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बॉलीवुड में नई रामायण, सिर्फ़ ग्लैमर या लौटेंगे राम?

Iqbal Ahmad Iqbal Ahmad | 1h ago
बॉलीवुड में नई रामायण, सिर्फ़ ग्लैमर या लौटेंगे राम?

यह रामायण भी क्या आजकल चल रही राजनीति की आग पर बॉक्स ऑफिस की रोटियां सेकना चाहेगी?

आमिर ख़ान की सुपर हिट दंगल मूवी के निर्देशक नितेश तिवारी कृत बहुचर्चित, मल्टी स्टारर, पांच हज़ार करोड़ की लागत से बनी मूवी रामायण का ट्रेलर आजकल यू ट्यूब पर धूम मचा रहा है। रामानंद सागर कृत सन 1987 में दूरदर्शन पर प्रदर्शित रामायण आजतक हमारे दिलो दिमाग में कैद है। उस दौर में रामायण में राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल भगवान राम, दीपिका चिखालिया सीता के रूप में पूजे जाने लगे थे। रविवार को सुबह साढ़े नौ बजे जब धारावाहिक ब्लैक एंड वाइट टीवी के स्क्रीन पर शुरू होता तो टीवी की बाकायदा आरती की जाती थी। सड़कें सुनसान हो जाती थीं।

इस बार राम का क़िरदार रणबीर कपूर निभा रहे है। ये देखना सुखद है कि पिछले बारह साल में एंग्री हो चुके राम की जगह फिर से वो सौम्य राम वापस आए है जिनसे हम रामलीला के मंचन और रामानंद सागर की रामायण से परिचित हुए थे। इस बार वाली रामायण में तब के राम अब दशरथ की भूमिका में है।

इसके अलावा साईं पल्लवी (सीता) यश (रावण), सनी देओल (हनुमान), रवि दुबे (लक्ष्मण), अमिताभ बच्चन (जटायु), लारा दत्ता (कैकेयी), काजल अग्रवाल (मंदोदरी), राकुल प्रीत सिंह (शूर्पणखा), इंदिरा कृष्णन (कौशल्या), शीबा चड्ढा (मंथरा), मोहित रैना (भगवान शिव), विवेक ओबेरॉय, कुणाल कपूर, आदि हिंदी और दक्षिण सिनेमा के सुपर स्टारों की भीड़ है।


अयोध्या में रामजन्म भूमि खोज लिए जाने से पहले तक हमारे लिए मर्यादा पुरुषोत्तम “राम” भैया लाल पंडित थे। वैसे तो भैया लाल मिश्रा खानदानी पुरोहित थे। उनके पिता जी भिखारी (हम यही नाम जानते है, हो सकता है उनका असली नाम कुछ और रहा हो) मिश्र थे जो मेरे क़स्बा जफ़राबाद, जिला जौनपुर, उत्तर प्रदेश पिन कोड 222180 में मौजूद हिंदू बिरादरी के जजमान थे। शादी, मुंडन, कथा, दिवाली पूजा वगैरह में पुरोहित वही होते। भइया लाल भी पिता के नक्श ए कदम पर चलकर रोज़ी रोटी के लिए इसमें लग गए। बाद में उन्होंने तरक्की की, कुंडली बनाना, मिलना के अलावा भविष्य भी बांचने लगे। दूर दूर से लोग उनके पार अपनी समस्या के समाधान की आस लेकर आते थे।

दशहरा से एक महीने पहले गाँव और कस्बे से लेकर महानगर तक में रामलीला का ही क्रेज था। हमारे क़स्बे में तब भईया लाल मिश्र राम के रूप में अवतार ले लेते थे। दशहरा तक वो राम ही रहते थे। रावण वध करने बाद वो फिर से भईया लाल मिश्र बन जाते थे। इस पूरे महीने हमारे क़स्बे में रामलीला का मंचन होता था। पहले दिन फुलवारी से शुरू होकर रावण वध तक, पूरे एक महीने कस्बे के हर व्यक्ति के मनोरंजन का एक मात्र ज़रिया रामलीला होती थी। यही पहली बार राम को क़रीब से देखा।

हमारे रामलीला वाले राम सबके थे। बीच सड़क पर बने स्टेज के बाई तरफ़ एक छोटा मंच होता था जहाँ गोस्वामी जी स्टेज पर अदा किए जा रहे सीन के हिसाब से रामचरित मानस की चौपाईयाँ पढ़ते थे। उसके साथ एक हारमोनियम और एक ढोलक वाला होता था। जो कि कस्बे के ही लोग होते थे। बीच सड़क पर दर्शक होते थे जो सड़क पर बिछी दरी पर बैठ कर भइया लाल मिश्रा को राम के रूप में तसव्वुर कर रहे होते। ये राम बेहद सौम्य थे। कभी किसी से ग़ुस्से में बात नहीं करते थे। सिर्फ़ एक बार गुस्सा हुए जब समुंदर ने उन्हें लंका तक रास्ता देने से इंकार कर दिया था। हाँ लक्ष्मण का किरदार अदा करने वाले मुन्नू बरनवाल जब देखो तब गुस्से में ही रहते थे। सीता स्वयंवर में राम के शिवा धनुष तोड़ने से ख़फ़ा महर्षि परशुराम से पंगा ले लिया। वो तो राम के किरदार में समाये भईया लाल उन्हें हमेशा शांत और मुस्कुराते रहते थे।

