UP में शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का मतलब जेल, ये है योगी का हिन्दू राष्ट्र?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायधीशों ने चेतावनी दी है कि निरंतर "निरंकुश" सत्ता का आचरण उत्तर प्रदेश को दु:खद स्थिति में धकेल सकता है।
अप्रैल 2026 में नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र के ठेके पर काम करनेवाले हजारों कर्मचारी और फैक्ट्री श्रमिकों ने आन्दोलन किया था। उनमें से कई ऐसे थे कि वे प्रति माह केवल 10,000 से 13,000 रुपये कमाते थे। वे सड़कों पर उतर आए थे। उनकी मांग सरल थी। उनकी मांग थी कि उन का न्यूनतम वेतन कम से कम 18,000 से 20,000 रुपये का हो। लेकिन संवाद के बजाय उत्तर प्रदेश के योगी के प्रशासन ने भारी बल प्रयोग के साथ इस का जवाब दिया। रास्ते अवरुद्ध किए गए, विरोध प्रदर्शनों पर लाठीचार्ज किया गया और गिरफ्तारियां की गईं। कई लोगों को हिरासत में लिया गया। गंभीर आरोपों के तहत उन पर FIR दर्ज की गई।
आश्चर्य की बात यह थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत उन पर मुकद्दमा ठोक दिया गया। इस कानून के तहत एक वर्ष तक बिना सुनवाई के किसी को भी जेल में रखा जा सकता है। जिनको हिरासत में लिया गया था उनमें आकृति चौधरी नाम की एक छात्रा भी थी कि जो प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही थीं।
आकृति चौधरी की हिरासत को रद्द करने वाला जो फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सुनाया यह सच में एक आशा प्रदान करता है। ऐसा लगता है कि हाँ, अभी तो संविधान जिंदा है और लोकतंत्र भी थोडा-सा जिंदा है। यह फैसला एक अनुस्मारक है कि लोकतंत्र में असहमति जताने का और विरोध करने का अधिकार सब को है। और यह कोई विशेषाधिकार नहीं है लेकिन यह लोकतंत्र का ऑक्सीजन है। सरकार के साथ असहमति और इसके सामने विरोध करने का अधिकार अगर मर जाए तो लोकतंत्र मर जाता है, और इसे मारने की कोशिश अंतिम 12 सालों से देश में हो रही है तब यह फैसला बहुत मायने रखता है।
उत्तर प्रदेश राज्य के वकील ने जो पक्ष अदालत में रखा इसे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने "मनगढ़ंत कहानी" कहा, और यह कहा कि आकृति चौधरी द्वारा हिंसा, आगजनी या पथराव उकसाने का प्रयास हुआ हो इसे दर्शाने वाली कोई विश्वसनीय सामग्री नहीं मिली है। वह बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाली एक छात्र कार्यकर्ता है। गौतम बुद्ध नगर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने जो कहा था वह इलाहाबाद के न्यायाधीशों ने ख़ारिज कर दिया। आकृति चौधरी श्रमिकों के समर्थन में हुए प्रदर्शन में रही और वह उस का हक़ है।
डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार का उपयोग करने वाले सभी लोगों को रोकने के लिए आकृति चौधरी की हिरासत का उदहारण पेश करना चाहते थे, ऐसा भी न्यायालय ने कहा। यह तो और भी गंभीर मामला है। न्यायधीशों ने चेतावनी दी कि निरंतर "निरंकुश" सत्ता का आचरण उत्तर प्रदेश को दु:खद स्थिति में धकेल सकता है।
हाई कोर्ट का फैसला हमारे संवैधानिक अधिकारों का एक आवश्यक और स्वागत योग्य समर्थन है। यह पुष्टि करता है कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और बेहतर वेतन की मांग करने का अधिकार सबको है। इसे अपराध नहीं बनाया जा सकता। सच में तो श्रमिकों के विरोध प्रदर्शनों को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में देखने के बजाय सम्मानजनक जीवन के अधिकार की वैध अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार करना चाहिए, तभी जब 2047 में भारत विक्सित हो तो श्रमिकों का भी विकास हो।
यूपी की योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा जो तानाशाही भरा कदम उठाया गया यह बताता है कि हिंदू राष्ट्र में तानाशाही चलेगी, लोकतंत्र नहीं।
आकृति चौधरी की रिहाई से हमें यह समझ में आता है कि मजदूरों के विरोध प्रदर्शन में कोई भी शामिल हो सकता है, चाहे वह विद्यार्थी हो या कोई भी नागरिक हो। कोई भी नागरिक आन्दोलन में कोई भी नागरिक शामिल हो सकता है। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि किसी मजदूरों की मांग से तुम्हें क्या लेनादेना?
इलाहाबाद अदालत ने जो फैसला सुनाया इस से इस देश में जीवित रहने का अधिकार सब को है, और सरकार का विरोध करने का अधिकार भी सबको है ऐसा प्रस्थापित होता है। और यह भी मालूम होता है कि यह कोई विशेषाधिकार नहीं है बल्कि यह एक मौलिक जन्मसिद्ध अधिकार है। और विरोध करना व्यक्ति का सिर्फ अधिकार ही नहीं है बल्कि लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना नागरिक का एक कर्तव्य भी है।
जो लोग हिन्दू राष्ट्र चाहते हैं उन्हें भगवाधारी मुख्यमंत्री देश के सबसे बड़े राज्य में शोषक तानाशाही चला रहे हैं, यह समझना चाहिए।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जिस तरीके से मजदूरों के शोषण को जायज ठहराती है और शोषण के विरोध को दबाने की कोशिश करती है इस से भगवा हिन्दू राष्ट्र कैसे तानाशाही राष्ट्र है, इसका पता आसानी से चलता है।
Pro. Hemantkumar Shah
प्रो शाह जाने-माने अर्थशास्त्री हैं और गुजरात में लंबे समय तक अध्यापन के बाद लेखन और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं।