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चीन में नेपाल और तिब्बत बाढ़ के वीडियो पर ‘सेंसरशिप’ का पहरा: Report

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 7 min read
चीन में नेपाल और तिब्बत बाढ़ के वीडियो पर ‘सेंसरशिप’ का पहरा: Report

बीबीसी की चीन संवाददाता लॉरा बिकर की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन नेपाल और तिब्बत बाढ़ से जुड़े वीडियो को सेंसर कर रहा है।

नेपाल और तिब्बत में विनाशकारी बाढ़ के बाद सीमा के दोनों ओर राहत एवं बचाव अभियान जारी हैं। इस बीच, सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर विवाद लगातार तेज हो रहा है कि इस आपदा की रिपोर्टिंग किस तरह की जा रही है।

विवाद के केंद्र में बीबीसी की चीन संवाददाता लॉरा बिकर की एक रिपोर्ट है। इसमें दावा किया गया है कि,

चीन बाढ़ से जुड़े वीडियो को सेंसर कर रहा है।

बिकर के अनुसार, तिब्बत के राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में अस्थिरता पैदा होने की आशंका के कारण बीजिंग ने सीमा पर स्थित ग्यिरोंग पोर्ट को भूस्खलन और बाढ़ के तेज बहाव में घिरते दिखाने वाले वीडियो इंटरनेट से हटवा दिए। BBC की रिपोर्टर लॉरा बिकर ने लिखा है,

यह भयावह वीडियो ऐसा था, जिसे नजरअंदाज करना लगभग नामुमकिन था। नेपाल और तिब्बत के बीच स्थित प्रमुख सीमा चौकियों में से एक ग्यिरोंग पोर्ट पर पानी का प्रचंड सैलाब रास्ते में आने वाली हर चीज को बहाता चला गया। जान बचाने के लिए सैकड़ों लोग इधर-उधर भागते दिखाई दिए। सीसीटीवी कैमरों में कैद ये दृश्य तेजी से सोशल मीडिया पर फैले और दुनियाभर के टीवी चैनलों तक पहुंच गए। लेकिन चीन में तस्वीर बिल्कुल अलग रही। चीन के सरकारी प्रमुख समाचार बुलेटिन ने अब तक इस घटना की केवल एक स्थिर तस्वीर ही प्रसारित की है।

चीन के कड़े नियंत्रण वाले इंटरनेट पर भी बाढ़ का पूरा वीडियो खोजना मुश्किल रहा, हालांकि इस आपदा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर ऑनलाइन चर्चा जरूर हुई है।

इससे भी ज्यादा मुश्किल उन जीवित बचे लोगों के प्रत्यक्ष अनुभव तलाशना है, जो इस अचानक आई बाढ़ की भयावहता को बयान कर सकें। इस त्रासदी से नेपाल में 1,200 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 4000 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।

बीजिंग ने सैकड़ों आपातकालीन कर्मचारियों को शामिल करते हुए व्यापक बचाव अभियान शुरू किया है, जो अब भी जारी है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राहत और बचाव कार्यों में समन्वय के लिए अधिकारियों के साथ एक आपात बैठक की अध्यक्षता भी की। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दुनिया के अधिकांश हिस्सों में ऑनलाइन दिखाई गई सामग्री की तुलना चीन के इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी से की जाए, तो यह बिल्कुल ही न के बराबर है। सरकारी नियंत्रण वाले मीडिया ने तिब्बत की बाढ़ की कवरेज में मुख्य रूप से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के राहत एवं बचाव अभियानों, संकट के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व और आपदाग्रस्त क्षेत्र में प्रधानमंत्री ली छ्यांग के दौरे पर जोर दिया है।



तिब्बत, जिस पर बीजिंग ने 1950 के दशक में नियंत्रण स्थापित किया था, लंबे समय से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन का विरोध करता रहा है। चीन ने वर्षों के दौरान वहां हुए विरोध-प्रदर्शनों को दबाया है—कई बार हिंसक तरीके से। बौद्ध बहुल इस क्षेत्र में चीन पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगते रहे हैं।

