गुजरात की ऐसी पार्टियों को मिला करोड़ों का चंदा जिनके न दफ्तर, न नेता, क्या है पूरा खेल?
इन राजनीतिक पार्टियों के आधिकारिक पतों की जांच की तो वे आवासीय फ्लैटों और व्यावसायिक परिसरों की दुकानों में मिले। इनमें से कई कार्यालय बंद पाए गए।
गुजरात की एक अलग पहचान पिछले 15-20 सालों से बन रही है। यहां के लोगों में पैसे बनाने की ललक है। जायज हो या नाजायज किसी भी तरीके से पैसा बनाना है। शेयर ट्रेडिंग में तो इस राज्य ने कीर्तिमान ही काम किया था। हर्षद मेहता को भला कौन नहीं जानता होगा। लेकिन इसी गुजरात से पैसे बनाने की एक नई धांधली या कहिए तो स्कीम सामने आई है। कागज पर कोई राजनीतिक पार्टी बनाओ, चंदा वसूलो और गायब हो जाओ। न कहीं दफ्तर, न कोई सांसद और विधायक।
बीबीसी हिंदी की एक पड़ताल आई है जिसमें ग्राउंड पर जाकर दिखाया गया है कि गुजरात में छह पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों को वित्त वर्ष 2022-23 में 1,500 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा मिला। यह रकम भाजपा को छोड़कर बाकी सभी राष्ट्रीय पार्टियों को मिले कुल चंदे से भी अधिक है। इन छह पार्टियों में सत्यवादी रक्षक पार्टी, आम जनमत पार्टी, गरीब कल्याण पार्टी, स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी, भारतीय नेशनल जनता दल और न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी शामिल हैं। पड़ताल में इन छह पार्टियों के पंजीकृत कार्यालयों पर किसी बड़ी गतिविधि के बहुत कम प्रमाण मिले।
बीबीसी की टीम ने इनके आधिकारिक पतों की जांच की तो वे आवासीय फ्लैटों और व्यावसायिक परिसरों की दुकानों में मिले। इनमें से कई कार्यालय बंद पाए गए। जबकि कागज पर इनमें से पांच पार्टियों के मुख्यालय अहमदाबाद और एक का आणंद में है।
बीबीसी की पड़ताल में सामने आया कि वित्त वर्ष 2022-23 में 138 करोड़ से 620 करोड़ रुपये तक का चंदा पाने के बावजूद इन छह पार्टियों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल मिलाकर केवल 15 उम्मीदवार उतारे थे।
बीबीसी ने 2023-24 में सबसे ज्यादा चंदा पाने वाली छह Registered Unrecognised Political Party (RUPP) की पड़ताल की। भारत में 2,800 से ज्यादा राजनीतिक पार्टियां हैं, लेकिन सिर्फ 73 को राष्ट्रीय या राज्य स्तर की मान्यता मिली हुई है। बाकी RUPP हैं।
आम जनमत पार्टी को सबसे अधिक 620 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जबकि इन छह पार्टियों में गरीब कल्याण पार्टी को सबसे कम 138 करोड़ रुपये मिले। सत्यवादी रक्षक पार्टी को 330 करोड़ और न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी को 200 करोड़ रुपये का चंदा मिला।
कानून के तहत पंजीकृत राजनीतिक पार्टियां चंदा स्वीकार कर सकती हैं। इस चंदे पर दान देने वालों और राजनीतिक पार्टियों—दोनों को कर में छूट मिलती है। इन चंदों को गैरकानूनी नहीं बताया गया है। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक आयकर विभाग ने कुछ चंदों की जांच की और कुछ दानदाताओं से रकम का एक हिस्सा कर के रूप में वसूल किया।
चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ने बीबीसी को बताया कि इसमें एक संभावित तरीका यह हो सकता है कि दानदाता राजनीतिक पार्टियों से चंदे का प्रमाण-पत्र लेकर आयकर में छूट का दावा करते हैं। इसके बाद राजनीतिक पार्टियां ‘सर्विस चार्ज’ के नाम पर कुछ रकम काटकर दान का बड़ा हिस्सा उन्हें वापस कर देती हैं।
सत्यवादी रक्षक पार्टी की अध्यक्ष स्वाति बेन पार्टी के पंजीकृत कार्यालय वाले आणंद के उसी आवासीय परिसर के एक अन्य फ्लैट में रहती हैं। उन्होंने बीबीसी को बताया कि पार्टी ने चंदे की रकम दान-पुण्य के कामों पर खर्च की, लेकिन इस खर्च का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा गया।
