरन ने कहा कि दुनिया शायद ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रही है जहाँ दो या तीन प्रतिद्वंद्वी गुट होंगे, जिनमें दो प्रमुख गुट हो सकते हैं। उन्होंने कहा,
सम्मेलन से जो तस्वीर सामने आ रही है, उसे देखकर आप कह सकते हैं कि अमेरिका खुद किसी टकराव में शामिल नहीं है। लेकिन सच यह हो सकता है कि दुनिया में दो या तीन प्रतिद्वंद्वी गुट बन रहे हैं, जिनमें दो बड़े गुट होंगे।
नागेश्वरन ने आगे कहा,
चाहे ग्राहम एक्ट हो या व्यापारिक पाबंदियाँ, इन सभी कदमों को देशों पर किसी एक गुट को चुनने के लिए डाले जा रहे लगातार दबाव के रूप में देखा जाना चाहिए।
अमेरिका में कानून बन चुके ग्राहम एक्ट के तहत राष्ट्रपति को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया है जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं। हालाँकि, नागेश्वरन के मुताबिक भारत के लिए किसी एक पक्ष को चुनना विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि,
भारत के आकार और भौगोलिक स्थिति को देखते हुए वह किसी एक पक्ष को चुनने का जोखिम नहीं उठा सकता। इसलिए उसके लिए रास्ता संतुलन बनाए रखने का है।”
साथ ही उन्होंने चेताया कि इस रणनीति की अपनी कीमत होगी। नागेश्वरन ने कहा,
भारत की भौगोलिक स्थिति, उसका आकार और वैश्विक शक्तियों के बीच प्रभावशाली भूमिका निभाने की उसकी आकांक्षा का मतलब है कि संतुलन बनाए रखने की कीमत काफी अधिक होगी। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों को अपने फैसलों में इसे ध्यान में रखना होगा।
Money Control की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत और अमेरिका ने फरवरी में द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण की रूपरेखा को अंतिम रूप देने की घोषणा की थी। हालांकि, अमेरिकी शुल्क नीति में बदलाव के कारण बातचीत आगे बढ़ी है। रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने से जुड़े अमेरिकी कानून को भी इस समझौते के लिए नई चुनौती माना जा रहा है। इन देशों में भारत शामिल है।
गौरतलब है कि पीयूष गोयल 30 सितंबर से 1 अक्टूबर तक अमेरिका के मिल्वॉकी शहर में होने वाली जी20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में भाग लेंगे। इस दौरान उनकी अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर से द्विपक्षीय मुलाकात भी प्रस्तावित है, जिसमें व्यापार समझौते की प्रगति पर चर्चा होने की उम्मीद है।
CNBC की एक रिपोर्ट के अनुसार,CEA नागेश्वरन ने कहा कि,
वैश्विक स्तर पर महंगाई घटने का दौर खत्म हो गया है। आपूर्ति से जुड़े झटके विश्व अर्थव्यवस्था को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं और तेल की आपूर्ति में बाधा का खतरा वास्तविक है। उन्होंने कहा कि ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत करीब 105 डॉलर प्रति बैरल थी, जबकि महीने का औसत लगभग 114 डॉलर प्रति बैरल चल रहा था। चुनौती केवल तेल की कीमत नहीं, उसकी उपलब्धता की भी है।
उन्होंने कहा कि,
व्यापार और तकनीक का आपसी संबंध बढ़ रहा है। कई बार व्यापार का इस्तेमाल दबाव बनाने के औजार के रूप में भी किया गया है, जबकि देशों पर दो प्रतिस्पर्धी खेमों में से एक को चुनने का दबाव है।
इस स्थिति से निपटने के लिए नागेश्वरन ने भारत में पेट्रोलियम का रणनीतिक भंडार बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि,
आपूर्ति बाधित होने की आशंका को देखते हुए देश के पास छह से नौ महीने की जरूरत पूरी करने लायक भंडार होना चाहिए। उन्होंने जापान का उदाहरण दिया, जिसके पास उनके अनुसार पेट्रोलियम उत्पादों का दो साल का रणनीतिक भंडार है। साथ ही, उन्होंने कहा कि सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों को कीमतों के जोखिम से बचाव की लागत को अपनी योजना में शामिल करना होगा।
नागेश्वरन के मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्था बनने की राह में भारत के सामने असाधारण चुनौतियां हैं। निवेश आकर्षित करने के लिए करीब सात प्रतिशत की स्थिर वृद्धि दर, कम महंगाई, राजकोषीय अनुशासन, निवेशकों की सुरक्षा और कर नीतियों में निरंतरता जरूरी होगी।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर में ब्याज दरों से जुड़ी लागत बढ़ने का असर अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह पर पड़ सकता है।
अमेरिका के साथ अनिश्चित रिश्ते भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पूंजी जुटाना कठिन होगा। नागेश्वरन ने विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को अनिवार्य बताया, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि इसके लिए सरकारी और निजी क्षेत्र, दोनों को अपनी कार्यप्रणाली पर नए सिरे से विचार करना होगा।