हालांकि, कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने बीबीसी की रिपोर्ट में इस्तेमाल की गई फुटेज के स्क्रीनशॉट साझा करते हुए कहा कि इन दृश्यों को वास्तव में चीनी मीडिया में भी दिखाया गया था।



एक चीनी पत्रकार ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,


बीबीसी को इतने खुले तौर पर अफवाह फैलाते कभी नहीं देखा। चीन में सेंसरशिप को लेकर होने वाली ऐसी तीखी बहसों में अक्सर “संतुलित नजरिया कहीं खो जाता है।”

चीनी सरकार लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि तिब्बत पर पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टिंग “पक्षपातपूर्ण” होती है। इस सप्ताह सोशल मीडिया पर उसके समर्थक इसी दावे को और मजबूती से आगे बढ़ाते नजर आए और उन्होंने खास तौर पर बीबीसी को निशाना बनाया। लेकिन यह भी सच है कि चीन के भीतर और बाहर रहने वाले चीनी सोशल मीडिया उपयोगकर्ता लंबे समय से अधिकारियों द्वारा सूचनाओं को नियंत्रित किए जाने का सामना करते रहे हैं। बाढ़ के बाद भी ऐसी स्थिति देखने को मिली है।

जैसा कि बिकर ने अपनी रिपोर्ट में बताया,

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण ग्यिरोंग पोर्ट को मिट्टी और पानी की विशाल लहर में समाते दिखाने वाले वीडियो का हटाया जाना है। यह फुटेज शुरुआत में वीशिन और रेडनोट जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुई थी, लेकिन बाद में उपयोगकर्ता इसे देख नहीं सके।

सूचना पर नियंत्रण का एक अन्य तरीका स्वतंत्र और विदेशी पत्रकारों की पहुंच सीमित करना है। ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन की पत्रकार एलिसन हॉर्न के अनुसार,

उन्होंने तिब्बत जाने की अनुमति के लिए कई बार आवेदन किया, लेकिन हर बार उनका अनुरोध ठुकरा दिया गया। कई अन्य विदेशी पत्रकारों को भी वहां जाने से रोका गया है। इसके कारण विदेशी मीडिया के लिए घटनाओं को लेकर चीनी सरकार के आधिकारिक विवरण की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना बेहद कठिन, बल्कि लगभग असंभव हो गया है।

स्वतंत्र पत्रकारिता की अनुपस्थिति और सोशल मीडिया से वीडियो हटाए जाने के कारण चीन के सरकारी मीडिया को आपदा से जुड़ी पूरी कहानी पर अपना प्रभाव स्थापित करने का अवसर मिल गया है। यह चीनी मीडिया के उस पुराने रुझान को भी दर्शाता है, जिसमें ऐसी सामग्री से परहेज किया जाता है जो सामाजिक अस्थिरता या जनता के बीच भय का कारण बन सकती है।

The Guardian के मुताबिक, इस आपदा ने स्थानीय ग्रामीणों, उनके घरों और समुदायों को किस तरह प्रभावित किया, इस बारे में बहुत कम जानकारी सामने आई है। दूसरी ओर, सीमा के नेपाली हिस्से में विदेशी पत्रकार बिना किसी रोक-टोक के बाढ़ पीड़ितों और जीवित बचे लोगों से बातचीत कर सके हैं।

आलोचकों का यह भी आरोप है कि चीनी सरकार मृतकों की वास्तविक संख्या छिपा रही है। हालांकि, इस दावे की सबसे बड़ी समस्या यह है कि आपदा स्थल तक पहुंच पर लगी पाबंदियों के कारण कोई भी बाहरी व्यक्ति—चाहे वह चीन का आलोचक हो या नहीं—मृतकों की संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सका है। चीन में मीडिया का माहौल हमेशा इतना नियंत्रित नहीं था जितना आज दिखाई देता है।

