जीडीपी की 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर का क्या है सच?
तीन महीने की वृद्धि दर बहुत बढ़ जाए तो उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए।
जीडीपी यानी अंग्रेजी में Gross Domestic Product, यानी देश की कुल आय, यानी पूरे देश के 145 करोड़ लोगों की कुल आय जिसे सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है। यह हर तीन महीने में मापी जाती है। अभी जो 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर आई है, वह 2026-27 के पहले तीन महीनों यानी अप्रैल, मई और जून महीने की है। इसका अर्थ यह है कि पिछले वर्ष यानी 2025 के इन्हीं तीन महीनों अप्रैल, मई और जून महीने में जो जीडीपी थी,उसकी तुलना में इस वर्ष इन तीन महीनों में वह 7.8 प्रतिशत तक बढ़ी है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि यह वृद्धि काफी अच्छी और बड़ी है। पिछले वर्ष जीडीपी इन्हीं तीन महीनों में 6.9 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी। इसलिए इसकी तुलना में भी यह वृद्धि दर बड़ी है। जीडीपी का बढ़ना आर्थिक विकास की एक महत्त्वपूर्ण निशानी है इसमें भी कोई दो राय नहीं है। इस लिए यह कहा जा सकता है कि देश का विकास तेजी से हो रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि पूरे वर्ष के दौरान जीडीपी पिछले वर्ष की तुलना में कितनी बढ़ती है। यानी इस वर्ष 2026-27 में तो अभी नौ महीने बाकी हैं। उस दौरान क्या 7.8 प्रतिशत की ही वृद्धि दर रहेगी? यह बड़ा सवाल है। यदि इससे कम होती है तो पूरे वर्ष का औसत घट जाएगा। इसलिए तीन महीने की वृद्धि दर बहुत बढ़ जाए तो उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए।
अब देखिए-
(1) रिजर्व बैंक ने इस 2026-27 के पूरे वर्ष की वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत ही अनुमानित की है। शायद रिजर्व बैंक अब अपना अनुमान सुधारे, ऐसा हो भी सकता है। लेकिन अभी तक इस ने इस के बारे में कुछ कहा ही नहीं है।
(2) स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का कहना है कि 7.3 प्रतिशत की दर से विकास होगा।
(3) जीडीपी की इस साल की वृद्धि का अनुमान विश्व बैंक ने 6.6 प्रतिशत, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने 6.4 प्रतिशत और एशियन विकास बेंक (ADB) ने 6.6 प्रतिशत का लगाया था।
अब क्या ये सारे अनुमान गलत साबित होंगे? कुछ कहा नहीं जा सकता।
और देखिए,7.8 प्रतिशत की दर की वृद्धि का आंकड़ा आने के बाद कुछ अर्थशास्त्री पूरे वर्ष की औसत वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत से 7.2 प्रतिशत होगी, ऐसा कह रहे हैं। इसका अर्थ तो यह हुआ ही कि आने वाले नौ महीनों के दौरान 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर तो नहीं ही होगी,ऐसा सभी अर्थशास्त्री कह रहे हैं। मतलब यह साफ है कि 7.8 दर की वृद्धि एक आकस्मिक घटना है।
अब महत्वपूर्ण बिंदु:-
(1) यह 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर स्थिर मूल्यों पर है। यानी वर्तमान में जो मूल्य प्रचलित हैं, उन मूल्यों पर नहीं है। बल्कि यह 2022-23 के मूल्यों पर मापी गई है। यदि वर्तमान मूल्यों पर इसे मापा जाए तो यह 10.3 प्रतिशत है। यानी केवल ढाई प्रतिशत की ही मुद्रास्फीति घटाई गई। क्या वास्तव में मुद्रास्फीति इतनी ही हुई है? नहीं। वास्तव में मुद्रा स्फीति दर 3.93 प्रतिशत रही है। इसका अर्थ यह होता है कि जीडीपी की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत नहीं है, यह 6.37 प्रतिशत ही है। जब स्थिर मूल्यों से जीडीपी मापी जाए तो इसे वास्तविक आय कहते हैं। यही विकास का सच्चा माप होता है। इसलिए अभी जो सरकारी आंकड़ा दिया गया इसमें कुछ गड़बड़ लगती है।
(2) जीडीपी को ज़रा अलग तरीके से भी देखते हैं। उदाहरण के लिए, मान लिया जाए कि देश में केवल दो ही लोग हैं। एक की आय एक वर्ष की 20,000 रुपये है और दूसरे की 10,000 रुपये है। यानी देश की जीडीपी हुई 30,000 रुपये। अब जिसकी आय 20,000 रुपये है, उसकी आय बढ़कर 25,000 रुपये हो जाती है और जिसकी आय 10,000 रुपये है, उसकी आय बढ़ती ही नहीं है, तब भी देश की जीडीपी तो 35,000 रुपये हो जाएगी। इसका अर्थ यह हुआ कि जीडीपी 16.66 प्रतिशत बढ़ी। लेकिन इसमें जिसकी आय कम है, उसकी आय नहीं बढ़ी है, बल्कि जिसकी आय अधिक है, उसी की आय सिर्फ बढ़ी है।
इसलिए देश की जो 7.8 प्रतिशत आय बढ़ी, उसमें किसकी आय कितनी बढ़ी — अमीर की बढ़ी या गरीब की बढ़ी - यह कुछ पता नहीं चलता। यह तो एक औसत है। यदि जितनी मुद्रास्फीति हुई उतनी आय गरीब की न बढ़े, तो देश की जीडीपी बढ़ने पर भी गरीब की स्थिति बिगड़ेगी, क्योंकि उस की वास्तविक आय कम हो जाएगी।
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।