ये पन्ने सामने आ गए तो सात्यिकी सावरकर को राहुल गांधी से माफ़ी माँगनी पड़ेगी?
कोर्ट में जाकर सात्यिकी सावरकर फँस गए हैं?
विनायक दामोदर सावरकर के चचेरे पड़पोते सात्यिकी सावरकर कोर्ट में गए तो थे राहुल गांधी से अपने परदादा के कथित अपमान पर माफ़ी मँगवाने, लेकिन जिरह के दौरान वह जिस तरह से उनके राज़ खोलते जा रहे हैं, वह सावरकर के समर्थकों के लिए बड़ी दिक़्क़त पैदा कर रहा है।
7 जुलाई को उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी ने जानबूझकर सावरकर के खिलाफ झूठे आरोप लगाए जिससे उनके सम्मान को ठेस लगी तथा उनके परिवार को मानसिक कष्ट हुआ। हालाँकि वह भाषण इंग्लैंड में दिया गया था लेकिन इसका असर पुणे और पूरे देश में हुआ क्योंकि राहुल गांधी के इस भाषण का वीडियो यू ट्यूब पर डाला गया और पूरे देश ने इसे देखा-सुना।
उनकी आपत्ति 'माफ़ीवीर' या 'ग़द्दार' कहे जाने पर नहीं बल्कि इस बात से है कि श्री गांधी ने यह 'झूठा' आरोप लगाया कि सावरकर ने एक किताब में एक मुस्लिम व्यक्ति की पिटाई की बात लिखी है, जो उनके हिसाब से ग़लत है।
इस आपत्ति को पढ़ते हुए लगता है कि सात्यिकी ने विनायक दामोदर सावरकर का लिखा ठीक से पढ़ा ही नहीं है। अगर वह प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'सावरकर-समग्र' का पहला ही खंड पढ़ लेते तो उन्हें अपने परदादा की यह वीरगाथा मिल जाती।


पहले खंड के पेज 152-153 पर उन्होंने अपने पैतृक गाँव भगूर में मस्जिद पर हमले और मुसलमान छात्रों के खिलाफ़ चाकू, रूल, आलपिनों के प्रयोग की बात खुद लिखी है। अब तक राहुल गांधी ने ये पन्ने कोर्ट में पेश किए हैं या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन अब तक सात्यिकी ने जिस तरह सावरकर की माफ़ियों, गोडसे परिवार से रिश्तों, गाय को माता न मानने और गोडसे बंधुओं के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आजीवन सदस्य होने की बातें कोर्ट के अंदर स्वीकार की हैं, ये पेज सामने आने पर शायद उनको यह अप्रिय तथ्य भी कोर्ट में स्वीकार करना पड़े।
2014 से पहले सावरकर पर ज़्यादा बात नहीं होती थी, संघ भी शिशु मंदिरों से बाहर उन पर काम ही बात करता था। वैसे सावरकर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से रिश्ते पहले सरसंघचालक हेडगेवार की मृत्यु के बाद से ही खराब हो गए थे और गोलवलकर से उनका पत्र व्यवहार भी कम ही था। संघ से उनकी नाराज़गी उनके इस कथन से समझी जा सकती है- राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) की समाधि पर यही लिखा जाएगा कि संघ का आदमी पैदा हुआ, शाखा में गया और वहीं मर गया।”
2014 में सत्ता में आने के बाद स्वाधीनता संग्राम से बाहर रहने का कलंक मिटाने के लिए जब स्वाधीनता सेनानियों की तलाश शुरू हुई तो कांग्रेस से वल्लभभाई पटेल और सुभाषचंद्र बोस के साथ हिन्दू महासभा से आधे-अधूरे स्वाधीनता सेनानी सावरकर को झाड़-पोंछ कर निकाला गया। ज़ाहिर है पहली चर्चा उनके माफ़ीनामों की हुई, जो उन्होंने अंडमान की जेल में रहते हुए अंग्रेज़ी शासन को लिखे थे।
पहले तो दावे किए गए कि सावरकर की माफ़ियाँ दुष्प्रचार हैं। उदाहरण के लिए भाजपा के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने मई 2025 में दावा किया कि सावरकर ने कभी कोई माफ़ी नहीं मांगी, लेकिन सात्यिकी सावरकर ने कोर्ट में यह स्वीकार किया कि उनके परदादा ने ब्रिटिश सरकार को 10 दया याचिकाएं लिखी थीं। वैसे तो सावरकर के सम्पूर्ण लेखन और जीवन पर आधारित वेबसाईट पर भी उनकी माफ़ियों का ज़िक्र मिलता है, लेकिन अब तक पाँच दया याचिकाओं की ही सूचना जनता में थी। सावरकर के पक्ष में दो खंडों में उनकी जीवनी लिखने वाले विक्रम संपत ने भी अपनी किताब में 5 दया याचिकाओं का ही ज़िक्र किया है। अब सात्यिकी ने दस दया याचिकाओं की सूचना देकर संघ और भाजपा के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। उनके लिए यह कह पाना अब संभव नहीं होगा कि सावरकर ने माफ़ी नहीं मांगी थी।
इसी तरह नाथूराम गोडसे के भाई और गांधी हत्या के षड्यन्त्रकर्ताओं में से एक गोपाल गोडसे ने जेल से छूटने के बाद एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा था कि वे और उनके भाई नाथूराम आजीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य रहे, वह अपने दावे से पीछे कभी नहीं हटे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे अस्वीकार किया और हमेशा यही कहा कि गोडसे बंधु संघ छोड़ चुके थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने संसद के भीतर दावा किया था कि गोडसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोधी था। सात्यिकी सावरकर ने संघ के इस दावे को भी कोर्ट के अंदर झूठा क़रार देते हुए बताया कि गोडसे बंधु हमेशा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे। उन्होंने बताया कि गोपाल गोडसे उनके नाना थे और उनका यह दावा सही था कि सभी गोडसे बंधु आजीवन संघ में ही रहे।
ज़ाहिर है कि इस केस में विनायक दामोदर सावरकर का सम्मान बचाने की जगह सात्यिकी को ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित उन तथ्यों को स्वीकार करना पड़ रहा है जो हम जैसे लोगों ने पहले ही सामने रख दिया है। उदाहरण के लिए मैंने अपनी किताब 'सावरकर: काला पानी और उसके बाद' में यह तथ्य दिया था सावरकर गाय की पूजा का विरोध करते थे और गधे को उससे अधिक उपयोगी जानवर मानते थे। सात्यिकी ने कोर्ट के समक्ष यह बात भी स्वीकार की।
इन तथ्यों के इस तरह सामने आने के बाद संघ और भाजपा को सावरकर के महिमामंडन में लगातार मुश्किलें आएंगी, शायद यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राहुल गांधी के खिलाफ ऐसा ही एक मुक़दमा चलाने के लिए आवश्यक अनुमति देने से इंकार कर दिया।