Gen Z कैसे गढ़ रही है नारीवादी प्रतिरोध की नई भाषा
इन नारों को केवल तुकबंदी या उत्तेजक शब्दों के रूप में पढ़ना इनके राजनीतिक-सामाजिक अर्थ को खो देना होगा।
हाल के छात्राओं के मार्च को मैंने थोड़ा दूर, लगभग दर्शक दीर्घा से observe किया। एक इतिहासकार और शिक्षक के रूप में मेरा ध्यान केवल प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि उसकी भाषा और नारों पर भी गया।
कुछ लोगों को इन छात्राओं के स्लोगन की भाषा से, उनके तेवर से, उनके Feminist Expression से समस्या है। किसी को वे बहुत तीखे लग रहे हैं, किसी को उग्र, तो किसी को असहज करने वाले। लेकिन शायद हमें यह समझना होगा कि हर पीढ़ी ने नारीवाद को अपने समय, अपने अनुभव और अपनी भाषा में नए अर्थ दिए हैं। अब Gen Z की बारी है।
इन नारों को केवल तुकबंदी या उत्तेजक शब्दों के रूप में पढ़ना इनके राजनीतिक-सामाजिक अर्थ को खो देना होगा।
इनके पीछे पितृसत्ता, Bodily Autonomy, सार्वजनिक स्थानों पर बराबर अधिकार और महिलाओं की स्वतंत्रता के गंभीर प्रश्न मौजूद हैं।
निर्भया आंदोलन से Gen Z तक
इन छात्राओं को देखकर मुझे दिसंबर 2012 का निर्भया आंदोलन याद आया। 23 दिसंबर 2012 को मैंने अपने ब्लॉग में एक छोटा-सा लेख “नॉर्थ ब्लॉक से इंडिया गेट” शीर्षक से लिखा था। मैंने उस समय लिखा था कि उनमें बड़ी संख्या (लगभग 90%) 16 से 22 वर्ष की उम्र के युवाओं की थी। उनके नारों में जबरदस्त गुस्सा था: “We want justice”, “Hang the rapist” और पुलिस, कानून तथा सरकार से जवाबदेही की सीधी मांग थी।

उस समय मेरी चिंता यह भी थी कि युवाओं के आक्रोश को केवल पुलिस बल से नियंत्रित करने की कोशिश करने के बजाय सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए। अपने उसी लेख में मैंने पुलिस सुधार, कठोर कानून, तेज़ न्यायिक प्रक्रिया और देशभर में महिलाओं की सुरक्षा जैसे सवाल उठाए थे। लगभग चौदह वर्ष बाद फिर एक युवा पीढ़ी सड़कों पर है। लेकिन उसकी भाषा में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है।
2012 का आंदोलन मुख्यतः पूछ रहा था कि अपराधी को सजा कब मिलेगी? 2026 की ये लड़कियाँ उसके साथ एक और सवाल जोड़ रही हैं कि हमारी स्वतंत्रता पर पहरा क्यों होगा?
यह बदलाव महत्वपूर्ण है। निर्भया आंदोलन की भाषा में Crime, Punishment, Policing और Justice प्रमुख थे। आज की छात्राएँ इन सवालों को छोड़ नहीं रही हैं, बल्कि बहस का दायरा और बड़ा कर रही हैं। वे पूछ रही हैं कि महिला को सुरक्षित रखने का अर्थ उसकी स्वतंत्रता सीमित करना क्यों हो? रात की सड़क पर पुरुष का होना सामान्य और महिला का होना सवाल क्यों बन जाता है? परिवार की “इज्जत” का बोझ लड़की के शरीर पर ही क्यों रखा जाए? और किसी महिला के कपड़े, दोस्ती, प्रेम, Sexuality या Personal Choices तय करने का अधिकार किसी तीसरे व्यक्ति को किसने दिया? यहीं “We want justice” से “सारी रात हमारी है” तक की यात्रा को समझना चाहिए।
यह कहना नहीं है कि एक पीढ़ी दूसरी से अधिक Feminist थी। हर आंदोलन अपने समय के सवालों से जन्म लेता है। नई पीढ़ियाँ पुराने संघर्षों को मिटाती नहीं हैं; वे उनकी जमीन पर खड़ी होकर नए सवाल जोड़ती हैं।

नारों की भाषा में आया बदलाव
दोनों दौर के नारों को साथ रखकर देखें तो यह बदलाव और दिलचस्प हो जाता है। 2012 के निर्भया आंदोलन में मैंने जिन नारों को दर्ज किया था, उनमें गुस्सा सीधे अपराधी, पुलिस और दंड की ओर था—
“We want justice, hang the rapist.”