पड़ताल से यह स्पष्ट नहीं होता कि वित्त वर्ष 2022-23 के बाद इन पार्टियों को चंदा मिलना बंद हो गया या नहीं। यदि चंदा मिलना बंद हो गया है, तो केवल कागजों पर इन पार्टियों का अस्तित्व बने रहने से यह सवाल उठ सकता है कि क्या अगले चुनाव से पहले इन्हें फिर भारी मात्रा में चंदा मिल सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सत्यवादी रक्षक पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल एक उम्मीदवार उतारा था और चुनाव प्रचार पर आठ करोड़ रुपये खर्च करने का दावा किया। इससे एक वर्ष पहले पार्टी को 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। पार्टी ने दावा किया कि उसने इनमें से 316 करोड़ रुपये दान-पुण्य के कामों पर खर्च किए।
भारत निर्वाचन आयोग में लगभग 2,800 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैं, लेकिन इनमें केवल 73 पार्टियों को ही आयोग से मान्यता प्राप्त है। भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बसपा, माकपा और एनपीपी—इन छह दलों को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है, जबकि बाकी मान्यता प्राप्त दल राज्यस्तरीय पार्टियां हैं। सभी पंजीकृत पार्टियों के लिए अपने खातों का ऑडिट कराना और निर्वाचन आयोग के पास सालाना रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य है। इसमें 20 हजार रुपये से अधिक का चंदा देने वाले दानदाताओं की जानकारी भी शामिल होती है।
बीबीसी की यह पड़ताल दिखाती है कि सैकड़ों करोड़ का चंदा पाने वाली इन पार्टियों के आर्थिक लेन-देन और राजनीतिक गतिविधियों में कोई समानता नहीं है। उनकी गतिविधियों और परदे के पीछे से काम करने वाले लोगों के मामले में पारदर्शिता की कमी भी साफ़ नज़र आती है।
बड़ा सवाल यह है कि जब ये पार्टियां चुनाव नहीं लड़ रही है, कहीं कोई दफ्तर नहीं है तो इन्हें चंदा कौन दे रहा है। कहीं ये राजनीतिक पार्टियां ये पार्टियां टैक्स चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला लेनदेन और दूसरी वित्तीय अनियमितताओं के लिए एक तरह से मोर्चे के तौर किसी के लिए काम तो नहीं कर रही है।
बीबीसी से बातचीत के दौरान चार्टर्ड अकाउंटेंट महेश छाजेड़ ने आरोप लगाया कि,
कुछ लोग इस व्यवस्था का गलत इस्तेमाल करते हैं। उनके मुताबिक, टैक्सपेयर राजनीतिक पार्टी को चंदा देने की रसीद लेकर टैक्स छूट हासिल करता है और पार्टी अपना कमीशन काटकर बाकी रकम नकद वापस कर देती है। दिसंबर 2025 में इनकम टैक्स विभाग ने भी RUPP के जरिए फर्जी डोनेशन, फंड ट्रांसफर, हवाला और दूसरी वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा उठाया था।
ADR की शोधकर्ता शैली महाजन के मुताबिक, कुछ RUPP मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स चोरी के माध्यम के तौर पर काम कर सकती हैं। उनका सवाल है कि जो पार्टियां चुनावी तौर पर सक्रिय नहीं हैं, उन्हें इतनी बड़ी रकम क्यों मिल रही है और क्या वे शेल कंपनियों के लिए पैसे को वैध दिखाने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं।
स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी के अध्यक्ष सुरेंद्र तिवारी ने भी BBC को बताया कि उनकी पार्टी को 2023-24 में 219 करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन उन्हें उस पैसे के इस्तेमाल का अधिकार नहीं था। उन्होंने पार्टी के चार्टर्ड अकाउंटेंट पर पार्टी का कामकाज नियंत्रित करने का आरोप लगाया। एक टैक्स अधिकारी ने BBC को एक इंटरनल डोजियर दिखाया। डोजियर के अनुसार,
विभाग ने टैक्स छूट पाने के लिए RUPP को दिए गए 5,591 करोड़ रुपये के फर्जी डोनेशन की पहचान की है और इनमें से 2,749 करोड़ रुपये की वसूली की गई है। इसके अलावा पार्टियों से जुड़े 665 करोड़ रुपये के विदेशी लेन-देन की भी पहचान की गई।
BBC ने चुनाव आयोग से पूछा कि क्या उसे इन RUPP की वित्तीय अनियमितताओं के बारे में इनकम टैक्स विभाग से कोई जानकारी मिली है और क्या जांच में शामिल छह पार्टियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है। इस पर भी जवाब नहीं मिला।
पिछले साल चुनाव आयोग ने 800 से ज्यादा RUPP को अपनी सूची से हटा दिया था, क्योंकि उन्होंने पिछले छह वर्षों में कोई चुनाव नहीं लड़ा था। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि उनमें से किसी के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के कारण भी कार्रवाई हुई थी या नहीं।
2023 त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में कोई खास असर न छोड़ने वाली बंगाल की छोटी पार्टी Nationalist Citizens Party of India (NCPI) तब चर्चा में आ गई जब TMC के 20 बागी सांसदों ने उसके साथ विलय का ऐलान किया। NCPI को चुनाव आयोग ने 20 जनवरी 2023 को RUPP के रूप में पंजीकृत किया था, यानी त्रिपुरा विधानसभा चुनाव से कुछ ही सप्ताह पहले। पार्टी ने त्रिपुरा के जनजातीय इलाकों में वंचित समुदायों की आवाज बनने के उद्देश्य से चुनाव लड़ा। उसने 7 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की कोशिश की।
त्रिपुरा के कुछ पूर्व उम्मीदवारों ने NDTV को बताया कि चुनाव के बाद पार्टी के लोग वहां से चले गए और उनसे संपर्क टूट गया। एक उम्मीदवार ने कहा कि प्रचार लगभग नहीं हुआ था और पार्टी मुख्य रूप से उम्मीदवार खड़े करना चाहती थी। चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार NCPI को अब तक सिर्फ 1.13 लाख रुपये का कुल चंदा मिला था। पार्टी की कोषाध्यक्ष शेवली कुंडू उसी पते पर पंजीकृत दो अन्य संस्थाओं की निदेशक भी हैं। पार्टी अध्यक्ष उत्तिया कुंडू, शेवली कुंडू के पति हैं।
21 मई 2023 में Times of India ने रिपोर्ट किया कि गुजरात की कई RUPPs ने Income Tax अधिकारियों के सामने बताया कि वे लोगों को टैक्स बचाने में मदद करने के बदले कमीशन लेती थीं। इस तरीके में लोग राजनीतिक पार्टी को चंदा देते, उसके आधार पर Income Tax में छूट लेते और फिर कमीशन काटकर पैसा वापस किए जाने का आरोप था। Income Tax Department ने ऐसे 4,000 से ज्यादा दानदाताओं को नोटिस जारी किए थे।
28 मई 2023 की एक दूसरी Times of India जांच में सामने आया कि कुछ “handlers” RUPPs का इस्तेमाल टैक्स चोरी के लिए कर रहे थे। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ पार्टियों को भारी रकम चंदे के रूप में मिलती थी और फिर उस पैसे को अलग-अलग खातों तथा संस्थाओं के जरिए घुमाकर नकद वापस किया जाता था।
The Week ने फरवरी 2023 में RUPPs पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें गुजरात की Bhartiya National Janta Dal का उदाहरण दिया गया था, जिसे एक साल में अचानक 4.32 करोड़ का चंदा मिला और पार्टी ने लगभग पूरी रकम को “other charitable objects” के तहत खर्च दिखाया, लेकिन खर्च का विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया था।
सितंबर 2022 में Income Tax Department ने RUPPs और उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ देशभर में 110–120 जगहों पर छापेमारी की थी। कार्रवाई का आधार फर्जी डोनेशन, टैक्स चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग और संदिग्ध वित्तीय गतिविधियां थीं। जांच में ऐसी पार्टियों पर भी ध्यान था जिनकी राजनीतिक गतिविधियां बहुत कम या लगभग नहीं थीं।