भारत सरकार की विदेशी फंडिंग: 13 वर्षों में 9.85 लाख करोड़!
इसी साल भारत सरकार रु. 1.12 लाख करोड़ का विदेशी कर्ज लेने वाली है।
आजकल देश में चुनाव आयोग के सामने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए जो आंदोलन चल रहा है, उसमें विदेश से पैसे आते हैं ऐसा आरोप लगाया जाता रहा है। ऐसा आरोप बिना किसी सबूत के लगाया जाता है। इतना ही नहीं, अगर सच में उसमें विदेश से पैसे आ रहे हैं, तो उसे पकड़ने की जिम्मेदारी देश की सरकार की है।
मनी लॉन्ड्रिंग के संबंध में कानून है। उसका नाम है Prevention of Money Laundering Act, PMLA. यह कानून 2002 में बनाया गया था, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। लेकिन वे उसके बाद दो वर्षों तक सत्ता में रहे, फिर भी उन्होंने इसे लागू नहीं किया था। यानी उन्होंने तो मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के लिए सिर्फ दिखावा किया था।
2005 में कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने ही इसे लागू करना शुरू किया। अगर CJP के आंदोलन को सच में विदेशी पैसे मिल रहे हैं, तो सरकार द्वारा इसकी जांच होनी चाहिए और इसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन ऐसी कोई कार्रवाई करने के बजाय केवल आरोप लगाए जाते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर फैलाया जाता है।
सवाल यह है कि अगर विदेशी फंडिंग CJP या फिर उसके आंदोलन को मिल रही है, तो भारत सरकार की जो ED देश में विपक्षी नेताओं और समर्थकों को डराने के लिए रात-दिन काम करती है, वह अभी इस मामले में क्या कर रही है? ED वित्त मंत्रालय के तहत काम करती है। इसके अलावा वित्त मंत्रालय में Financial Intelligence Unit भी है जो मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ काम करती है। ये दोनों संस्थाएं CJP को मिलने वाले विदेशी पैसों का सुराग क्यों नहीं लगा पा रही हैं?
जब-जब भी देश में सरकारों के खिलाफ आंदोलन होते हैं, तब-तब उन आंदोलनों के लिए पैसे विदेशों से आते हैं, ऐसे आरोप लगाए जाते रहे हैं। आंदोलनों के लिए पैसे देकर अमेरिका या यूरोप के देश भारत को अस्थिर करना चाहते हैं, ऐसे आरोप भी हमेशा लगते रहे हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आम लोग बड़े पैमाने पर सरकार के खिलाफ विरोध व्यक्त करें या फिर आंदोलन करें, तो लोग विदेशी पैसों से ही ऐसा करते हैं, यह कहना लोगों की देशभक्ति का अपमान करने जैसा है।
देखिए, भारत में विदेश से पैसा आना कोई नई बात नहीं है। अभी हाल ही में सरकार ने कनाडा की फेयरफैक्स (Fairfax) नाम की कंपनी को IDBI बैंक के अपने शेयर बेच दिए हैं और IDBI बैंक, जो भारत सरकार के हाथ में थी, उसकी मालिक अब विदेशी कंपनी बन गई है।

फेयरफैक्स के पास अब IDBI बैंक के 60.72 प्रतिशत शेयर हो जाएंगे। इस प्रकार अब IDBI बैंक एक विदेशी बैंक बन गई है। सरकार ने अपने 30.48 प्रतिशत शेयर बेच दिए हैं और उसके करोड़ों रुपये सरकार को खुद मिलेंगे। सरकारी बीमा कंपनी LIC को मिलने वाली रकम अलग है। इस सौदे में 52,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि भारत सरकार और उसकी कंपनी LIC को मिलेगी, कि जो विदेशी पैसे हैं। क्या इसे विदेशी फंडिंग कहा जाएगा या नहीं?
हर साल भारत सरकार विदेशी कर्ज लेती है। क्या उसे विदेशी फंडिंग कहा जाएगा या नहीं? इसी साल भारत सरकार रु. 1.12 लाख करोड़ का विदेशी कर्ज लेने वाली है। 2014-15 में भारत सरकार ने 34 हजार करोड़ का विदेशी कर्ज लिया था। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत सरकार ने अपनी विदेशी फंडिंग में सवा तीन गुना बढ़ोतरी की है!
एक तरफ सरकार ने कोरोना काल में, 2020-21 में, 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा दिया, लेकिन इसके बाद भी भारत सरकार की अपनी विदेशी फंडिंग जारी ही रही है, इतना ही नहीं बल्कि वह बढ़ती ही गई है। जैसे कि, 2020-21 में भारत सरकार की विदेशी फंडिंग यानी विदेशी कर्ज 63 हजार करोड़ रुपये था, लेकिन वर्तमान वर्ष में वह बढ़कर 1.12 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान लगाया गया है।
इस प्रकार, 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा दिए जाने के बाद भारत सरकार का अपना विदेशी कर्ज लगभग दोगुना बढ़ गया! यानी भारत सरकार अधिक से अधिक विदेशी कर्ज पर निर्भर होती गई है। चालू वर्ष का बजट 53.47 लाख करोड़ का है और उसमें यदि रु. 1.12 लाख करोड़ का विदेशी कर्ज हो, तो वह कुल बजट का लगभग दो प्रतिशत हिस्सा बनता है। यह राशि बहुत बड़ी है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
भारत सरकार ने 2014-15 से अब तक अपने बजट में 9.85 लाख करोड़ का विदेशी कर्ज लिया है! क्या इसे विदेशी फंडिंग कहा जाएगा या नहीं?
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।
