SIR पर बुरे फंसे ज्ञानेश कुमार, बवाल के बाद EC ने अब विशेष अभियान चलाने का किया ऐलान
इस अभियान में फॉर्म 6 का वह प्रारुप इस्तेमाल नहीं होगा जिसके बदलाव को दो चुनाव आयुक्तों ने गैरकानूनी बताया था।
विपक्ष और नागरिकों के व्यापक विरोध के बाद चुनाव आयोग धीरे-धीरे उन सभी फैसलों को वापस ले रही है जिसको लेकर चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने सवाल करते कहा था कि ये नियम मुख्य चुनाव आयुक्त ने बिना कोई बैठक किए किसी दबाव में मनमाने तरीके से लिए थे। दोनों आयुक्तों ने Form 6 में किए गए बदलाव पर आपत्ति जताते हुए इसे गैरकानूनी भी कहा था।
Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रहे भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने अब उन 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता सूची से ‘छूट गए’ लोगों के नाम जोड़ने के लिए ‘विशेष अभियान’ चलाने का निर्देश दिया है, जहां यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यह निर्देश 29 सितंबर को लिखित रूप में भेजा गया था और गुरुवार को सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस में इसे दोहराया गया।
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ नाम हटाए जाने को लेकर आयोग की भूमिका की गहन जांच-पड़ताल हो रही है। इससे एक सप्ताह पहले, 23 सितंबर को प्रकाशित Indian Express की पड़ताल में सामने आया था कि मतदाता सूची में किसका नाम शामिल होगा और कौन बाहर रह जाएगा, इसे लेकर आयोग के भीतर भी सवाल उठाए जा रहे थे।
पड़ताल में खुलासा हुआ था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 बार लिखित रूप से उन फैसलों पर आपत्ति जताई थी, जो उनकी जानकारी के बिना आयोग के नाम पर लिए गए थे। इनमें नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में बदलाव और ECINet पर केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे फैसले शामिल थे। ECINet वह सॉफ्टवेयर है, जिस पर SIR के दौरान मतदाता सूचियां तैयार की गई थीं और अब सभी मतदाता सूचियां इसी पर मौजूद हैं।
निर्वाचन आयोग के सचिव की ओर से 29 सितंबर को सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे गए पत्र में कहा गया है,
जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR पहले ही पूरा हो चुका है, वहां मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) निरंतर अद्यतन की प्रक्रिया के तहत छूट गए मतदाताओं तथा युवा और पहली बार पात्र बने मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाएंगे।
इस अभियान में फॉर्म 6 का वह संस्करण इस्तेमाल होगा, जिसमें जुलाई में जोड़ा गया सवाल नहीं होगा। ऑनलाइन फॉर्म में आवेदकों से पूछा जाने लगा था कि क्या उनका या उनके माता-पिता का नाम पिछले SIR के बाद की मतदाता सूची में था। जवाब दिए बिना फॉर्म जमा नहीं किया जा सकता था। ऐसे में जिस 18 वर्षीय युवा के माता-पिता के नाम हटा दिए गए हों, उसके पास सही जानकारी देते हुए आवेदन पूरा करने का कोई रास्ता नहीं बचता था।
नियमों में संशोधन करके केवल सरकार ही इस फॉर्म को बदल सकती है, लेकिन ऐसा कोई संशोधन नहीं किया गया था। दोनों चुनाव आयुक्तों ने मई में ही यह बात कही थी। अगस्त में संधू ने इस बदलाव को ‘अनधिकृत/गैरकानूनी’ बताया था। अब 29 सितंबर के पत्र में इस घोषणा को केवल ‘SIR के चरण’ तक सीमित कर दिया गया है। जिन 20 राज्यों में SIR पूरा हो चुका है, वहां पहली बार मतदाता बनने वाले और सूची से ‘छूट गए’ लोग नियमों में निर्धारित सामान्य फॉर्म भरेंगे।
गुरुवार को सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारि यों के साथ आयोग की वीडियो कॉन्फ्रेंस में इस निर्देश को और विस्तार दिया गया। बैठक में शामिल अधिकारियों के मुताबिक, वहां मौजूद उप निर्वाचन आयुक्त ने मुख्य निर्वाचन अधिकारियों से कहा कि वे SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना करें, हटाए गए लोगों की सूची तैयार करें और पहचान करें कि कहीं कोई मतदाता छूट तो नहीं गया है।
चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने कहा,
घरों पर जाने के लिए कहा गया है, खासकर ऐसे मामलों में जहां मतदाता का नाम कहीं और दर्ज नहीं है, उसका नाम दोहरा नहीं था और उसकी मृत्यु भी नहीं हुई है। ऐसे लोगों से फॉर्म 6 भरवाने को कहा गया है। इस प्रक्रिया में मुख्य निर्वाचन अधिकारियों से राजनीतिक दलों या उनके बूथ स्तर के एजेंटों की मदद लेने के लिए भी कहा गया है।
सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों से कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम अनुचित तरीके से छूट गया है, तो नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 के जरिए उसका नाम दोबारा जोड़ा जाए। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भी उन 97 मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के लिए यही रास्ता अपनाना होगा, जिन्हें राज्य के अपने ERO द्वारा पात्र पाए जाने के बावजूद 21 फरवरी की अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया गया था।
