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क्यों नीम करौली बाबा के जीवन पर बनी फिल्म हो रही हिट, क्या है चमत्कार के पीछे का सच?

Iqbal Ahmad Iqbal Ahmad | 58m ago · 6 min read
क्यों नीम करौली बाबा के जीवन पर बनी फिल्म हो रही हिट, क्या है चमत्कार के पीछे का सच?

हनुमान अंश, फिल्म निर्माण की हर कसौटी पर कमज़ोर और लचर दिखाई देती है लेकिन आस्था की कसौटी पर सुपर हिट है।

अगस्त 2026 में रिलीज हुई छोटी बजट की फिल्म हनुमान अंश ने अप्रत्याशित रूप से बॉक्स ऑफिस पर कमाल दिखाया। नीम करौली बाबा के जीवन पर आधारित इस फिल्म ने बिना बड़े सितारे और बड़े प्रचार के शुरू में मुश्किल से दस लाख रुपये कमाए। फिर दर्शकों के मुंह-जुबानी प्रचार से चढ़ते-चढ़ते चालीस करोड़ रुपये पार कर गई। लोग भावुक हो रहे हैं,

नीम करौली बाबा के भक्त इसे चमत्कार बता रहे हैं। लेकिन फिल्म की सफलता के पीछे छिपी पुरानी कहानी को मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखने पर आस्था और चमत्कार की बुनाई कितनी शानदार हो सकती है ये पता चलता है। हालांकि चर्चित फिल्म हनुमान अंश, फिल्म निर्माण की हर कसौटी पर कमज़ोर और लचर दिखाई देती है लेकिन आस्था की कसौटी पर सुपर हिट है।

नीम करौली बाबा का मूल नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था। लगभग उन्नीस सौ में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में एक अमीर ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ। ग्यारह साल की उम्र में शादी कर दी गई। कुछ समय घर पर रहे, दो बेटे और एक बेटी हुई। फिर घर छोड़कर साधु बन गए। उत्तर भारत के गांव-गांव घूमते रहे।

कभी लक्ष्मण दास कहलाए, कभी हांडी वाले बाबा, कभी तिकोनिया वाले बाबा। एक दिन फर्रुखाबाद के पास नीब करौरी गांव में बिना टिकट ट्रेन में सवार थे। टिकट चेकर ने उतार दिया। भक्तों की कहानी है कि ट्रेन आगे नहीं चली। अधिकारियों ने माफी मांगी, उन्हें वापस बैठाया, तब गाड़ी चली। उसी घटना से वे नीम करौली बाबा कहलाए। बाद में कैंची धाम और वृंदावन में आश्रम बने। ग्यारह सितंबर उन्नीस सौ तिहत्तर को वृंदावन में डायबिटीज के कोमा में उनका निधन हो गया।
नीम करौली बाबा को वैश्विक नाम और प्रसिद्धि रिचर्ड अल्पर्ट के जरिए मिली। उन्नीस सौ साठ के दशक में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान प्रोफेसर रिचर्ड अल्पर्ट , टिमोथी लियरी के साथ मिलकर एलएसडी नामक नशीले पदार्थ पर शोध कर रहे थे। उनका मानना था कि एलएसडी से आध्यात्मिक अनुभव हासिल किए जा सकते है। इस शोध के दौरान दोनों ने छात्रों को भी एलएसडी की डोज़ दी जिसकी वजह से विश्वविद्यालय ने उन्हें निकाल दिया।

अल्बर्ट अमीर यहूदी परिवार से थे, सफल थे, लेकिन अंदर एक खालीपन था। एलएसडी के अनुभव अस्थायी थे। उनकी आध्यात्मिक छटपटाहट 1967 में उन्हे भारत ले आई। वहां भगवान दास नामक अमेरिकी साधु से मिले, जो उन्हें नीम करौली बाबा के पास ले गए। अल्बर्ट बाद में राम दास बने। उनकी किताब “Be Here Now और Miracle of Love” ने बाबा को पश्चिम में मशहूर कर दिया।

लेकिन उस दौर के भारतीय अखबारों ने इन कहानियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। कोई बड़ा समाचार नहीं बना। नीम करौली बाबा स्थानीय स्तर पर जाने जाते थे। वैश्विक प्रसिद्धि राम दास की किताबों और उनके एलएसडी-युग के कनेक्शन से आई। सबसे प्रसिद्ध घटना माँ वाली है। राम दास कहते हैं कि,

एक रात वे तारों के नीचे अपनी माँ के बारे में सोच रहे थे, जो स्प्लीन यानी तिल्ली की बीमारी से मर चुकी थीं। अगले दिन बाबा ने ठीक वैसी बात कही और अंग्रेजी में “स्प्लीन बोला। राम दास रो पड़े। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह “कोल्ड रीडिंग”जैसा लगता है। माँ की मौत सार्वजनिक रिकॉर्ड में हो सकती थी। रात में बाहर जाना भी अनुमान लगाया जा सकता था। कई संशयवादियों ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं।

राम दास खुद उस समय एलएसडी और अन्य पदार्थों के अनुभवों से गुजर चुके थे। क्या उनके दिमाग ने घटना को और नाटकीय बना दिया?