सड़क के बीचो बीच बैठे दर्शकों में अगली क़तार औरतों और बच्चों की होती थी। पीछे पुरुष। इस भीड़ में शामिल होने के लिए धर्म की कोई बंदिश नही थी। मैं ख़ुद मुंह बाए दर्शकों के समूह में शामिल रहता था। मुझे राम हमेशा से पसंद थे। कितने शांत और सभ्य। दुश्मन से भी मुहब्बत से बात करते थे। यहाँ तक की युद्ध के समय उनके सामने कुंभकरण हो या रावण कभी भी उनके लिए उन्होंने अपमान जनक भाषा का उपयोग नही किया। होठों से मुस्कुराहट कभी हटी नही, यहाँ तक की जब रावण मृत्यु सैया पर था तब राम अपने गुस्सैल भाई लक्ष्मण को राजनीति सीखने के लिए रावण के पास भेजते है।

आज उग्र और आक्रामक हिंदू राष्ट्र की अवधारणा राजनीति बेची जा रही है। रामायण में भी राम राज्य की कल्पना थी। इस अवधारणा में शेर और बकरी के एक घाट पर पानी पीने का मेटाफ़र बहुचर्चित है अर्थात् राम राज्य में कमज़ोर और मज़बूत समान होंगे। अपराध शून्य होगा। नफ़रत के लिए कोई जगह नही होगी। प्रजा की छोटी सी शिकायत भी राजा के लिए पहली प्राथमिकता होगी। एक धोबी के ताने पर पत्नी का परित्याग कर देना। हालाँकि ये फ़ैसला आधुनिक युग में अलोचना के क़ाबिल है। लेकिन ऐसे राज्य की कल्पना कीजिए जहाँ समाज के सबसे निचले तबके का नागरिक धोबी भी महत्वपूर्ण है। जो कि हमारे लोकतंत्र की प्राथमिक अवधारणा है।

इसके उलट आज जबकि हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जहां जनता वोट करके सरकार चुनती है। हमारा संविधान छोटे-बड़े, ग़रीब-अमीर के बीच भेद नही करता। धर्म के आधार पर तो कतई नही। सच्चे अर्थों में राम राज्य की अवधारणा यही थी। लेकिन आरएसएस का लक्ष्य हिंदू राष्ट्र, मर्यादा पुरुषोत्तम के राम राज्य को अपने स्थापना के पहले दिन से ही सर के बल खड़ा करदिया है। बाबरी मस्जिद रामजन्म भूमि विवाद के बाद से एक तालिबानी हिंदू राष्ट्र, जिसमें दूसरे धर्म को मानने वालों के लिए कोई जगह नही है मज़बूत होता चला गया। आज बीजेपी के एकछत्र राज में इस नफ़रती निज़ाम ने अपनी जड़ें बहुत गहरी जमा ली है।

ऐसे माहौल में अगर भगवान राम अगर फिर से अवतरित होते तो शायद अपनी सौम्य मुस्कुराहट को किनारे फेंक इन नफ़रती सत्ता के खिलाड़ियों और उनके अनुयायियों के ख़िलाफ़ धनुष बाण नहीं उठाते सीधा सुदर्शन चक्र चला देते. ऐसे इस माहौल में बड़े पर्दे पर भगवान को माथे की त्योरियों को ढीला कर फिर से मुस्कुराता देख सुखद अहसास हो रहा है. क्या फ़िल्म पर्दे पर फिर से स्वर्गीय रामानंद सागर के जादू को जगा पाएगी, क्या वाक़ई फ़िल्म ट्रेलर का विस्तार होगी या आजकल चल रही राजनीति की आग पर अपने बॉक्स ऑफिस की रोटियाँ सेकना चाहेगी? ये अब तो जब फ़िल्म नवंबर में दिवाली पर रिलीज़ होगी तब पता चलेगा।

Iqbal Ahmad

Iqbal Ahmad

इक़बाल अहमद पेशे से फ्रीलांस लेखक हैं और यू ट्यूब पर पाँच साल से सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं। द क्रेडिबल हिस्ट्री पर इनका साप्ताहिक शो ‘द मुस्लिम एंगल’ दर्शकों में लोकप्रिय है।