दिल्ली पुलिस एक काम करो, चूड़ियाँ पहन के डांस करो।”
रेप करने वालों को, काट डालो सालों को।”
इन नारों की भाषा बेहद आक्रोशपूर्ण थी। इनके केंद्र में यौन हिंसा की घटना, अपराधी को कठोरतम सजा देने की मांग और पुलिस-व्यवस्था के प्रति गुस्सा था। दिलचस्प यह भी है कि उस दौर के कुछ नारों में विरोध व्यक्त करने के लिए स्वयं Gender Stereotypes का इस्तेमाल दिखाई देता है, मसलन पुलिस को अपमानित करने के लिए “चूड़ियाँ पहनने” का संदर्भ। यानी आंदोलन महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के लिए था, लेकिन उसकी लोकप्रिय भाषा भी अपने समय की लैंगिक धारणाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं थी।
अब Gen Z के इन नारों को सुनिए—

“नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की।”
“मेरे सिर में दर्द है, इसका कारण मर्द है।”
“तोड़ के रख दो वो समाज, नारी जिसमें बंधी है आज।”
“हक़ की दावेदारी है, सारी रात हमारी है।”
“एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा।”
“हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी।”
“एक सुट्टा, दो चाय, मर्द जात हाय-हाय।”
“रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं।”
“शरम नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में?”
इनमें भी गुस्सा है, लेकिन उसकी दिशा कुछ विस्तृत हुई है। यहां केवल Rapist या Police सवालों के घेरे में नहीं हैं; Patriarchy, Moral Policing, Victim Blaming, Dress Codes, Curfews, रात में महिलाओं की Mobility और स्त्री पर पुरुष या परिवार के स्वामित्व की मानसिकता भी निशाने पर है।
एक छोटा-सा comparison इस बदलाव को और स्पष्ट करता है:-
| निर्भया आंदोलन, 2012 | Gen Z की नई अभिव्यक्ति, 2026 |
| “We want justice, hang the rapist” | “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” |
| अपराधी को कठोर सजा दो | अपराधी को रोकने के नाम पर लड़की की स्वतंत्रता मत रोको |
| “दिल्ली पुलिस एक काम करो…” | “हक़ की दावेदारी है, सारी रात हमारी है” |
| पुलिस और व्यवस्था के प्रति आक्रोश | सार्वजनिक स्थान और रात पर बराबर अधिकार का दावा |
| यौन हिंसा के अपराध पर केंद्रित प्रतिरोध | हिंसा के साथ moral policing और patriarchal control पर सवाल |
| सुरक्षा और कठोर कानून की मांग | सुरक्षा + freedom + autonomy + agency |
| कुछ नारों में तत्कालीन gender stereotypes भी मौजूद | उन्हीं gender stereotypes को उलटकर satire और humour के जरिए चुनौती |
| अपराधी के खिलाफ आक्रोश | “नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की”—स्त्री पर ownership की धारणा को चुनौती |
| बलात्कार के बाद न्याय की मांग | “हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी”—victim blaming को चुनौती |
| Justice प्रमुख शब्द | Justice के साथ freedom और autonomy |
और शायद यहीं “We want justice” से “सारी रात हमारी है” तक की यात्रा सबसे स्पष्ट दिखाई देती है।
इस comparison में एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है। 2012 के नारे मुख्यतः State से सवाल कर रहे थे, जबकि 2026 के नारे State के साथ Society से भी सवाल कर रहे हैं। तब सवाल था कि अपराधी को सजा क्यों नहीं मिलती? आज उसके साथ सवाल यह भी है कि अपराध होने पर लड़की की स्वतंत्रता ही क्यों कम कर दी जाती है?