जैसा कि Indian Express ने 24 सितंबर को रिपोर्ट किया था, इन 97 लोगों के नाम प्रारूप सूची के चरण में हटाए गए थे। उन्होंने दस्तावेज पेश किए और ERO ने उन्हें पात्र पाया। लेकिन इसके बाद अधिकारियों को पता चला कि ECINet में नाम हटाने के फैसले को पलटने का कोई विकल्प ही नहीं था। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सात दिनों में आयोग को आठ पत्र भेजे। हर पत्र की प्रति महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना को भी भेजी गई, लेकिन किसी का जवाब नहीं मिला और इन मतदाताओं के नाम शामिल किए बिना अंतिम सूची प्रकाशित कर दी गई।
संधू ने 14 अगस्त को लिखित रूप से यही चिंता जताई थी। उन्होंने लिखा था कि कानून के अनुसार,
मतदाता सूची से जुड़ी सभी जिम्मेदारियां ERO, DEO और CEO की हैं”, लेकिन “पहुंच संबंधी नियंत्रण महानिदेशक (आईटी) ने केंद्रीकृत कर दिया है।” उन्होंने यह भी लिखा कि महानिदेशक (आईटी) को “वैधानिक अधिकारियों को कानून के तहत मिले उचित और पूर्ण एक्सेस तथा काम करने की स्वतंत्रता को सीमित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
मई में जोशी ने इसे “मतदाता सूची के डेटाबेस का क्रमिक केंद्रीकरण” बताते हुए ऑडिट की मांग की थी। आयोग की 26 सितंबर की बैठक तक दोनों टिप्पणियों का कोई जवाब नहीं दिया गया था। 29 सितंबर का पत्र उस बैठक के तीन दिन बाद आया। अप्रैल के बाद आयोग की यह दूसरी पूर्ण बैठक थी। इसमें घोषणा की गई थी कि ‘अनमैप्ड’ होने या ‘तार्किक विसंगतियों’ के कारण नोटिस पाने वाले मतदाताओं को सुनवाई में उपस्थित होने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही, IIT या IIIT के एक स्वतंत्र विशेषज्ञ वाली समिति ECINet की समीक्षा करेगी और मैदानी अधिकारियों को आवश्यक “किसी भी अतिरिक्त सुविधा” को सॉफ्टवेयर में चालू किया जाएगा।
पत्र में सुनवाई संबंधी बदलाव की जानकारी राज्यों को दी गई है। इसकी प्रति महानिदेशक (आईटी) को भी ECINet में आवश्यक बदलाव करने के लिए भेजी गई है। इसमें दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए एक मुद्दे का भी समाधान किया गया है। पत्र के मुताबिक, फॉर्म 6 के साथ जुड़ी घोषणा का इस्तेमाल “केवल SIR के चरण में होगा”, जबकि SIR के बाहर “निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के अनुसार लागू फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे।”
गुरुवार को सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ ECI की बैठक के बाद महाराष्ट्र ने अपने निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों को निर्देश दिया है कि किसी भी मतदाता का नाम जल्दबाजी में न हटाया जाए। महाराष्ट्र फिलहाल उन राज्यों में सबसे बड़ा है, जहां SIR अभी जारी है।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से गुरुवार को मुंबई शहर और मुंबई उपनगरीय क्षेत्रों का काम देख रहे अधिकारियों को भेजे गए नोट में कहा गया है,
संबंधित मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने का निर्णय लेने से पहले उसे आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए, सुनवाई होनी चाहिए और आवश्यक आदेश पारित किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि कोई पात्र मतदाता मतदाता सूची से बाहर नहीं रहना चाहिए और मतदाता के वोट देने के अधिकार में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। अधिकारियों को जल्दबाजी में प्रतिकूल निर्णय न लेने और ERO स्तर पर पूरी जांच-पड़ताल” सुनिश्चित करने को कहा गया है।
यह नोट आयोग के 26 सितंबर के उस फैसले को लागू करता है, जिसके तहत ‘अनमैप्ड’ होने या ‘तार्किक विसंगतियों’ के कारण नोटिस पाने वाले मतदाताओं को सुनवाई के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की जरूरत नहीं होगी। नागरिकों और आयोग के बीच संपर्क की पहली कड़ी, बूथ स्तर के अधिकारी (BLO), नोटिस पाने वाले मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज एकत्र करेंगे और ERO के निर्णय के लिए उन्हें अपलोड करेंगे। जिन लोगों को पहले ही सुनवाई के नोटिस भेजे जा चुके हैं, उन्हें फोन या व्हाट्सऐप के जरिए बताया जाएगा कि उन्हें आने की जरूरत नहीं है।
महाराष्ट्र की प्रारूप मतदाता सूची में 1.22 करोड़ रिकॉर्ड सत्यापन के लिए चिह्नित किए गए हैं। इनमें 62.48 लाख रिकॉर्ड में रिश्तेदारों के विवरण में विसंगतियां थीं, जबकि 59.75 लाख रिकॉर्ड का पिछली मतदाता सूची में किसी रिश्तेदार से मिलान नहीं हो सका। नोट के मुताबिक, ECINet और BLO ऐप में “आवश्यक बदलाव” अभी आयोग के स्तर पर किए जा रहे हैं।