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मदद नहीं मुआवजा चाहिए, विनाशकारी बाढ़ के लिए अमेरिका-चीन और भारत जिम्मेदार: नेपाल

TCN Desk TCN Desk | 1h ago · 5 min read
मदद नहीं मुआवजा चाहिए, विनाशकारी बाढ़ के लिए अमेरिका-चीन और भारत जिम्मेदार: नेपाल

नेपाल का कहना है कि आपदा के बाद मिलने वाली सहायता को “दान” नहीं, बल्कि “नैतिक जिम्मेदारी” के रूप में देखा जाना चाहिए।

नेपाल ने हाल की विनाशकारी बाढ़ से हुई तबाही के लिए ग्रीनहाउस गैसों का सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों से जलवायु मुआवजा मांगने की कूटनीतिक पहल शुरू की है। नेपाल का कहना है कि आपदा के बाद मिलने वाली सहायता को “दान” नहीं, बल्कि “नैतिक जिम्मेदारी” के रूप में देखा जाना चाहिए।

विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि,

वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान “लगभग नगण्य” है, लेकिन इसके बावजूद उसे ग्लोबल वार्मिंग के असमान और गंभीर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। इनमें ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और पहाड़ी क्षेत्रों में आने वाली भीषण प्राकृतिक आपदाएं शामिल हैं। इसके लिए सीधे तौर पर भारत, अमेरिका और चीन जिम्मेदार है।

नेपाल के विदेश मंत्री ने चीन, अमेरिका. चीन और भारत को दुनिया के तीन सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों के रूप में चिह्नित करते हुए कहा कि नेपाल जैसे संवेदनशील देशों को मुआवजा देने की उनकी “ऐतिहासिक जिम्मेदारी” है।


Kantipur टीवी को दिए एक साक्षात्कार में खनाल ने कहा,

हम उस वैश्विक संकट की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं, जिसे हमने पैदा ही नहीं किया। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और पहाड़ों में आने वाली ये विनाशकारी सुनामी वैश्विक जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम हैं।”

इस साक्षात्कार का अंश मंगलवार को ‘The Kathmandu Post’ में प्रकाशित है।

खनाल ने कहा कि नेपाल अब अपनी कूटनीतिक नीति को “सहायता” से बदलकर “न्याय और मुआवजे” पर केंद्रित कर रहा है। उन्होंने कहा कि नेपाल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को “पूरी दृढ़ता और स्पष्टता” के साथ उठाएगा और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित कमजोर देशों को हुए नुकसान के लिए बड़े उत्सर्जक देशों से मुआवजे की मांग करेगा।

उन्होंने कहा, “यह सभ्यता के अस्तित्व का सवाल है। यदि हिमालय के ग्लेशियर खत्म हो गए तो गंगा और त्रिशूली जैसी नदियों पर निर्भर दक्षिण एशिया के दो अरब से अधिक लोगों की जल सुरक्षा स्थायी रूप से खतरे में पड़ जाएगी। हम केवल नेपाल के लिए नहीं, बल्कि पूरी दक्षिण एशियाई सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवाज उठा रहे हैं।”

खनाल ने बताया कि नेपाल के वित्त मंत्रालय ने अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को जलवायु मुआवजे का औपचारिक दावा-पत्र भेज दिया है। भारत जलवायु समानता पर लगातार जोर देता रहा है और अपने अपेक्षाकृत कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को रेखांकित करता रहा है। भारत का कहना है कि जलवायु संबंधी जिम्मेदारियां तय करते समय विभिन्न देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन, विकास संबंधी आवश्यकताओं और क्षमताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। भारत का यह भी मानना है कि पहले औद्योगिकीकरण करने वाले पश्चिमी देशों ने वैश्विक कार्बन बजट के बड़े हिस्से का उपयोग किया है।

