पैलेट गन के इस्तेमाल और प्रदर्शनकारी छात्राओं के साथ हिंसा मामले की जांच करेगा SC पैनल
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को लड़की और उसके परिवार को जरूरी सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति (HPEC) को 20 जुलाई को हुए जंतर-मंतर प्रदर्शनों से जुड़े गंभीर आरोपों की प्राथमिकता से जांच करने का निर्देश दिया है। Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने 10 सितंबर की सुनवाई के बाद जारी विस्तृत आदेश में समिति को सबसे पहले इन चार मुद्दों की जांच करने को कहा है:
- प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल की जांच
- महिला प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाकर हिंसा और उत्पीड़न के आरोप
- प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को लगी चोटें
- दोनों पक्षों की ओर से हुई अत्यधिक हिंसा और संपत्ति के नुकसान की जांच
सुप्रीम कोर्ट ने जांच समिति से कहा है कि,
वह संवेदनशील और कमजोर गवाहों की सुरक्षा तथा गोपनीयता सुनिश्चित करे। जरूरत पड़ने पर उनकी पहचान सार्वजनिक नहीं की जाएगी। अदालत ने यह भी सुझाव दिया है कि गवाहों और अन्य लोगों से सबूत एवं दस्तावेज लेने के लिए एक अलग ऑनलाइन पोर्टल बनाया जा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि,
जांच समिति केवल घटनाओं से जुड़े तथ्यों की जांच करके अपनी सिफारिशें देगी। कानून-व्यवस्था से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों पर फैसला सुप्रीम कोर्ट खुद करेगा। इनमें पुलिस और जांच एजेंसियों द्वारा चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक यानी ‘फेशियल रिकग्निशन’ के इस्तेमाल का मुद्दा भी शामिल है।
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शन में शामिल 14 वर्षीय लड़की और उसके परिवार पर खतरे का आकलन करने का निर्देश दिया है। साथ ही कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को लड़की और उसके परिवार को जरूरी सुरक्षा उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि लड़की और उसके परिवार को जान से मारने की धमकियां दी गईं और उनके साथ उत्पीड़न किया गया, लेकिन दिल्ली पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की।
अदालत ने दिल्ली पुलिस को धमकी और उत्पीड़न के आरोपों की तेजी से जांच करने तथा अगली सुनवाई से पहले स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है। Live Law की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुछ याचिकाकर्ताओं ने पांच सदस्यीय जांच समिति के पुनर्गठन की मांग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। अदालत ने समिति की जांच शुरू होने से पहले ही उसके प्रति आशंका और पूर्वाग्रह जताए जाने पर नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने कहा कि,
समिति का गठन निष्पक्षता, पारदर्शिता और बिना किसी पक्षपात के अदालत की सहायता करने के लिए किया गया है। समिति किसी एक पक्ष का समर्थन करने के लिए नहीं बनाई गई है।
बता दें कि 10 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण और डॉ. एएम सिंघवी के समर्थन से समिति को लेकर सवाल उठाए थे।
अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने,
विशेष रूप से समिति के एक सदस्य—पूर्वोत्तर राज्य के एक सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (DGP)—पर आपत्ति जताते हुए दावा किया था कि वह केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के करीबी हैं। हालांकि, उसी दिन अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि वह ऐसी दलीलों पर विचार नहीं करेगी।
आवेदकों ने यह मांग भी की थी कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुभाष रेड्डी के स्थान पर किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश को समिति का अध्यक्ष बनाया जाए। मंगलवार को अपलोड किए गए आदेश में अदालत ने समिति पर लगाए गए आरोपों को “अटकलों और पूर्वाग्रह से ग्रस्त धारणाओं” पर आधारित बताते हुए स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा,
आवेदन की सामग्री का अवलोकन करने के बाद हमें कुछ चिंता के साथ यह टिप्पणी करने के लिए विवश होना पड़ रहा है कि उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) पर बेहद जल्दबाजी और समय से पहले संदेह जताया गया है।
समिति की संरचना में बदलाव से इनकार करते हुए पीठ ने कहा कि,
HPEC का गठन निष्पक्षता, पारदर्शिता और तटस्थ दृष्टिकोण के उच्चतम मानकों के साथ अदालत की सहायता करने के लिए किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया, “HPEC का गठन हमारे समक्ष किसी एक या दूसरे पक्ष के हितों की पैरवी करने के लिए नहीं किया गया है।
अदालत ने HPEC के कामकाज और साक्ष्य जमा करने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए कई निर्देश भी जारी किए। समिति से संवेदनशील एवं असुरक्षित गवाहों को सुरक्षा प्रदान करने, उनकी पहचान गोपनीय रखने तथा उनके बयानों और साक्ष्यों के संबंध में अत्यधिक गोपनीयता बनाए रखने को कहा गया है। समिति को एक अलग ऑनलाइन पोर्टल बनाने की अनुमति भी दी गई है, ताकि गवाह और अन्य संबंधित पक्ष दस्तावेज एवं साक्ष्य जमा कर सकें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके पहले के आदेश के तहत नियुक्त नोडल वकील मुख्य रूप से व्यवस्थागत मामलों में अदालती कार्यवाही में सहायता करेंगे। वे HPEC, अदालत और विभिन्न पक्षों के बीच संवाद के माध्यम के रूप में काम नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि वह नोडल वकीलों को पेपरबुक और मामले से संबंधित अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराए।