Norway Diary: वह राजा जो कहता था — ईश्वर और अल्लाह को मानने वाले एक हैं
नार्वे के राजा हेराल्ड ने सीमित शक्तियों के साथ देश में सबको समान अधिकार की पैरवी की थी
89 वर्ष की उम्र में किंग हेराल्ड पंचम की मृत्यु के साथ नॉर्वे में एक युग समाप्त हुआ। उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद राजमुकुट नहीं, बल्कि 2016 का वह भाषण है जिसमें उन्होंने प्रवासियों, समलैंगिकों, अलग-अलग धर्मों और अकेलेपन से जूझते लोगों, सबको ‘नॉर्वे’ कहा था।
नॉर्वे में शुक्रवार, 28 अगस्त की सुबह 6 बजकर 35 मिनट पर एक असामान्य सन्नाटा उतर आया। ओस्लो के राजकीय अस्पताल में किंग हेराल्ड पंचम ने 89 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। राजमहल की संक्षिप्त घोषणा के बाद लोग फूल लेकर ओस्लो के शाही महल के सामने जमा होने लगे। झंडे आधे झुके, सरकार ने राष्ट्रीय शोक की घोषणा की और एक ऐसे राजा की स्मृतियाँ लौटने लगीं, जिसने 35 वर्षों के शासन में राजशाही को आलीशान भवनों के चमक दमक से निकालकर रोजमर्रा के नॉर्वे के कुछ करीब ला दिया था।
हेराल्ड 1991 में अपने पिता ओलाव पंचम की मृत्यु के बाद राजा बने थे। संवैधानिक राजतंत्र में राजा के पास वास्तविक राजनीतिक सत्ता नहीं होती, फिर भी नॉर्वे में राजपरिवार का एक प्रतीकात्मक सामाजिक स्थान है। हेराल्ड की खासियत यह रही कि उन्होंने इस प्रतीक को ‘शुद्ध रक्त’, वंश या परंपरा से कम और साझा नागरिकता से अधिक जोड़ने की कोशिश की। शायद इसीलिए उनकी मृत्यु पर प्रधानमंत्री योनास गार स्तूरे ने उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जिसने नॉर्वेजियनों को अपने भीतर और एक-दूसरे में बेहतर चीजें देखने का भरोसा दिया।
2016 का मशहूर भाषण, जब नस्ल, धर्म और प्रेम को एक सूत्र में बाँधा
1 सितंबर 2016 को ओस्लो के पैलेस पार्क में शाही दंपति ने देश भर से आए करीब डेढ़ हजार लोगों के लिए गार्डन पार्टी रखी थी। वहीं हेराल्ड ने एक छोटा-सा भाषण दिया। भाषण में कोई बड़ी राजनीतिक घोषणा नहीं थी, न किसी पार्टी या विचारधारा का नाम। उन्होंने एक सरल सवाल पूछा, नॉर्वे क्या है?
पहले पहाड़, फ्योर्ड, समुद्र, लंबी सर्दियाँ और छोटे-छोटे शहर आए; फिर उन्होंने कहा कि सबसे बढ़कर नॉर्वे उसके लोग हैं।
उन्होंने कहा कि नॉर्वेजियन उत्तर, मध्य और दक्षिण से आते हैं; दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी आए हैं। कुछ लोग अफगानिस्तान, पाकिस्तान और पोलैंड से आए हैं, कुछ स्वीडन, सोमालिया और सीरिया से। किसी के माता-पिता बाहर से आए, किसी के दादा-दादी। दूसरे शब्दों में, नॉर्वेजियन होने का कोई एक चेहरा नहीं है।
उन्होंने धर्म को भी उसी सहजता से रखा। नॉर्वेजियन ईश्वर में विश्वास करते हैं, अल्लाह में विश्वास करते हैं, ब्रह्मांड में विश्वास करते हैं, और कुछ किसी में विश्वास नहीं करते। यह वाक्य उस समय भी चर्चित हुआ था; आज, जब यूरोप से भारत तक पहचान की राजनीति धर्म को नागरिकता की कसौटी बनाने लगती है, उसका अर्थ और बड़ा हो जाता है। राजा धर्मनिरपेक्षता का पाठ नहीं पढ़ा रहे थे; वे बस बता रहे थे कि आधुनिक राष्ट्र की वास्तविक तस्वीर पहले ही बहुलतावादी हो चुकी है।
फिर वह हिस्सा आया जिसने भाषण को लैंगिक सीमाओं से बाहर पहुँचा दिया। राजा ने कहा कि नॉर्वेजियन लड़कियों से प्रेम करने वाली लड़कियाँ हैं, लड़कों से प्रेम करने वाले लड़के हैं, और एक-दूसरे से प्रेम करने वाले लड़के-लड़कियाँ हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि कुछ लोग अपने अकेलेपन से जूझ रहे हैं, कुछ बीमारी से, कुछ विस्थापन से; कुछ अमीर हैं, कुछ गरीब। यानी राष्ट्र केवल सफल, स्वस्थ और बहुसंख्यक नागरिकों का क्लब नहीं है।
भाषण की केंद्रीय पंक्ति का आशय था: ‘नॉर्वे हम हैं।’ फिर उन्होंने पूछा कि क्या हम मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे की देखभाल कर सकते हैं; क्या हम इस देश को एक साझा ‘हम’ में बदल सकते हैं। यह किसी राजा का क्रांतिकारी घोषणापत्र नहीं था, लेकिन राजशाही के मुंह से निकली नागरिक समानता की भाषा थी। दस साल बाद, जब दुनिया में आप्रवासन, नस्ल, धर्म और लैंगिक पहचान पर बहस कहीं अधिक ध्रुवीकृत है, यह भाषण लगभग समकालीन संपादकीय जैसा सुनाई देता है।
मोदी से आखिरी मुलाकात
भारत से हेराल्ड का अंतिम बड़ा राजनयिक प्रसंग उनकी मृत्यु से केवल तीन महीने पहले आया। 18 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे की आधिकारिक यात्रा पर ओस्लो पहुँचे और रॉयल पैलेस में किंग हेराल्ड से मिले। मोदी ने भारतीय जनता की ओर से शुभकामनाएँ दीं और भारत-नॉर्वे संबंधों को लोकतंत्र और न्याय जैसे साझा मूल्यों से जुड़ा बताया। दोनों ने नई तकनीकों सहित अलग-अलग क्षेत्रों में भारतीय और नॉर्वेजियन कंपनियों की बढ़ती भूमिका पर बात की। मुलाकात के बाद राजा ने भारतीय प्रधानमंत्री के सम्मान में दोपहर का भोजन भी दिया।
हेराल्ड की मृत्यु के बाद मोदी ने इसी मुलाकात को याद करते हुए कहा कि राजा की गर्मजोशी और अपने देश के प्रति सेवा-भाव ने उन्हें प्रभावित किया था। यह संयोग भी दिलचस्प है कि हेराल्ड की आखिरी अंतरराष्ट्रीय स्मृतियों में एक भारत से जुड़ी तस्वीर शामिल हो गई। भारत और नॉर्वे का रिश्ता अब केवल समुद्री व्यापार या ऊर्जा तक सीमित नहीं है; हरित तकनीक, निवेश, अनुसंधान और EFTA व्यापार समझौते के बाद इसका आर्थिक आयाम भी तेजी से बढ़ रहा है।
