भारत पर लगने वाले 100% अमेरिकी टैरिफ का क्या होगा असर?
पश्चिम एशिया संकट जारी रहने तक ट्रंप विधेयक को पूरी सख्ती से लागू करने में सावधानी बरत सकते हैं।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को एक बिल पारित किया, जिसका उद्देश्य यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई को सीमित करना है। इस विधेयक में रूसी ऊर्जा के पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। बता दें कि भारत रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है।
Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को पिछले महीने अमेरिकी सीनेट की मंजूरी मिल चुकी है। अब इसे कानून बनने के लिए केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर की आवश्यकता है। हालांकि, विधेयक के प्रावधानों को लागू करने में राष्ट्रपति को व्यापक विवेकाधीन शक्तियां दी गई हैं।
भारत अपनी कच्चे तेल की 88 प्रतिशत से अधिक जरूरत आयात से पूरी करता है। इसमें रूस की हिस्सेदारी फिलहाल लगभग आधी है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से संकट में है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप इस बिल पर कब हस्ताक्षर करेंगे और इसके प्रावधानों को किस स्तर तक लागू करेंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि बिल में छूट और रियायत की गुंजाइश मौजूद है। कानून लागू होने की स्थिति में भारत अमेरिका से ऐसी छूट हासिल करने का प्रयास कर सकता है। हालांकि, इससे ट्रंप प्रशासन को भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की बातचीत के दौरान नई दिल्ली पर दबाव बनाने का एक अतिरिक्त साधन मिल जाएगा।
विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि,
सरकार बदलती वैश्विक परिस्थितियों और अलग-अलग देशों से आपूर्ति सुनिश्चित करके भारत की ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रस्तावित अमेरिकी कानून के भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित प्रभावों को अमेरिकी अधिकारियों के सामने उठाया गया है।
विदेश मंत्रालय ने कहा,
पिछले कुछ महीनों में विभिन्न अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तर पर इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। भारत ने द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर इसके संभावित प्रभावों को स्पष्ट रूप से सामने रखा है। भारतीय पक्ष ने अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने का संकल्प भी व्यक्त किया है। बिल के मूल मसौदे में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले सभी देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था। बिल के नए संस्करण में इसे बदलकर रूसी तेल और प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों पर अधिकतम 100 प्रतिशत टैरिफ तक सीमित कर दिया गया है।
कागज पर यह बड़ी कटौती दिखाई देती है, लेकिन भारत के लिए 100 प्रतिशत टैरिफ भी बहुत अधिक है। खासकर ऐसे समय में जब नई दिल्ली और वॉशिंगटन व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, भारत के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को बिल के प्रावधानों से किसी देश को छूट देने का अधिकार भी दिया गया है।
पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में भारी कमी है। ऐसी परिस्थितियों में भारत के लिए रूसी तेल का आयात तेजी से कम करना व्यावहारिक विकल्प नहीं है। अमेरिका के लिए भी ऐसे समय में वैश्विक बाजार से लाखों बैरल रूसी तेल हटाना समझदारी भरा कदम नहीं होगा, जब पश्चिम एशिया से ऊर्जा आपूर्ति पहले ही बाधित है।
इस सप्ताह की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन से रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने को कहा था। वैश्विक बाजार में सीमित आपूर्ति के कारण कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या ट्रंप बड़ी मात्रा में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाकर बाजार से और अधिक तेल हटाने का जोखिम उठाएंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया संकट जारी रहने तक ट्रंप विधेयक को पूरी सख्ती से लागू करने में सावधानी बरत सकते हैं।
कड़े प्रतिबंध लगाने से तेल और ईंधन की कीमतें और बढ़ सकती हैं। अमेरिका में इस वर्ष होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले ट्रंप प्रशासन ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहेगा।
अबू धाबी स्थित ऊर्जा विश्लेषक Natalia Katona ने Indian Express से कहा,
मौजूदा परिस्थितियों में इस बिल को लागू करना अमेरिका के लिए भी आर्थिक रूप से आत्मघाती होगा। रूसी डीजल की अनुपलब्धता के कारण अमेरिका में डीजल क्रैक स्प्रेड यानी रिफाइनिंग मार्जिन पहले ही 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है। कोई भी तार्किक आर्थिक आकलन इस बिल के खिलाफ जाएगा, लेकिन मौजूदा प्रशासन के राजनीतिक अवसरवाद और आर्थिक दृष्टिहीनता को देखते हुए हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।
फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी कच्चे तेल से दूरी बना ली थी। इसके बाद रूस ने भारत सहित इच्छुक खरीदारों को रियायती कीमतों पर तेल देना शुरू किया। इसी कारण कभी भारत को बेहद कम तेल बेचने वाला रूस अब उसका सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है। उसने भारत के पारंपरिक पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्ताओं को भी पीछे छोड़ दिया।
पश्चिम एशिया संकट के दौरान खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति घटने पर रूसी तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण सहारा साबित हुआ। विश्लेषकों के मुताबिक,
प्रतिबंधों के खतरे के बावजूद रूसी तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए सबसे व्यावहारिक और प्रतिस्पर्धी विकल्प है। मौजूदा बाजार में इसे बदलना बेहद मुश्किल है।
कमोडिटी बाजार विश्लेषक कंपनी Kpler के पोत-निगरानी आंकड़ों के अनुसार,
भारत ने अगस्त में रूस से प्रतिदिन 20.8 लाख बैरल कच्चा तेल आयात किया। यह भारत के कुल तेल आयात का लगभग 45 प्रतिशत था। इससे पहले के दो महीनों में रूस की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से भी अधिक रही थी।
Kpler के मॉडलिंग और रिफाइनिंग मैनेजर सुमित रितोलिया ने कहा था कि रूस पर कठोर प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने के अमेरिकी सीनेट के फैसले से रूसी तेल आपूर्ति से जुड़ा नीतिगत जोखिम बढ़ा है, लेकिन इससे निकट भविष्य में भारत या चीन की खरीद के अनुमान में बदलाव नहीं आया है।
उन्होंने कहा, “बिल को अब भी कुछ बाधाओं से गुजरना है। इसका अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन इसे कितनी सख्ती से लागू करता है और छूट या विशेष रियायतों का कितना इस्तेमाल किया जाता है।”
उनके अनुसार, जब वास्तविक तेल आपूर्ति की सुरक्षा चिंता का विषय बनती है, तो नीति-निर्माता ऐसे कदमों से बचना चाहते हैं जो कच्चे तेल की उपलब्धता को अनावश्यक रूप से बाधित करें। भारत निश्चित रूप से अमेरिका से छूट की मांग करेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रस्तावित कानून ट्रंप प्रशासन को भारत के खिलाफ टैरिफ को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का एक और जरिया देगा।
Natalia Katona ने कहा, “बिल पारित होना और उसका वास्तविक कार्यान्वयन दो अलग-अलग बातें हैं। अमेरिका इसे प्रतिबंधों के हथौड़े के बजाय भारत पर दबाव बनाने वाले उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।”
नाम न जाहिर करने की शर्त पर एक व्यापार विशेषज्ञ ने कहा कि,
वाशिंगटन इस विधेयक का इस्तेमाल भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में अपने पक्ष में अधिक अनुकूल शर्तें हासिल करने के लिए कर सकता है। शुरुआती बाधाओं के बाद पिछले कुछ महीनों में इस समझौते की बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।