12 मई 2008 को चीन के सिचुआन प्रांत में रिक्टर पैमाने पर 8.0 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया था। इस आपदा में 70 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई और लाखों लोग बेघर हो गए थे। भूकंप आने के लगभग तुरंत बाद चीनी सरकारी मीडिया ने इसका व्यापक सीधा प्रसारण शुरू कर दिया था। कई सप्ताह तक यह कवरेज जारी रही। चाइना सेंट्रल टेलीविजन नियमित रूप से मृतकों की संख्या की जानकारी देता रहा और बचाव अभियानों पर विस्तार से रिपोर्टिंग करता रहा।

विदेशी मीडिया ने तब सवाल उठाया था कि क्या घटिया तरीके से बनाए गए स्कूल भवनों के ढहने के कारण ऐसी मौतें हुईं जिन्हें रोका जा सकता था। विदेशी पत्रकारों ने यह भी पूछा कि क्या पीड़ित परिवारों को कभी न्याय मिल पाएगा। चीनी मीडिया ने भी इनमें से कुछ विवादों को जगह दी थी। स्कूलों के निर्माण में स्थानीय प्रशासन द्वारा गुणवत्ता संबंधी आवश्यक जांच किए जाने या नहीं किए जाने पर सवाल उठाए गए थे।

शुरुआती दौर में इस कवरेज को चीन में आपात स्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं की रिपोर्टिंग के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना गया। पश्चिमी मीडिया ने भी उस समय दिखाई गई “अभूतपूर्व पारदर्शिता” पर विशेष ध्यान दिया था। लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद सरकार ने स्कूल भवनों से जुड़ी सूचनाओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। अधिकारियों को डर था कि यह मुद्दा सरकार-विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दे सकता है।

आमतौर पर चीन के सरकारी मीडिया संस्थानों को संकट के समय “सकारात्मक रिपोर्टिंग” पर जोर देने के निर्देश दिए जाते हैं। वहीं, इंटरनेट पर सरकारी कार्रवाई की आलोचना या प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने वाली सामग्री को सेंसर द्वारा हटा दिया जाता है। 2011 में वेनझोउ शहर में हुए जानलेवा रेल हादसे की मीडिया कवरेज इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

शोध बताते हैं कि सिचुआन भूकंप के विपरीत, इस रेल दुर्घटना के मामले में सरकार ने मीडिया में प्रकाशित होने वाली सामग्री पर कड़ा नियंत्रण रखा था। अधिकारियों ने मीडिया संस्थानों को घटनास्थल पर पत्रकार न भेजने, रिपोर्टिंग की संख्या सीमित रखने और हादसे को हाई-स्पीड रेल परियोजना के विकास से न जोड़ने के आदेश दिए थे।

2012 में शी जिनपिंग के सत्ता में आने के बाद सरकार ने अपने शासन के लिए संभावित चुनौतियों को लेकर चिंता जताते हुए पारंपरिक मीडिया और सोशल मीडिया पर नियंत्रण और कड़ा कर दिया। नेपाल-तिब्बत की मौजूदा बाढ़ की मीडिया कवरेज भी अब इसी पुराने ढर्रे पर चलती दिखाई दे रही है—सीमित सूचनाएं और सकारात्मक खबरों पर अधिक जोर। यह आपदा ऐसे समय आई है जब चीन और पश्चिमी देशों के बीच अविश्वास लगातार बढ़ रहा है। इसी कारण दोनों पक्ष एक-दूसरे की रिपोर्टिंग को पक्षपातपूर्ण मान रहे हैं। आपदा स्थल और प्रत्यक्ष जानकारी देने वाले सूत्रों तक पहुंचने में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों ने समस्या को और गंभीर बना दिया है।