“Hang the rapist” से “रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं” तक का बदलाव शायद इस यात्रा को सबसे स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। पहला नारा अपराधी के लिए कठोर दंड मांगता है; दूसरा उसी मांग के साथ उस सामाजिक प्रतिक्रिया को भी चुनौती देता है जिसमें किसी घटना के बाद लड़कियों के Hostel Timings, Mobility या freedom पर पाबंदियां बढ़ा दी जाती हैं।

इसी तरह “हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, इन मर्दों की सोच है छोटी” कपड़ों को Sexual violence से जोड़ने वाली Victim-Blaming मानसिकता पर सीधा व्यंग्य है, जबकि “हक़ की दावेदारी है, सारी रात हमारी है” Public Space पर महिलाओं के बराबर अधिकार का दावा है। यह अंतर किसी एक आंदोलन को दूसरे से बेहतर या अधिक Feminist साबित करने के लिए नहीं है। बल्कि यह दिखाता है कि Feminist Protest की Vocabulary कैसे बदलती और विस्तृत होती है। एक पीढ़ी न्याय और सुरक्षा के सवाल को केंद्र में लाई; अगली पीढ़ी उसी संघर्ष में Agency, Autonomy, Mobility और Freedom की भाषा और मजबूती से जोड़ रही है।
और शायद इसीलिए Gen Z के कुछ नारे जानबूझकर Irreverent हैं—“एक कचौड़ी, दो समोसा” या “एक सुट्टा, दो चाय” जैसे नारे कोई feminist manifesto नहीं हैं। वे Street Protest की भाषा हैं, जो humour, rhyme, exaggeration और provocation के जरिए स्थापित सामाजिक भाषा को उलटने की कोशिश करती है।
इसलिए इन नारों को केवल उनके शब्दों पर Judge करने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि वे किस सत्ता-संबंध, किस सामाजिक धारणा और किस नियंत्रण को चुनौती दे रहे हैं।
Cinderella नहीं, Wonder Woman बनो
इस पीढ़ी की सबसे खूबसूरत बात मुझे यह लगती है कि ये लड़कियाँ मुखर हैं। वे असहज सवाल पूछने से डरती नहीं हैं। अपनी बात कहने के लिए किसी की अनुमति का इंतजार नहीं करतीं। उनका Feminism केवल किताबों और सेमिनार की अकादमिक भाषा में नहीं है। उसमें Humour है, Sarcasm है, Memes की भाषा है, पॉपुलर कल्चर है और जरूरत पड़ने पर गुस्सा भी है।
मैं अपनी छात्राओं से अक्सर कहती हूं—
Cinderella नहीं, Wonder Woman बनो।” Cinderella को rescue के लिए Prince Charming का इंतजार करना पड़ता है। Wonder Woman किसी के आने का इंतजार नहीं करती। उसकी अपनी ताकत है, अपने पंख हैं और अपनी दिशा चुनने की आजादी भी। शायद यही Metaphor इन नारों को समझने में भी हमारी मदद कर सकता है।
सदियों से महिलाओं को सुरक्षा का एक ऐसा मॉडल दिया गया जिसमें पिता बेटी की, भाई बहन की और पति पत्नी की “रक्षा” करेगा। लेकिन Gen Z की लड़की पूछ रही है कि मुझे सुरक्षित जरूर कीजिए, लेकिन मेरी स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं। और मेरी स्वतंत्रता किसी पुरुष संरक्षक की उपस्थिति पर निर्भर क्यों हो? इसीलिए इन छात्राओं के Slogans को केवल शब्दों की तरह मत सुनिए। किसी आंदोलन का नारा Feminism की अकादमिक परिभाषा नहीं होती है। नारे में अतिशयोक्ति हो सकती है, व्यंग्य हो सकता है, हास्य हो सकता है, आक्रोश हो सकता है; क्योंकि उसका काम केवल समझाना नहीं, झकझोरना भी होता है।
ये सिर्फ नारे नहीं हैं। ये बदलते हुए नारीवाद की भाषा हैं। ये उस पीढ़ी की आवाज़ है जो अब अपनी आज़ादी की परिभाषा खुद लिखना चाहती है।
Dr. Chayanika Uniyal
डॉ चयनिका उनियाल दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की असोसिएट प्रोफेसर हैं और जेंडर मुद्दों की प्रखर प्रवक्ता