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सुभाष चंद्रा के हेयरकट पर रोक, NCLT के कारण SBI को लगा एक लाख करोड़ का चूना

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 6 min read
सुभाष चंद्रा के हेयरकट पर रोक,  NCLT के कारण SBI को लगा एक लाख करोड़ का चूना

NCLT के हेयरकट के कारण देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को भारी भरकम नुकसान उठाना पड़ा है।

ZEE Group के फाउंडर सुभाष चंद्रा को 99.97 हेयरकट देने के मामले पर जब राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की चारों तरफ किरकिरी हुई, आलोचना हुई तो अब NCLT ने अपने आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। इसे कहते हैं सरकार का बैकफुट पर आना। मतलब NCLT ने माना कि ये हेयरकट जरूरत से ज्यादा थी और गैरकानूनी भी, इससे बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता।

NCLT की नवगठित पांच सदस्यीय पीठ ने मंगलवार को ज़ी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा की 22,006 करोड़ रुपये से अधिक के स्वीकृत कर्ज दावों के बदले 6.25 करोड़ रुपये चुकाने की योजना को मंजूरी देने वाले आदेश पर रोक लगा दी।

पीठ ने मामले की नए सिरे से सुनवाई होने तक सुभाष चंद्रा को अपनी संपत्तियां बेचने या हस्तांतरित करने से भी रोक दिया है।
यह आदेश न्यायाधिकरण द्वारा रीपेमेंट प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के महज एक सप्ताह बाद आया है। कुल दावों की तुलना में रीपेमेंट की बेहद कम राशि को लेकर HDFC , Union Bank , LIC Housing Finance ने कड़ी आलोचना की थी और हेयरकट देने के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था।

NCLT के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुभाष चंद्रा सहित सभी पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। पीठ ने स्पष्ट किया कि योजना को मंजूरी देने वाले 25 अगस्त के आदेश को फिलहाल लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि सदस्यों के बीच कोई बहुमत वाली राय नहीं बन पाई थी।

लेकिन NCLT के कारनामे बस सुभाष चंद्रा तक ही सीमित नहीं है। NCLT के हेयरकट के कारण देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को भी भारी भरकम नुकसान उठाना पड़ा है। लगभग एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान। SBI ने पिछले नौ सालों के दौरान NCLT के कहने पर देश के कई उद्योगपतियों, कारोबारियों को एक लाख करोड़ का हेयरकट दिया है, जबकि इन कारोबारियों पर SBI का 1,49,895 करोड़ रुपये का लोन बकाया था। इसके बदले में SBI को वसूली और रीपेमेंट में सिर्फ 49,727 करोड़ रुपये ही मिला। यानी कुल 1 लाख करोड़ का नुकसान।

MONEYLIFE की एक रिपोर्ट के अनुसार, RTI जवाब के मुताबिक, SBI ने नौ वर्षों के दौरान NCLT और इसी तरह के अन्य मंचों के जरिए निपटाए गए कर्जों में अपने दावे से करीब 1 लाख करोड़ रुपये कम की वसूली की।


पुणे के RTI कार्यकर्ता विवेक वेलणकर की ओर से दाखिल आवेदन के जरिए मिले आंकड़ों के अनुसार,

SBI वित्त वर्ष 2017-18 से 2025-26 के बीच 309 कर्ज खातों को NCLT या ऐसे ही अन्य समाधान मंचों पर ले गया था। इन मामलों में बैंक का कुल दावा 1,49,895 करोड़ रुपये था, जबकि समाधान योजनाओं के जरिए वह केवल 49,727 करोड़ रुपये ही वसूल कर सका। इसका अर्थ है कि SBI को 1,00,168 करोड़ रुपये यानी कुल दावे पर करीब 67 प्रतिशत का ‘हेयरकट’ देना पड़ा। हांलाकि SBI ने उन कर्जदारों के नाम नहीं बताए हैं जिन्हे हेयरकट दिया गया है।

यह जवाब SBI के स्ट्रेस्ड एसेट्स रिजॉल्यूशन ग्रुप के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) एवं उपमहाप्रबंधक (DGM) सिबासिस बिस्वास ने जारी किया है। पुणे के RTI कार्यकर्ता और सजग नागरिक मंच के अध्यक्ष विवेक वेलणकर के मूल आवेदन को अपील के बाद आगे भेजा गया था, जिसके बाद यह जानकारी सामने आई।

विवेक वेलणकर ने विशेष रूप से उन कर्जदारों के नाम मांगे थे, जिनका 100 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया वित्त वर्ष 2016-17 से हर साल बट्टे खाते में डाला गया। उन्होंने प्रत्येक खाते में राइट-ऑफ की गई रकम की जानकारी भी मांगी थी। SBI ने यह जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि यह बैंक के पास प्रत्ययी हैसियत और व्यावसायिक गोपनीयता के तहत रखी गई तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी है। इसलिए इसे RTI अधिनियम की धारा 8(1)(d), 8(1)(e) और 8(1)(j) के तहत सार्वजनिक करने से छूट प्राप्त है।