एलएसडी वाली कहानी और भी संदिग्ध है। राम दास बाबा को दो अलग अलग मौके पर नौ सौ से बारह सौ माइक्रोग्राम एलएसडी देते हैं। बाबा एलएसडी खा लेते हैं, उनके ऊपर इसका कोई असर नहीं होता। राम दास इसे दिव्य स्थिति मानते हैं। लेकिन आलोचक पूछते हैं, क्या बाबा ने वाकई गोलियाँ निगलीं थी ? टेरेन्स मैककेना जैसे प्रसिद्ध आलोचक शक जताते है कि यह हाथ की सफाई भी हो सकती है। दूसरे आलोचल पॉल क्रासनर ने एक बार दावा किया कि राम दास ने बाद में कहानी को गढ़ा हुआ माना, हालांकि राम दास ने इसे नकार दिया। मनोवैज्ञानिक रूप से, जो व्यक्ति सैकड़ों बार एलएसडी ले चुका हो, उसकी याददाश्त और व्याख्या दोनों प्रभावित हो सकती हैं। हो सकता है कि उस समय राम दास खुद एलएसडी के प्रभाव में हों और घटना को बढ़ा-चढ़ाकर देख रहे हों।

Miracle of Love में सैकड़ों चमत्कार लिखे हैं जैसे ट्रेन रुकना, बीमारी ठीक होना, भंडारे में सामग्री बढ़ना, नीम करौली बाबा का एक साथ कई जगह होना।

गौरतलब है कि ये सब भक्तों के बयान हैं। कोई स्वतंत्र सबूत नहीं। मौखिक परंपरा में अतिशयोक्ति आम है। जब कोई व्यक्ति बिना शर्त प्रेम का अनुभव करता है, तो दिमाग घटनाओं को चमत्कार का रूप दे देता है। इसे कन्फर्मेशन बायस कहते हैं।

सबसे गंभीर पहलू महिलाओं के साथ व्यवहार का है।

Miracle of Love के “कृष्णा प्ले”अध्याय और कुछ भक्तों के बयानों में बाबा के शारीरिक संपर्क का जिक्र है जैसे छाती छूना, गोद में बैठना, दूध पिलाने जैसी घटनाएँ, और एक मामले में लात मारना। मैथ्यू रेम्स्की जैसे आलोचक इसे गुरु-शिष्य संबंध में शक्ति के दुरुपयोग का उदाहरण बताते हैं। कुछ इसे “ग्रे रेप की जटिलता कहते हैं। उस समय के मीडिया ने इन बातों को नजरअंदाज किया। आज के नजरिए से ये सवाल उठना लाजमी है।

नीम करौली बाबा की लोकप्रियता का बड़ा कारण राम दास का पश्चिमी नेटवर्क था। हार्वर्ड से निकाले गए प्रोफेसर, एलएसडी के प्रयोगकर्ता, और फिर उनके “गुरु बनने की कहानी ने हिप्पी पीढ़ी को आकर्षित किया। बाबा खुद प्रसिद्धि से भागते थे। लेकिन कहानी राम दास के फिल्टर से गुजरकर दुनिया तक पहुँची। स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसे नाम बाद में जुड़े, लेकिन मूल आधार राम दास की किताबें ही रहीं।

आज फिल्म हिट हो रही है। लोग भावुक हो रहे हैं। लेकिन खोजपरक नजरिए से देखने पर लगता है कि चमत्कारों की कहानियाँ अतिरंजित हो सकती हैं, यादें नशे और आस्था से रंगी हुई हो सकती हैं, और कुछ व्यवहार आधुनिक मानकों पर सवालिया निशान लगाते हैं। सच्चाई शायद सादगी और बिना शर्त प्रेम के अनुभव में है, न कि उन घटनाओं में जिन्हें बाद में चमत्कार का रूप दिया गया।

फिल्म की सफलता हमें याद दिलाती है कि कहानी जितनी भावुक होती है, उतना ही उसे ठंडे दिमाग से जांचना जरूरी होता है। फिलहाल हनुमान अंश हिट है वैसे ही जैसे 1975 में जय संतोषी मां, कालजयी फिल्म शोले के साथ रिलीज़ हुई और सुपर हिट हुई, 1983 मे बिस्मिल्लाह की बरकत हिट हुई थी। आस्था और धर्म से बड़ा और कोई फार्मूला नहीं होता है फिल्म को हिट कराने का, ये बात हनुमान अंश ने फिर से साबित कर दी है।
Iqbal Ahmad

Iqbal Ahmad

इक़बाल अहमद पेशे से फ्रीलांस लेखक हैं और यू ट्यूब पर पाँच साल से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। द क्रेडिबल हिस्ट्री पर इनका साप्ताहिक शो ‘द मुस्लिम एंगल’ दर्शकों में लोकप्रिय है।