राजा जिन्होंने ओलंपिक खेला था
हेराल्ड समुद्री नाविक थे और वह ओलंपिक में नॉर्वे का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। लेकिन 2026 का फुटबॉल विश्व कप उनके जीवन के अंतिम सार्वजनिक उल्लासों में शामिल हो गया। नॉर्वे की टीम के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद 13 जुलाई को उन्होंने पूरी राष्ट्रीय टीम को रॉयल पैलेस बुलाया। कप्तान मार्टिन ओडेगार्ड सबसे आगे थे; एर्लिंग हालांड सहित खिलाड़ी, कोच स्तोले सोलबक्केन और फुटबॉल संघ की अध्यक्ष लीसे क्लावेनेस भी मौजूद थीं।
महल के बाहर हजारों समर्थक ‘Alt for Norge’ (सब कुछ नॉर्वे के लिए) गा रहे थे। उससे कुछ सप्ताह पहले सेनेगल पर 3-2 की जीत के बाद नॉर्वेजियन प्रशंसक रात भर जश्न मनाते हुए महल तक पहुँच गए थे और मजाक में नारा लगा रहे थे कि वे राजा को जगाने आए हैं। हेराल्ड की मृत्यु पर हालांड ने लिखा कि उनसे मिलना सम्मान की बात थी। एक वृद्ध राजा और नई पीढ़ी के सुपरस्टार फुटबॉलरों की वह मुलाकात अब उनके अंतिम सार्वजनिक अध्यायों में दर्ज हो गई है।
अब हाकोन अष्टम और रानी मेटे-मारित
नॉर्वे का सिंहासन खाली नहीं रहता। हेराल्ड की मृत्यु के उसी क्षण उनके 53 वर्षीय बेटे हाकोन नए राजा “हाकोन अष्टम” बन गए। उनकी पत्नी मेटे-मारित अब रानी हैं और 22 वर्षीय इंग्रिड अलेक्ज़ान्द्रा क्राउन प्रिंसेस तथा अगली उत्तराधिकारी। हाकोन वर्षों से पिता की बीमारी के दौरान रीजेंट के रूप में जिम्मेदारियाँ निभाते रहे थे।
लेकिन यह उत्तराधिकार उत्सव से अधिक परीक्षा के समय आया है। नई रानी मेटे-मारित का नाम जेफ्री एप्स्टीन से जुड़े दस्तावेजों के कारण गंभीर विवाद में रहा है। सार्वजनिक हुए ई-मेल रिकॉर्ड 2011 से 2014 तक दोनों के बीच नियमित संपर्क दिखाते हैं। उस समय तक एप्स्टीन 2008 में एक नाबालिग से जुड़े यौन अपराध के मामले में दोषी ठहराया जा चुका था। 2026 में सामने आए दस्तावेजों ने यह भी दिखाया कि संपर्क पहले बताई गई अवधि से लंबा चला था। मेटे-मारित ने कहा कि उन्होंने एप्स्टीन की पृष्ठभूमि पर्याप्त रूप से नहीं जाँची, बाद में खुद को उसके द्वारा ‘manipulated and deceived’ महसूस किया और इसके लिए जिम्मेदारी स्वीकार की।
यहाँ तथ्य और आरोप में फर्क रखना जरूरी है। दस्तावेज मेटे-मारित और एप्स्टीन के संपर्क, मुलाकातों और पत्राचार को प्रमाणित करते हैं; वे अपने-आप में मेटे-मारित पर एप्स्टीन के अपराधों में शामिल होने का आरोप सिद्ध नहीं करते। फिर भी भावी रानी का एक सजायाफ्ता यौन अपराधी से वर्षों तक संपर्क सार्वजनिक विश्वास का बड़ा प्रश्न बना। नए राजा हाकोन के सामने इसलिए केवल पिता की विरासत सँभालने का काम नहीं है, बल्कि राजघराने की विश्वसनीयता फिर से मजबूत करने की चुनौती भी है।
(नॉर्वे के नए राजा हॉकों और रानी मेटे मारीत)
(राजकुमारी इंग्रिड)
एक अश्वेत दामाद
नॉर्वे का राजपरिवार एक और वजह से आधुनिक यूरोपीय राजघरानों में अलग दिखाई देता है। किंग हेराल्ड की बेटी प्रिंसेस मार्था लुईसे ने 2024 में अमेरिकी ड्यूरेक वेरेट से विवाह किया। वेरेट अश्वेत हैं और कई अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों ने उन्हें आधुनिक यूरोपीय राजपरिवार में विवाह करने वाला पहला अश्वेत पुरुष बताया। इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि नॉर्वे वह यूरोपीय राजपरिवार है जहाँ एक अश्वेत पुरुष ने राजा की बेटी से विवाह कर परिवार में प्रवेश किया
इस विवाह में स्वयं किंग हेराल्ड और क्वीन सोन्या सम्मिलित हुए और पहले ही सार्वजनिक रूप से दंपति को शुभकामनाएँ दे चुके थे। हेराल्ड ने वेरेट के खिलाफ नस्लवादी प्रतिक्रियाओं की निंदा भी की थी। विडंबना यह है कि बाद में वेरेट ने Netflix वृत्तचित्र में दावा किया कि राजपरिवार शुरू में उनके नस्लवाद के अनुभवों को समझ नहीं पाया। नॉर्वे में इस आरोप पर तीखी बहस हुई और कई लोगों ने राजा का बचाव किया। यह प्रसंग हेराल्ड की विरासत को और दिलचस्प बनाता है: समावेशिता की सार्वजनिक भाषा बोलने वाला परिवार भी निजी जीवन में नई सामाजिक वास्तविकताओं से सीखता और उलझता रहा।
( मार्था लुईसे और ड्यूरेक वेरेट)
राजा से अधिक एक ‘साझा प्रतीक’
हेराल्ड का जीवन स्वयं परंपराओं को तोड़ने की कहानी था। उन्होंने सोन्या हाराल्डसेन से विवाह के लिए वर्षों इंतजार किया क्योंकि वह किसी राजघराने से नहीं थीं। अंततः 1968 में विवाह हुआ। बाद की पीढ़ी में बेटे हाकोन ने मेटे-मारित से विवाह किया, जो पहले से एक बच्चे की माँ थीं। बेटी मार्था लुईसे ने एक अश्वेत अमेरिकी आध्यात्मिक गुरु को जीवनसाथी चुना। इनमें से हर घटना ने नॉर्वे की राजशाही को पुराने यूरोपीय कुलीन ढाँचे से थोड़ा और दूर किया।
राजशाही अपने आप में लोकतांत्रिक संस्था नहीं है। उत्तराधिकारी चुनाव से नहीं, जन्म से तय होता है। नॉर्वे में भी समय-समय पर गणतंत्र की माँग उठती रही है। इसलिए हेराल्ड की लोकप्रियता को राजशाही की निर्विवाद स्वीकृति मानना ठीक नहीं होगा। उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता शायद इसीलिए बनी रही कि उन्होंने अपने पद की अलोकतांत्रिक उत्पत्ति को राजनीतिक शक्ति में बदलने की कोशिश नहीं की; इसके बजाय वह संकट के समय सांत्वना, उत्सव के समय साझेदारी और मतभेद के समय एक न्यूनतम साझा भाषा देने वाले प्रतीक बने रहे।
2011 के आतंकी हमलों के बाद शोकग्रस्त देश को संबोधित करना हो, प्रवासियों को नॉर्वेजियन पहचान में शामिल करना हो या विश्व कप से लौटी फुटबॉल टीम को महल बुलाना, हेराल्ड की भूमिका अक्सर वहीं दिखाई दी जहाँ राजनीति के तर्क से अलग किसी साझा भाव की जरूरत थी। राजा के रूप में उनकी वास्तविक शक्ति शायद यही थी कि उनके पास बहुत कम राजनीतिक शक्ति थी।
अब हाकोन अष्टम के सामने कठिन विरासत है। पिता ने जिस ‘हम’ की भाषा बनाई, उसे ऐसे समय बचाना है जब राजपरिवार स्वयं विवादों के बीच है और यूरोप की राजनीति पहचान, आप्रवासन और ध्रुवीकरण से जूझ रही है। शायद इसी वजह से 2016 का वह सवाल फिर लौटता है, हम कौन हैं? हेराल्ड का उत्तर बहुत सरल था: देश नक्शा भर नहीं, उसमें रहने वाले लोग हैं। अलग-अलग लोग। और यदि वे एक-दूसरे की देखभाल कर सकें, तो वही राष्ट्र है। उनकी इन पंक्तियों से हिंदी कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना याद आते हैं, जिनकी कविता है,
देश काग़ज़ पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
Praveen Kumar Jha
प्रवीण कुमार झा नार्वे में रहते हैं। पेशे से डॉक्टर हैं, मन से लेखक। कई चर्चित किताबें प्रकाशित