वेलणकर ने उन कर्जदारों के नाम भी मांगे थे, जिनके कर्ज का निपटारा NCLT या इसी प्रकार के मंचों के माध्यम से हेयरकट स्वीकार करके किया गया। साथ ही उन्होंने प्रत्येक कर्ज की राशि और स्वीकार किए गए हेयरकट का विवरण मांगा था। बैंक ने इस जानकारी को देने से भी उन्हीं आधारों पर इनकार कर दिया।

सालाना आंकड़े बताते हैं कि कुछ मामलों में यह नुकसान कितना गंभीर था।

वित्त वर्ष 2018-19 में NCLT के 34 खातों में SBI का दावा 48,425 करोड़ रुपये था, लेकिन समाधान योजनाओं के तहत उसे केवल 26,402 करोड़ रुपये मिले। इस तरह सिर्फ एक साल में बैंक को 22,023 करोड़ रुपये का हेयरकट लेना पड़ा।
वित्त वर्ष 2021-22 में 40 खातों पर SBI का दावा 22,408 करोड़ रुपये था, लेकिन वह केवल 5,337 करोड़ रुपये ही वसूल कर सका। बैंक को 17,071 करोड़ रुपये का हेयरकट स्वीकार करना पड़ा, यानी उस वर्ष की दावा राशि का 76 प्रतिशत से अधिक हिस्सा डूब गया।
रिकॉर्ड में उपलब्ध सबसे हालिया वित्त वर्ष 2025-26 में भी SBI ने 30 खातों में 4,928 करोड़ रुपये के दावों का निपटारा केवल 1,348 करोड़ रुपये में किया। इस तरह बैंक ने 3,580 करोड़ रुपये का हेयरकट लिया, जो करीब 73 प्रतिशत का नुकसान है।

अलग से SBI के जवाब में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2016-17 से 2025-26 तक दस वर्षों के दौरान बैंक ने बड़े डिफॉल्टरों के 1,51,857 करोड़ रुपये के लोन बट्टे खाते में डाले। बड़े डिफॉल्टरों से आशय ऐसे कर्जदारों से है, जिन पर प्रत्येक के हिसाब से 100 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया था। इस भारी-भरकम राशि में से अब तक केवल 20,838 करोड़ रुपये यानी लगभग 14 प्रतिशत ही वसूल किए जा सके हैं।

सालाना आंकड़े भी काफी कुछ बताते हैं। वित्त वर्ष 2019-20 में SBI ने बड़े डिफॉल्टरों के 46,348 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले। दस वर्षों के आंकड़ों में यह सबसे बड़ा वार्षिक राइट-ऑफ था। इसमें से अब तक केवल 4,548 करोड़ रुपये यानी करीब 10 प्रतिशत की वसूली हुई है। वित्त वर्ष 2018-19 में 27,225 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले गए थे, जिनमें से सिर्फ 1,811 करोड़ रुपये की वसूली हो पाई।

तुलना के तौर पर SBI के जवाब में यह भी बताया गया कि दस वर्षों के दौरान छोटे कर्जदारों यानी एक करोड़ रुपये से कम का ऋण लेने वालों के 63,103 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले गए। इसमें से केवल 6,815 करोड़ रुपये यानी लगभग 11 प्रतिशत की वसूली हुई।

तकनीकी रूप से जब किसी कर्ज को बट्टे खाते में डाला जाता है तो उसे बैंक की बैलेंस शीट से संपत्ति के रूप में हटा दिया जाता है, क्योंकि बैंक को उसके भुगतान की उम्मीद नहीं रहती। विशेषज्ञ इस सिस्टम को उचित नहीं मानते, लेकिन बैंक कर प्रबंधन और अपनी बैलेंस शीट को साफ करने की प्रक्रिया के तहत नियमित रूप से ऐसा करते हैं। इसका फायदा आमतौर पर देश के कुछ सबसे बड़े उद्योगपति डिफॉल्टरों को मिलता है।

इसके विपरीत, जब किसी खराब कर्ज का मूल्य कम किया जाता है तो उसका कुछ हिस्सा संपत्ति के रूप में बना रहता है, क्योंकि बैंक को उसके वापस मिलने की उम्मीद होती है। हालांकि, SBI के आंकड़े बताते हैं कि अधिकतर मामलों में बट्टे खाते में डाली गई रकम की या तो कोई वसूली नहीं होती या फिर बेहद मामूली रकम ही वापस मिलती है।