नई दिल्ली ने जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर विकासशील देशों को होने वाली हानि और क्षति से निपटने के प्रयासों का समर्थन किया है। हालांकि भारत का कहना है कि ऐसे देशों को जलवायु प्रभावों से निपटने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन विकसित देशों द्वारा उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, नेपाल ने 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी घाटी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद तत्काल वित्तीय सहायता के लिए ‘फंड फॉर रिस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज’ के बोर्ड से औपचारिक संपर्क किया है। इस व्यवस्था की स्थापना 2022 में आयोजित COP27 सम्मेलन में की गई थी और इसे COP28 में सक्रिय किया गया।

वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और वन एवं कृषि मंत्री गीता चौधरी द्वारा संयुक्त रूप से हस्ताक्षरित पत्र में विनाशकारी बाढ़ पर तत्काल कार्रवाई की मांग की गई है। इस बाढ़ में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, हजारों लोग विस्थापित हुए तथा मकान और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे नष्ट हो गए।

पत्र में कहा गया, “आर्थिक और गैर-आर्थिक हानि एवं क्षति का पूरा आकलन अभी किया जाना बाकी है। हालांकि शुरुआती जानकारी से पता चलता है कि इसके परिणाम बेहद गंभीर हैं और नेपाल की तत्काल राहत एवं बचाव क्षमता से कहीं अधिक हैं।”

वन मंत्रालय के संयुक्त सचिव महेश्वर ढकाल ने कहा कि यह पहली बार है जब नेपाल ने इस व्यवस्था के तहत सहायता मांगी है। उन्होंने कहा कि बाढ़ से हुई तबाही का स्तर बहुत बड़ा है। इसके बाद आवश्यक खोज, बचाव, राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण कार्य नेपाल के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं।

ढकाल ने कहा,

चूंकि हम वास्तव में जलवायु परिवर्तन के गंभीर दुष्प्रभाव झेल रहे हैं, इसलिए हमने बोर्ड से संपर्क किया है।” उन्होंने कहा कि नेपाल दिसंबर में होने वाली बोर्ड की अगली निर्धारित बैठक तक इंतजार करने के बजाय तत्काल प्रतिक्रिया चाहता है।

पत्र में कहा गया है कि इस आपदा ने एक नाजुक सीमा-पार पर्वतीय नदी तंत्र को प्रभावित किया है। इस घटना ने दिखाया है कि हिममंडल में होने वाली चरम घटनाएं किस तरह ऊंचे पहाड़ों से तेजी से नीचे बहकर घनी आबादी वाले क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती हैं। पत्र में जल, खाद्य, ऊर्जा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव सुरक्षा पर पड़े प्रभावों को भी रेखांकित किया गया है।

पत्र के अनुसार,

नेपाल एक अल्पविकसित और जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील पर्वतीय देश है। वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उसका योगदान नगण्य है, लेकिन उसे लगातार बढ़ते और असमान जलवायु प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है। भोटेकोशी आपदा दिखाती है कि हिममंडल में होने वाली चरम घटनाएं किस तरह ऊंचे पहाड़ों से घनी आबादी वाले मैदानी क्षेत्रों तक तेजी से फैल सकती हैं। इससे विकास संबंधी उपलब्धियां प्रभावित होती हैं और जल, भोजन, ऊर्जा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, पारिस्थितिकी तंत्र तथा मानव सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।

पत्र में कहा गया, “इस आपदा की असाधारण गंभीरता और तात्कालिकता को देखते हुए नेपाल सरकार बोर्ड से सम्मानपूर्वक अनुरोध करती है कि वह अपने संचालन संबंधी नियमों के तहत तेजी से, सीधे और प्रभावी तरीके से सहायता प्रदान करने के लिए विशेष निर्णय ले।”

हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों और बर्फ के पिघलने, हिमनद झीलों के फटने के खतरे, भूस्खलन और लगातार तीव्र होती वर्षा ने नेपाल को जलवायु संबंधी आपदाओं के प्रति और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

सभी फोटो साभार : The Kathmandu Post